दक्षिण पंथ की राह पर समाजवाद का गढ़।

#pradepsinghप्रदीप सिंह।
बिहार की राजनीति एक नई करवट ले रही है। बिहार लंबे समय से समाजवाद के रास्ते पर चलता रहा है। लेकिन अब जो परिस्थिति बन रही है, उसमें लग रहा है कि वहां से समाजवाद की विदाई का समय आ गया है।
समाजवाद एक ऐसा नारा है, जो लंबे समय तक दुनिया के बहुत से देशों को लुभाता रहा है। भारत में भी बहुत से युवा इसके मोहपाश में रहे लेकिन इस समाजवाद और साम्यवाद ने भारत का जितना नुकसान किया है,शायद ही किसी और चीज ने किया हो। अब आप अगल-बगल के दो प्रदेशों को देख लीजिए। बिहार की तरह एक समय उत्तर प्रदेश में भी समाजवाद की हवा थी,लेकिन उत्तर प्रदेश ने वह रास्ता बहुत पहले छोड़ दिया। वहां आजकल जो नेता अपने को समाजवादी कहते हैं,दरअसल उनका समाजवाद से कोई लेना देना नहीं है। वे पूंजीवाद के सबसे विद्रूप चेहरे को रिप्रेजेंट करते हैं। समाजवाद छोड़ने के बाद आप उत्तर प्रदेश की प्रगति का आलम देखिए। दूसरी ओर जो बिहार समाजवाद को पकड़े रहा,उसका हाल देख लीजिए। उसे समाजवाद ने गरीबी, बेरोजगारी, पलायन के अलावा क्या दिया? लालू प्रसाद यादव के शुरुआती दिनों को छोड़ दीजिए तो उसके बाद कभी उनका समाजवाद से कोई लेना-देना नहीं था, लेकिन नीतीश कुमार का समाजवादी विचारधारा पर गहरा विश्वास था। उस विचारधारा पर वह चले भी। अब बिहार की राजनीति में आप मानकर चलिए कि नीतीश कुमार अनुपस्थित हैं। शुक्रवार को जब उन्होंने राज्यसभा सदस्य की शपथ ली तो उनका बिहार से नाता कट गया। अब उनकी पार्टी कब तक रहेगी,किस स्वरूप में रहेगी,यह कहना मुश्किल है, लेकिन इतना तय है कि अब बिहार की राजनीति दक्षिण मार्गी हो गई है। वह दक्षिण पंथ की ओर चलेगी। सवाल यह है क्या यह मंडल से कमंडल की ओर भी जाएगी क्योंकि कमंडल को सबसे लंबे समय तक उत्तर भारत में जिस राज्य ने रेजिस्ट किया, वह बिहार है। हालांकि वह कमंडल को पूरी तरह से रोक नहीं पाए। भाजपा वहां धीरे-धीरे बढ़ती रही और आज बिहार की नंबर एक पार्टी है। आने वाले समय में बिहार में भाजपा की विचारधारा चलेगी।
बिहार में नीतीश कुमार का नेतृत्व चले जाने से अब नेतृत्व भाजपा के हाथ में आ गया है और भाजपा नेतृत्व किसे सौंपेगी, यह अभी स्पष्ट नहीं है। इसी महीने बिहार को नया मुख्यमंत्री मिलने वाला है और यह भी तय है कि वह भाजपा का होगा। भाजपा के लिए यह बहुत बड़ा अवसर है,लेकिन उससे बड़ा अवसर है बिहार की राजनीति को बदलने का। यह बहुत बड़ी चुनौती है इसलिए भाजपा को ऐसे नेता का चुनाव करना होगा, जो यह काम करने की क्षमता रखता हो। वैसे अभी जो नाम चल रहे हैं, उन पर आप कोई भरोसा नहीं कर सकते कि वे कोई बदलाव ला सकते हैं। वे यथास्थिति को कुछ समय तक बरकरार रख सकते हैं और अगर वह बने रहे तो यथास्थिति और बुरी हालत में जाएगी, यह आप मान कर चलिए। नीतीश कुमार जैसी