31 मार्च 2026 का दिन देश सदियों याद रखेगा।

#pradepsinghप्रदीप सिंह।
31 मार्च 2026 स्वतंत्र भारत के इतिहास का बहुत ही महत्वपूर्ण दिन बन गया है। देश में शताब्दियों तक इस दिन की याद की जाती रहेगी। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने देश से वादा किया था कि 31 मार्च 2026 तक देश से माओवाद का सफाया कर देंगे और देश से माओवाद का सफाया हो गया।माओवाद एक विचारधारा के कारण पैदा हुआ। वह विचारधारा थी कि सत्ता बंदूक की नली से निकलती है। यानी हम जनतंत्र में विश्वास नहीं करते। यह उनके घोषणापत्र में था और लंबे समय तक सीपीएम भी इसको मानती रही। देश की पहली कम्युनिस्ट पार्टी सीपीआई थी। उसे सोवियत संघ से पैसा मिलता था और वह उसकी पिछलग्गू थी। 1969 में जब कांग्रेस पार्टी में विभाजन की नौबत आई और इंदिरा गांधी कमजोर हुईं तो राष्ट्रपति पद के लिए अपने उम्मीदवार वीवी गिरी को जिताने के लिए उन्होंने अंतरात्मा की आवाज पर वोट देने का नारा दिया। तब उन्हें कम्युनिस्टों का समर्थन मिला। वह दिन और आज का दिन कांग्रेस पार्टी कम्युनिस्टों की विचारधारा और उनके इको सिस्टम पर पूरी तरह से निर्भर है और अब तो दोनों में कोई अंतर ही नजर नहीं आता। चीन और सोवियत संघ के बीच लड़ाई के बाद एक नई कम्युनिस्ट पार्टी सीपीएम का जन्म हुआ। उसके बाद सीपीआई एमएल और अन्य कई वामपंथी दल बने। इनकी विचारधारा हथियारों की थी। लेकिन आखिर में इनको भी चुनाव के मैदान में आना पड़ा। तो आतंरिक सुरक्षा को लेकर भारत की लड़ाई इस विचारधारा से थी और इस विचारधारा के लोग दो खेमों में थे। एक जो जंगल में हथियार उठाए हुए थे और दूसरे जो शहर में रहकर उनके लिए वैचारिक आधार तैयार कर रहे थे। बड़े-बड़े वकील और एनजीओ उनके समर्थक थे। जो उनके समर्थन में सुप्रीम कोर्ट से फैसला कराने की ताकत रखते थे। बी सुदर्शन रेड्डी उस पीठ के सदस्य थे,जिसने सलवा जुडुम के खिलाफ फैसला सुनाया था। फैसले के बाद सलवा जुडुम के तहत जिन जनजातीय युवाओं को माओवादियों से लड़ने के लिए हथियार मिले थे, उनके हथियार वापस ले लिए गए और एक-एक कर सब मारे गए। वह खून कांग्रेस पार्टी और बी सुदर्शन रेड्डी के हाथ में लगा है। उन्हीं बी सुदर्शन रेड्डी को कांग्रेस ने हाल ही में हुए उपराष्ट्रपति  चुनाव में अपना उम्मीदवार बनाया था।

भले ही माओवादियों के तंत्र की पकड़ कितनी ही मजबूत थी, लेकिन वह शायद भारतीय संस्कृति की ताकत को नहीं समझते थे। त्रेता युग की बात कर रहा हूं। जब भगवान राम को लंका पहुंचने के लिए समुद्र पर पुल बनाना था। वह तीन दिन तक समुद्र से विनती करते रहे कि रास्ता दे दो, लेकिन वह नहीं माना। तब भगवान राम ने समुद्र को सुखाने के लिए धनुष उठाया। यह देखते ही समुद्र उनके पैरों में गिर पड़ा और रास्ता देने को तैयार हो गया। तो ये जो आज लोग कहते हैं न कि माओवादियों और आतंकवादियों से बात करनी चाहिए। हथियार नहीं उठाना चाहिए। इनको थोड़ा भारतीय संस्कृति के बारे में जानकारी प्राप्त कर लेनी चाहिए। दुष्ट बातों से कभी नहीं मानता। भगवान राम ने बताया कि उसी की बात सुनी जाती है, जिसके पास शक्ति होती है। इसीलिए केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि जो गोली चलाएगा, उसका जवाब गोली से दिया जाएगा और यही हुआ। सवा साल के अंदर इस देश से माओवाद का आतंक समाप्त हो गया।

