अमेरिका और ईरान के जीत के दावों की पड़ताल।

#pradepsinghप्रदीप सिंह।
एक सभ्यता को नष्ट करने की धमकी देकर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने बुधवार की सुबह-सुबह डेडलाइन से दो घंटे पहले युद्धविराम की घोषणा कर दी। यह युद्धविराम कितने दिन चलेगा किसी को नहीं मालूम, लेकिन फिलहाल पूरी दुनिया ने राहत की सांस ली है। ट्रंप ने जो कदम उठाया है, उसके बाद ऐसे लोगों की कमी नहीं है जिनका मानना है कि अमेरिका हार गया और ईरान जीत गया,जबकि इस युद्ध के बारे में इस तरह के किसी नतीजे पर पहुंचना आसान नहीं है।
कोई युद्ध अगर जमीन पर नहीं लड़ा जा रहा है और एक देश दूसरे की टेरिटरी पर कब्जा नहीं कर रहा है तो ऐसे युद्ध की जीत-हार का फैसला कैसे हो? इसका सबसे अच्छा तरीका है कि आप जो उद्देश्य लेकर चले थे, उसमें से कितना पूरा हुआ? इस युद्ध में अमेरिका दो तरह के उद्देश्य लेकर चला था। हालांकि बाद में ट्रंप अपने बयानों में उसे रोज बदलते रहे। शुरू में कहा गया कि ईरान में रिजीम चेंज कराना और उसके न्यूक्लियर प्रोग्राम को खत्म करना उद्देश्य है। फिर कहा कि ईरान के पास जो 430 किलो एनरिच यूरेनियम है उसे हासिल करना उद्देश्य है। फिर युद्ध शुरू हो गया तो स्ट्रेट ऑफ होर्मुज का नया मोर्चा खुल गया। उसके बाद ट्रंप का कहना था कि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज खुलना चाहिए। अगर ईरान नहीं खोलेगा तो हम उसको स्टोन एज में भेज देंगे। मेरा तो मानना है कि अमेरिका का इनमें से कोई उद्देश्य नहीं था। वह इजराइल और अरब देशों के लिए इस युद्ध में गया क्योंकि ईरान से इन्हीं दोनों को खतरा था। अमेरिका को कोई खतरा नहीं था। ये जो 60% एनरिच यूरेनियम की बात कही जा रही है, ये किसी को नहीं मालूम कि इसमें कितनी सच्चाई है और कितना प्रोपोगेंडा है। अमेरिकी उद्देश्य के बारे में कोई स्पष्टता नहीं है। तो इसलिए उस आधार पर अमेरिका की हारजीत का फैसला नहीं कर सकते।
सवाल यह भी है कि अमेरिका को इस युद्ध से नुकसान हुआ या फायदा? जो लोग कहते हैं कि इतना खर्च हो गया,उसके इतने हथियार खत्म हो गए, उसका कोई मतलब नहीं है। क्योंकि आप तुलना कीजिए अमेरिका को फायदा क्या होने जा रहा है? अमेरिका का हथियारों का जो स्टॉक था, वह सब यूज़ हो गया। अब नई इन्वेंटरी बनेंगी। उसकी आयुध फैक्ट्रियों मे नए सिरे से निर्माण शुरू होगा। नई नौकरियां पैदा होंगी। उसके अलावा अरब देश और यूरोपीय देश अमेरिका से हथियार और ज्यादा खरीदेंगे। अमेरिका के तेल पर भी कोई असर नहीं पड़ा है क्योंकि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से न अमेरिका का तेल आता है और न ही इजराइल का। बल्कि इस सवा महीने के युद्ध में अमेरिका ने अपना तेल बहुत महंगे दामों पर बेचा है। हमें एक बात याद रखनी चाहिए कि डोनाल्ड ट्रंप व्यापारी हैं। वह कोई पॉलिटिशियन या स्टेट्समैन नहीं हैं। अब इस बात की बहुत चर्चाएं हैं कि वह जो रोज ट्वीट करते थे, वह दरअसल मार्केट को गिराने-उठाने के लिए होता था। उसमें उनके करीबी लोगों ने बहुत पैसा कमाया है। जो लोग कह रहे हैं कि ट्रंप ईरान को हरा नहीं पाए तो वे ईरान को खत्म करने नहीं गए थे। उसे खत्म करना इतना आसान भी नहीं है। उसका एक ही तरीका है कि आप न्यूक्लियर पावर का इस्तेमाल करें। वह होने वाला नहीं था। अगर आप ईरान के समर्थक हैं तो यह कह सकते हैं कि ईरान ने सरेंडर नहीं किया। यह अमेरिका की हार है।