ईमानदारी और उनका परिवारवाद से दूर होना, ये दोनों गुण इस समय बिहार के किसी और नेता में नहीं हैं। हालांकि ऐसा कई बार होता है कि जिम्मेदारी मिलने पर लोग बदल जाते हैं। कई बार बुरे के लिए बदलते हैं और कई बार अच्छे के लिए बदलते हैं। तो भविष्य में क्या होगा यह तो पता नहीं है। मेरा मानना है कि भारतीय राजनीति में जनसंघ से लेकर भाजपा तक किसी राज्य में अगर भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती सामने आई है तो वह इस समय बिहार में आई है। बिहार में उसे केवल अपना मुख्यमंत्री चुनने का काम नहीं करना है। उसके सामने बिहार के पूरे परिदृश्य को बदलने की चुनौती है। वहां विकास के नए मानक गढ़ने,पलायन रोकने और रोजगार के अवसर पैदा करने की सारी जिम्मेदारी भाजपा पर आने वाली है।
बिहार में भाजपा के सामने राजनीतिक चुनौती कोई ज्यादा बड़ी नहीं है। सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी राष्ट्रीय जनता दल का जनाधार लगातार छीज रहा है और उसके पास जो नेता है, वह किसी योग्य नहीं है। भाजपा के सामने राज्य में सुशासन लाना सबसे बड़ी चुनौती है। उसको बताना है कि वह पार्टी विद अ डिफरेंस कैसे है। बिहार के लिए आखिर वह कौन सा मॉडल पेश करे, जो पूरे देश के लिए उदाहरण बने और बिहार के लोगों को लगे कि उन्होंने जो जनादेश दिया, उनका वह फैसला सही था। लोगों ने इसबार भाजपा और जेडीयू को बिहार को बदलने के लिए वोट दिया है। बिहार में नीतीश कुमार ने 2005 से 2013 के बीच जो काम किया, वह अभूतपूर्व था। हालांकि उसके बाद उनकी गाड़ी पटरी से उतरती-चढ़ती रही। लेकिन अब वह समय बीत चुका है। नीतीश कुमार नेपथ्य में जा चुके हैं। दुर्भाग्य से इस समय बिहार भाजपा में ऐसा कोई नेता नहीं दिखता जो सुशासन लाने की कसौटी पर खरा उतर सके। इसलिए अभी जो परिस्थिति है, उसमें केंद्र सरकार को लंबे समय तक बिहार में हैंड होल्डिंग करनी पड़ेगी। भले ही लोग आलोचना करें कि सरकार रिमोट से चलाई जा रही है, लेकिन इस समय इसी की जरूरत पड़ेगी वरना बिहार की राजनीति,समाज और शासन व्यवस्था में भाजपा जो परिवर्तन लाना चाहती है,वह आने वाला नहीं है।
बिहार में परिवर्तन की शुरुआत भाजपा को खुद को बदलने से करनी होगी। पार्टी को कड़े अनुशासन में यह काम करना पड़ेगा। बिहार में अपना मुख्यमंत्री बनाने का भाजपा का लक्ष्य पूरा हो गया है। राजनीतिक दृष्टि से तो वह एवरेस्ट के शिखर पर चढ़ चुकी है। अब वहां बने रहने और बने रहकर अपना झंडा गाड़ने की चुनौती है। क्या भाजपा ऐसा कर पाएगी? जब मुख्यमंत्री का चुनाव होगा, वहां से इसके संकेत मिलना शुरू हो जाएंगे। फिर जिस तरह का मंत्रिमंडल बनेगा और संगठन में जो बदलाव होगा उससे संकेत मिलेगा। सरकार जिस तरह से चलेगी, उससे और ज्यादा स्पष्ट संकेत मिलेगा।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)