भारत में माओवाद की शुरुआत 1970 से हुई थी। लगभग 56 साल यह चला। कहा गया कि माओवाद इसलिए पनपा क्योंकि विकास नहीं हुआ। जबकि हकीकत में माओवादियों ने ही विकास को रोका। उन्होंने हत्याएं कीं,अपहरण किए,वसूली की। ये आतंकवादी थे। इनके साथ जो हुआ, वही होना चाहिए था। लोकसभा में इस मुद्दे पर केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने कहा भी कि जो हथियार डालने को तैयार हैं, हम उनके हम पुनर्वास की व्यवस्था कर रहे हैं। नक्सलियों ने बड़ी संख्या में हथियार डाले हैं। सरकार की दृढ़ इच्छा शक्ति और हमारे केंद्रीय सुरक्षा बलों,पुलिस बलों और जनजातीय लोगों के बलिदान से आज यह दिन देखने को मिला है। मनमोहन सिंह जब प्रधानमंत्री और चिदंबरम गृह मंत्री थे तब वे भी माओवाद को भारत की आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा मानते थे,लेकिन किया कुछ नहीं। उसके बदले वे अर्बन नक्सलियों की मदद करते रहे। और अब तो अर्बन नक्सल्स और कांग्रेसियों में कोई अंतर ही नहीं रह गया है। इसीलिए जब संसद में इस मुद्दे पर चर्चा हो रही थी तो नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी नदारद थे। मान लीजिए कि राहुल आ भी जाते तो बोलते क्या? माओवादियों का समर्थन करते तो मुश्किल थी। उनका विरोध करते तो जो कुछ लोग साथ में खड़े हैं, वे भी चले जाते। तो उन्होंने चुप रहने में ही समझदारी समझी।

माओवादियों ने देश के जनजातीय इलाकों में विकास पहुंचने ही नहीं दिया। सड़कें, मोबाइल टावर, स्कूल, अस्पताल सब उड़ा दिए। लेकिन 2014 से जब इन्हीं माओवादियों के खिलाफ ऑपरेशन शुरू हुआ तो देखिए जनजातीय इलाकों का कैसे विकास हो रहा है। जनजातीय क्षेत्रों में आज सबके बैंक खाते हैं। उनको प्रधानमंत्री आवास योजना में घर मिल रहा है। गैस और बिजली कनेक्शन मिल रहा है। उनके बच्चे पढ़ रहे हैं। उन्हें नौकरी मिल रही है। और सबसे बड़ी बात उनका जीवन सुरक्षित है। यह कोई मामूली परिवर्तन नहीं है। जनजातीय समुदाय को समझ में आ गया है कि हमारा भला किस तरफ है। हालांकि उनको समझ में तो पहले भी आ रहा था लेकिन तब उनको भय था कि अगर यह बात बोलेंगे तो मारे जाएंगे। भयग्रस्त मन से सच्चाई नहीं निकलती है। मन से भय हटा दीजिए तो उसके बाद असलियत सामने आती है। आज देश में रेड कॉरिडोर का कोई नाम लेवा नहीं रह गया है। इस देश में कम्युनिस्ट पार्टियां धीरे-धीरे खत्म हो गई हैं। तो भारत को एक और बहुत बड़ी बुराई और आंतरिक सुरक्षा के लिए बहुत बड़े खतरे से मुक्ति मिल गई है। 31 मार्च 2026 को लंबे समय तक इस बात के लिए याद रखा जाएगा कि सरकारें जब दृढ़ निश्चय के साथ देश और समाज के हित में काम करती हैं तो कैसे नतीजे आते हैं।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)