#pradepsinghप्रदीप सिंह।
15 साल में पहली बार ऐसा हुआ कि देश की सर्वोच्च अदालत सुप्रीम कोर्ट को ममता बनर्जी के गुंडा राज का सामना करना पड़ा। यह असाधारण घटना है। जहां तक मुझे याद है यह दूसरी ऐसी घटना है जब सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट को इंटरवीन करना पड़ा है।
बुधवार को पश्चिम बंगाल के मालदा में सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर एसआईआर के काम में लगे सात न्यायिक अधिकारियों का हजारों लोगों की भीड़ ने घेराव कर दिया था। इन न्यायिक अधिकारियों की जान खतरे में थी और लोगों की भीड़ बढ़ती जा रही थी। इस पर इन न्यायिक अधिकारियों ने हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस को फोन किया। चीफ जस्टिस ने राज्य प्रशासन के वरिष्ठ अधिकारियों से तुरंत कार्रवाई करने को कहा। लेकिन आधी रात तक प्रशासन ने कुछ नहीं किया। इससे आप इससे अंदाजा लगाइए कि राज्य में कानून व्यवस्था की स्थिति क्या है? इस मामले की सुनवाई गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट में हुई। सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार को कड़ी लताड़ लगाते हुए इसे राज्य में सिविल और पुलिस एडमिनिस्ट्रेशन की विफलता बताया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस पूरी घटना की जांच सीबीआई या एनआईए से कराई जानी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि यह घटना सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया की अथॉरिटी को चैलेंज करने वाली है। क्या आपने इस पर ममता बनर्जी की ओर से कोई बयान सुना कि उन्हें अफसोस है कि ऐसा हुआ? कोई बयान नहीं आया। इन न्यायिक अधिकारियों को जब वहां से निकाला गया तो इनकी गाड़ियों पर पत्थर और डंडों से हमला हुआ। इन सात में से तीन महिला न्यायिक अधिकारी थीं। अदालत ने कहा कि एडमिनिस्ट्रेशन ने बार-बार कहने पर भी समय से एक्शन नहीं लिया। अब सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया है कि न्यायिक अधिकारी जहां भी काम कर रहे हैं, उनको सेंट्रल फोर्सेस का प्रोटेक्शन दिया जाए। अब स्टेट पुलिस में इससे बड़ा अविश्वास क्या हो सकता है?

यह सब क्यों हुआ? मालदा मुस्लिम बहुल इलाका है। वहां अफवाह फैलाई गई कि मुसलमानों के नाम बड़ी संख्या में काटे जा रहे हैं। सवाल है कि यह काम चुनाव आयोग तो कर नहीं रहा है, जिस पर ममता बनर्जी तमाम तरह के आरोप लगा रही हैं। यह काम सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर हाईकोर्ट द्वारा नियुक्त न्यायिक अधिकारी कर रहे हैं। तो आपको चुनाव आयोग पर भरोसा नहीं है। आपको न्यायिक अधिकारियों पर भरोसा नहीं है। आपको हाईकोर्ट पर भरोसा नहीं है। आपको सुप्रीमकोर्ट पर भरोसा नहीं है। ऐसी सरकार एक मिनट भी क्यों रहनी चाहिए? ऐसी अराजकता का इसके अलावा एक ही उदाहरण मुझे याद आता है। 1995 में उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव की सरकार थी। गेस्ट हाउस कांड के बाद बसपा सरकार से समर्थन वापस ले चुकी थी। दोनों पार्टियों में तनाव था। उसके बाद समाजवादी पार्टी के गुंडों ने अखबारों के हॉकरों पर हमला किया और अखबार की प्रतियां जला दीं। उसके बाद जो हुआ वह भारत के इतिहास में उससे पहले कभी नहीं हुआ। सपा के गुंडे हाईकोर्ट में घुस गए और जजेस की जान को खतरा पैदा हो गया। इलाहाबाद हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस को चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया को फोन करना पड़ा कि हमारी जान बचाइए। वहां से गवर्नर और सेंट्रल गवर्नमेंट को फोन किया गया। तब उनको सुरक्षा मिली। उसके बाद मुलायम सिंह यादव की सरकार को बर्खास्त कर दिया गया था और प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया था। लेकिन आज ममता बनर्जी की सरकार को कोई खतरा नहीं है। वह बिल्कुल निश्चिंत हैं। पिछले 10 साल से पश्चिम बंगाल के लोग क्या झेल रहे हैं,उसका एक नमूना सुप्रीम कोर्ट को देखने को मिला। लेकिन अराजकता का दूसरा नाम है ममता बनर्जी की सरकार और ममता बनर्जी की यही सबसे बड़ी ताकत है। पश्चिम बंगाल में आम आदमी सुरक्षित नहीं है, महिलाएं सुरक्षित नहीं हैं, राजनीतिक दलों के कार्यकर्ता सुरक्षित नहीं हैं और अब तो न्यायिक अधिकारी भी सुरक्षित नहीं हैं।