दूसरी तरफ देखिए कि इस युद्ध से पहले ईरान क्या था और अब क्या हो गया? ईरान पूरी तरह से बर्बाद हो चुका है। उसका सारा इंफ्रास्ट्रक्चर खत्म है। अगर उसके तेल और पावर इंफ्रास्ट्रक्चर को अमेरिका और इजराइल ने बर्बाद कर दिया होता तो पूरा देश तबाह हो जाता। बर्बाद इंफ्रास्ट्रक्चर को बनाने में ईरान को 15 से 20 साल लग सकते हैं। जो पैसा लगेगा, वह अलग। ट्रंप कह रहे हैं कि ईरान के पुनर्निर्माण में हम मदद करेंगे। यानी वहां भी वह बिजनेस देख रहे हैं। ऐसे लोगों की कमी नहीं है जिनका मानना है कि ट्रंप ने एक तरह से सुपारी किलर का काम किया। इजराइल और खाड़ी के देशों की ओर से ईरान पर हमला किया। इस युद्ध में ईरान को इतना बड़ा नुकसान पहुंचने के बाद वह खाड़ी के देशों और इजराइल के लिए अब उतना बड़ा खतरा नहीं रह गया है। ईरान के प्रॉक्सी हिजबुल्ला को भी इजराइल बुरी तरह से मार रहा है और उसने स्पष्ट कर दिया है कि इस युद्धविराम का लेबनान से कोई लेना देना नहीं है। उसने लेबनान और इजराइल के बीच जो सीमा रेखा थी उसको भी बढ़ा दिया है। खाड़ी के देशों और इजराइल को न्यूक्लियर ईरान से भी बड़ा खतरा था। अभी तक के युद्ध के बाद यह स्पष्ट नहीं है कि ईरान का न्यूक्लियर प्रोग्राम कितना बचा है,कितना खत्म हो गया है। मान लें कि कुछ बचा भी है तो उसको युद्ध से पहले की स्थिति में लाने में कई दशक लग सकते हैं।
इस युद्ध से असल फायदा तो इजराइल को हुआ है। वह 47 साल से इस मौके के इंतजार में था। इस युद्ध के जरिए वह ईरान को बहुत हद तक कमजोर कर चुका है। ईरान की मिसाइल और ड्रोन कैपेसिटी बहुत हद तक खत्म हो चुकी है। उसको फिर से रिबिल्ड करने में ईरान को कितने साल लगेंगे, कहना मुश्किल है। सचमुच अगर यह युद्ध रुका रहता है तो ईरान की पहली प्राथमिकता अपने देश के सिविलियन इंफ्रास्ट्रक्चर के पुनर्निर्माण की होगी और इसके लिए उसको पैसा चाहिए। डील में ईरान कह रहा है कि वह स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से गुजरने वाले जहाजों से टोल टैक्स वसूलेगा। लेकिन सवाल यह है कि क्या बाकी दुनिया ईरान को ऐसा करने देगी? अगर करने देगी तो विशेषज्ञों का अनुमान है कि इससे ईरान को हर साल 950 बिलियन डॉलर का फायदा होगा। इसके अलावा उसके तेल पर जो टेंपरेरी सेंक्शन हटा है, अगर वह हटा रहता है तो 50 से 60 बिलियन डॉलर का तेल बेचने का उसको फायदा मिलेगा। तो ईरान को बड़े पैमाने पर पैसा मिलेगा। ईरान की यह भी शर्त है कि उसके जो एसेट्स फ्रीज हैं, उनको डीफ्रीज किया जाए। इनमें से कितनी बातें मानी जाएंगी,यह तो तब तय होगा जब समझौते की टेबल पर दोनों पक्ष आमने सामने बैठेंगे।

खाड़ी के देशों को अगर आप देखिए तो बहुत से लोगों को लगता था कि ईरान उन पर हमला कर रहा है, ये सब मिलकर क्यों नहीं ईरान पर हमला कर रहे हैं? तो उनको मालूम है कि ईरान उनके बगल में है। ईरान के लिए उन पर हमला करना बहुत आसान है। खासतौर से उनके अगर समुद्र के खारे पानी को मीठा करने वाले प्लांट को ईरान जिस दिन उड़ा देगा, उस दिन खाड़ी के देशों में त्राहि-त्राहि मच जाएगी। वह युद्ध चाहते भी थे और युद्ध रोकना भी चाहते थे। युद्ध सिर्फ इसलिए चाहते थे कि ईरान उनके लिए खतरा न रहे। उस हालत में अमेरिका और इजराइल ने ईरान को पहुंचा दिया है। ईरान अब खाड़ी के देशों के लिए उतना बड़ा थ्रेट नहीं रह गया है, जो युद्ध से पहले था। इसलिए अभी जो परिस्थिति है, उसमें आप कह सकते हैं कि तुम्हारी भी जय-जय, हमारी भी जय-जय, न तुम हारे, न हम हारे। बहुत से लोगों को बड़ी निराशा हुई है कि ट्रंप ने इतना हाइप क्रिएट किया और किया कुछ नहीं तो इसके लिए आपको ट्रंप को समझना पड़ेगा। उन्होंने युद्ध इसलिए शुरू किया कि कमाई बढ़े। युद्ध रोका भी इसलिए कि कमाई बढ़े। जो लोग कह रहे हैं कि अमेरिका क्या लक्ष्य लेकर युद्ध में गया था,तो ट्रंप का एक ही लक्ष्य था पैसा कमाना। अपने लिए,अपने दोस्तों के लिए और अपने देश के लिए। उस लक्ष्य में वह सफल रहे हैं। इसलिए आप इस आधार पर कह सकते हैं कि अमेरिका जीत गया। लेकिन ईरान ने घुटने नहीं टेके तो आप कह सकते हैं कि अमेरिका की हार हो गई है। हालांकि इस युद्ध में ईरान ने गंवाया ज्यादा है। उसकी टॉप मिलिट्री, इंटेलिजेंस और पॉलिटिकल लीडरशिप सब मारी गई। हर शहर का सिविल इंफ्रास्ट्रक्चर बर्बाद हो गया और उसको इसके बदले में कुछ मिला नहीं है। तो आप इन तथ्यों के आधार पर फैसला कीजिए कि कौन जीता,कौन हारा।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)