#pradepsinghप्रदीप सिंह।

नेता प्रतिपक्ष और कांग्रेस के सबसे बड़े नेता राहुल गांधी का राजनीतिक भविष्य गुरुवार को ईवीएम में कैद हो गया। अब आप कहेंगे कि लोकसभा चुनाव तो हो नहीं रहा है। दो राज्यों असम और केरल में विधानसभा चुनाव के लिए मतदान हुआ है। फिर राहुल गांधी का राजनीतिक भविष्य कैसे ईवीएम में कैद हो गया? ईवीएम में तो उन उम्मीदवारों का भविष्य कैद हुआ है, जो विधानसभा का चुनाव लड़ रहे थे। लेकिन आप जरा गहराई से सोचिए। इन दोनों राज्यों विशेषकर केरल में कांग्रेस के लिए बेहद अनुकूल हालात हैं। फिर भी अगर कांग्रेस हार जाती है तो यह राहुल गांधी के राजनीतिक भविष्य पर बड़ा प्रश्नचिह्न खड़ा कर देगी।

केरल में परिपाटी बन गई थी कि हर पांच साल पर सरकार बदलती थी,लेकिन सीपीएम ने उसको तोड़ दिया। सीपीएम के नेतृत्व वाला एलडीएफ पिछले 10 साल से सत्ता में है। मुख्यमंत्री पिनराई विजयन तीसरी बार सत्ता में आने की कोशिश कर रहे हैं। केरल में परिवर्तन होगा या यथास्थिति बनी रहेगी, चुनाव इसका है। कांग्रेस पार्टी के लिए इससे अच्छी स्थिति क्या हो सकती है कि विजयन सरकार के खिलाफ 10 साल की एंटी इनकंबेंसी है। साथ ही मुख्यमंत्री के परिवार समेत सरकार पर कई तरह के आरोप हैं। तो राज्य में इन स्थितियों में राहुल की वोट दिलाने की क्षमता की परीक्षा है। साथ ही केरल और असम दोनों जगह कांग्रेस के दूसरी पीढ़ी के नेता हैं,जिनको राहुल गांधी ने बनाया है, उनकी भी परीक्षा होने जा रही है। केरल में खुद को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार समझने वाले केसी वेणुगोपाल राहुल गांधी के सबसे विश्वस्त और करीबी माने जाते हैं। वह कांग्रेस पार्टी के राष्ट्रीय महामंत्री संगठन हैं। राहुल गांधी उन्हीं के कहने पर फैसले लेते हैं। तो इसलिए राहुल गांधी भी चाहेंगे कि केरल में इतना बहुमत मिले कि उनको मुख्यमंत्री का फैसला करने में दिक्कत न हो। केरल के वायनाड से राहुल की बहन प्रियंका वाड्रा सांसद हैं। राहुल खुद भी वहां से सांसद रह चुके हैं। तो केरल में राहुल गांधी का जो पूरा इको सिस्टम है,उसकी भी परीक्षा है।

गुरुवार को जिस दूसरे राज्य में वोट पड़े वह है असम। वहां भाजपा तीसरी बार सरकार बनाने के लिए चुनाव मैदान में है। केरल की तरह की परिस्थितियां असम में भी सत्तारूढ़ दल के लिए हैं। और दोनों जगह चैलेंजर कांग्रेस पार्टी है। केरल में तो फिर भी भाजपा तीसरी शक्ति बनने की कोशिश कर रही है,लेकिन असम में तो भाजपा-कांग्रेस में सीधी लड़ाई है। असम में भी इससे अनुकूल राजनीतिक परिस्थिति कांग्रेस के लिए हो नहीं सकती। सत्ता में रहकर सत्ता में वापस आने की कोशिश करना कठिन होता है। विपक्ष में रहकर सत्ता में आने की कोशिश अपेक्षाकृत आसान होती है। लेकिन सबसे बड़ा सवाल आता है विश्वसनीयता का। तो दोनों राज्यों के लोग बताएंगे कि राहुल गांधी और उनके पूरे इको सिस्टम पर उनको भरोसा है कि नहीं? 2011 की जनगणना के मुताबिक असम में 33% मुस्लिम आबादी है। और यह बात तो किसी से छिपी है नहीं कि मुसलमान बीजेपी को वोट नहीं देता। तो बीजेपी को 60% मतदाताओं में से इतने वोट लाने हैं कि उसको बहुमत मिल जाए, जबकि कांग्रेस को 100 फीसदी मतदाताओं में से इतना वोट लाना है कि उसका बहुमत हो जाए। असम में राहुल गांधी के सबसे खास और लोकसभा में डिप्टी लीडर गौरव गोगोई जो प्रदेश अध्यक्ष भी हैं,मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार हैं। फिर भी असम कांग्रेस में हताशा का स्तर देखिए कि मतदान से कुछ दिन पहले तक लोग पार्टी छोड़-छोड़कर जाते रहे।