एसआईआर बहुत से प्रदेशों में हुआ। एसआईआर के बाद बिहार में विधानसभा चुनाव हो गए। कोई समस्या नहीं आई। किसी और राज्य से भी समस्या की खबर नहीं आई। लेकिन एसआईआर को लेकर जिस तरह का विरोध ममता बनर्जी की सरकार कर रही है, उससे समझ में आता है कि उन्होंने फर्जी मतदाताओं का कितना बड़ा तंत्र खड़ा किया था। अब उनको अपना वह पूरा किला भरभरा कर गिरता हुआ दिखाई दे रहा है। इन्हीं फर्जी मतदाताओं के बूते वह तीन बार मुख्यमंत्री बनीं और चौथी बार भी बनना चाहती थीं। उनको लग रहा है कि उनके इस साम्राज्य में चारों तरफ से हमला हो रहा है। राजनीतिक हमला तो झेलने में वह सक्षम हैं, लेकिन संविधान की ओर से जब कारवाई होती है तब मुश्किल होती है। जिस तरह से वह अपने राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों से निपटती हैं,उसी तरह से न्यायिक अधिकारियों से भी निपट रही हैं। क्या आपको लगता है कि मालदा में जो कुछ हुआ वह राज्य सरकार की जानकारी के बिना था। एक मिनट के लिए मान लीजिए कि उनकी जानकारी के बिना था। तो भी 9-10 घंटे तक उनकी सरकार करती क्या रही? जब लगा कि पानी सिर के ऊपर जा रहा है तब कारवाई हुई वह भी सेंट्रल फोर्सेस के इंटरवेंशन से। आप इससे अंदाजा लगा सकते हैं कि पश्चिम बंगाल में चुनाव कैसे होते हैं।

पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची का जो शुद्धिकरण हो रहा है, उससे ममता बनर्जी को लगता है कि उनके ऊपर सबसे बड़ा प्रहार है क्योंकि उनकी जो चुनावी पूंजी थी, वही लुट रही है। बांग्लादेशी घुसपैठिया, रोहिंग्या और ऐसे लोग जो इस दुनिया में नहीं हैं या पश्चिम बंगाल में नहीं रहते, उनका नाम मतदाता सूची में रखकर वह अपना खेल करती थीं। इसीलिए नारा देती थीं खेला होबे। अब वह खेला होबे का खेल पलट गया है। इसलिए उनकी छटपटाहट ज्यादा है। मालदा की घटना के मामले में इंडी अलायंस के अन्य घटक दल भी ममता बनर्जी के समर्थन में नहीं हैं। ममता बनर्जी अलग-थलग पड़ रही हैं। पहले उन्होंने बीजेपी और फिर चुनाव आयोग से मोर्चा लिया। और अब तो हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट से मोर्चा ले लिया है। वह अपने साम्राज्य को बचाने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार हैं।
सवाल है कि ऐसी परिस्थिति में सुप्रीम कोर्ट की क्या जिम्मेदारी है? पश्चिम बंगाल में अगर न्यायिक अधिकारी सुरक्षित नहीं हैं तो कैसे यह माना जा सकता है कि मतदान के दिन मतदाता सुरक्षित होगा। पश्चिम बंगाल का पूरा प्रशासनिक और पुलिस तंत्र ममता बनर्जी का कैडर बन चुका है। चुनाव आयोग केवल अधिकारियों का ट्रांसफर कर सकता है, लेकिन उनसे काम नहीं ले सकता। जो काम करने वाले अधिकारी हैं वे सरकार के मुखिया की ओर देखते हैं। उनके मन में डर है कि कल ये फिर लौट कर आए तो हमारा क्या होगा? तो पश्चिम बंगाल में केवल मतदाता के मन में डर नहीं है, पूरे प्रशासन के मन में डर है और इसी कारण वह निष्पक्षता से कानून के मुताबिक काम करने के लिए तैयार नहीं है। जब तक ममता बनर्जी मुख्यमंत्री रहेंगी तब तक यह सिलसिला चलता रहेगा। अब सवाल दो ही हैं। उनको जनता के वोट से हटाया जाएगा या उससे पहले कोई संवैधानिक प्रक्रिया के तहत उन्हें हटाया जा सकता है। दूसरी बात की संभावना तो अब लगभग खत्म हो चुकी है। अब पश्चिम बंगाल के मतदाताओं से ही उम्मीद बची है कि वे अपने प्रदेश को ममता बनर्जी की पार्टी के गुंडाराज से मुक्त कराएं। मुझे तो कम से कम लग रहा है कि पश्चिम बंगाल का मतदाता बहुत गंभीरता से इस बारे में अपना मन बना चुका है। 4 मई को तो केवल फैसला सुनाया जाएगा।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)