केरल और असम दोनों ही प्रदेशों में सरकार किसकी बनेगी? किसके नेतृत्व में बनेगी, सवाल यहां तक सीमित नहीं है। यह चुनाव कांग्रेस पार्टी और गांधी परिवार के लिए एक तरह से पॉलिटिकल सर्वाइवल का चुनाव है। दोनों जगहों पर राहुल गांधी और उनके करीबियों के नेतृत्व की परीक्षा है। दोनों राज्यों में राजनीतिक परिस्थितियां कांग्रेस और राहुल के लिए बहुत अनुकूल हैं। दोनों राज्यों में सरकारों के खिलाफ 10 साल की एंटी इनकंबेंसी है। अब यह विपक्ष पर निर्भर करता है कि लोगों को कैसे समझा पाते हैं कि अगर हमको सत्ता आप सौंपेंगे तो हम इनसे बेहतर करके दिखाएंगे। यह दावा न केरल में कांग्रेस पार्टी कर पा रही है और असम में तो बिल्कुल ही नहीं कर पा रही है।

चुनाव में जो भी पार्टियां लड़ रही होती हैं, उनमें से कौन जीत सकती है, इसका अहसास जब चुनाव प्रचार अपने चरम पर पहुंचता है तो होने लगता है। खासतौर से जब एंटी इनकंबेंसी लंबे समय की हो तब तो यह स्पष्ट लगने लगता है कि जो विपक्ष में पार्टी है, उसके जीतने की संभावना कितनी ज्यादा है। वह जीतती हुई लगनी चाहिए। केरल में अभी तक कांग्रेस पार्टी के नेतृत्व वाला गठबंधन जीतता हुआ नहीं लग रहा है। और असम में तो भाजपा जीतती हुई दिखाई दे रही है। दोनों राज्यों में कांग्रेस यह परसेप्शन बनाने में विफल रही है कि वह सत्ता में आ रही है। इसीलिए मैं कह रहा हूं कि राहुल गांधी का राजनीतिक भविष्य इन दोनों राज्यों के विधानसभा चुनाव तय करेंगे। यहां कोई बहाना नहीं है। इन दोनों राज्यों में एसआईआर कोई मुद्दा नहीं बना। कांग्रेस के पास कह सकते हैं कि अपेक्षाकृत युवा लीडरशिप है। राहुल गांधी बार-बार जेन-जी की बात करते हैं तो उनको केवल अराजकता दिखती है। उनको लगता है कि जेन-जी सड़क पर उतरेगा और नेपाल, बांग्लादेश की तरह सब बदल देगा। लेकिन उनको यह बात दिखाई नहीं दे रही है कि भारत का जेन-जी भजन मंडली बना रहा है। वह नए साल पर क्लबों में शराब की पार्टी नहीं कर रहा है, वह घंटों-घंटों लाइन लगाकर मंदिरों में जा रहा है। तो जेन-जी किस दिशा में जा रहा है और राहुल गांधी की सोच किस दिशा में जा रही है, इससे आप समझ लीजिए कि उनको जमीनी वास्तविकता की कितनी समझ है।

केरल और असम के विधानसभा चुनाव चुनावी राजनीति में राहुल गांधी की अब तक की सबसे बड़ी परीक्षा हैं। कांग्रेस असम तो नहीं जीतने जा रही, यह तय है। अगर केरल भी हार जाती है तो मुझे लगता है कि 2004 में जब राहुल गांधी राजनीति में आए थे,उसके बाद से उनके लिए सबसे बड़ा राजनीतिक झटका होगा। तो 4 मई का इंतजार कीजिए।

(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)