ममता और दोनों द्रविड़ पार्टियों की हार से निकला संदेश।

#pradepsinghप्रदीप सिंह।
देश में क्षेत्रीय अस्मिता की राजनीति का एक लंबा दौर चला और अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग पार्टियों, नेताओं को उस राजनीति के कारण सफलता भी मिली। लेकिन वह पार्टियां आज इस सच्चाई को स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं कि क्षेत्रीय अस्मिता की राजनीति का समय जा चुका है।
अगर पिछले चार-पांच दशकों की बात करें तो क्षेत्रीय अस्मिता की राजनीति का सबसे सफल प्रयोग आंध्र प्रदेश में एनटी रामाराव ने किया जब उन्होंने तेलुगु देशम नाम की पार्टी बनाई। वह पहली बार चुनाव में उतरे और सत्ता में आ गए। तो बहुत से दलों को लगा कि क्षेत्रीय अस्मिता की राजनीति उनको सफलता दिला सकती है। हालांकि इससे पहले यह प्रयोग तमिलनाडु में द्रविड़ पार्टियां कर चुकी थीं और सफल भी हो चुकी थीं। उसके अलावा महाराष्ट्र में बाल ठाकरे की राजनीति भी वही थी। मराठी मानुष की राजनीति ने उनको सफलता दिलाई। यह अलग बात है कि उनकी पार्टी को स्पष्ट बहुमत कभी नहीं मिला। न उनके जीवित रहते हुए न उनके बाद। लेकिन बाल ठाकरे जब तक जीवित रहे महाराष्ट्र की राजनीति में प्रासंगिक बने रहे। उद्धव ठाकरे ने उसी रास्ते पर चलने की कोशिश की किंतु उनको समझ में नहीं आया कि काठ की हांडी बार-बार नहीं चढ़ती है। तो अब आप देखिए क्षेत्रीय अस्मिता की राजनीति किस तरह से एक-एक करके फेल हुई है। आंध्र प्रदेश में एनटीआर के जाने के बाद उस राजनीति पर किसी ने चलने की कोशिश नहीं की। लेकिन जब आंध्र प्रदेश के बंटवारे की मांग होने लगी तो के. चंद्रशेखर राव ने क्षेत्रीय अस्मिता की राजनीति पर चलने की कोशिश की। उन्होंने तेलंगाना राष्ट्र समिति बनाई। तेलंगाना बनने पर वह वहां के दो बार मुख्यमंत्री बने और उनको लगा कि यह अक्षय पात्र है। इसके जरिए हमेशा सत्ता में बने रह सकते हैं लेकिन तीसरे ही चुनाव में उनको पता चला कि वह अक्षय पात्र खाली हो चुका है। इसी तरह से महाराष्ट्र में ठाकरे परिवार को लगा कि मराठी मानुष-मराठी भाषा का मुद्दा हमेशा चलेगा और राजनीतिक लाभ देगा। लेकिन उद्धव और राज ठाकरे की राजनीति कब शुरू हुई और कब खत्म हो गई पता नहीं। राज ठाकरे की तो कभी कोई राजनीतिक हैसियत नहीं बन पाई।
तमिलनाडु में हाल के चुनाव में जो नतीजा आया है, उसने बता दिया है कि वहां की जनता भी अब इस क्षेत्रीय अस्मिता की राजनीति से ऊब चुकी है। वह नया विकल्प चाहती थी। वह विकल्प उसे एक्टर विजय की पार्टी टीवीके के रूप में मिला। यह पार्टी पहली बार चुनाव में उतरी और उसको सत्ता मिल रही है। लेकिन विजय को याद रखना होगा कि लोगों ने उन्हें क्षेत्रीय अस्मिता की राजनीति के नायक के रूप में नहीं चुना है। अगर उन्होंने उस रास्ते पर लौटने की कोशिश की तो वही हाल होगा जो द्रमुक और अन्नाद्रमुक का हुआ है। ये दोनों पार्टियां हाशिए की ओर जा रही हैं। लेकिन सबसे बड़ा झटका अगर किसी को लगा है तो वह हैं ममता बनर्जी। वह क्षेत्रीय अस्मिता की राजनीति पर तो चलीं लेकिन बंगाली अस्मिता क्या है,यह उनकी समझ में नहीं आया। बंगाली संस्कृति की मूल पहचान राष्ट्रवादी हिंदुत्व है लेकिन ममता बनर्जी उसके 180 डिग्री घूम गईं। उन्होंने बांग्ला संस्कृति के मूल राष्ट्रवादी हिंदुत्व पर ही कुठाराघात किया। उसी की जड़ें काटने की कोशिश की। ममता बनर्जी को लगा कि पेड़ की जड़ काटकर वह टहनियों और पत्तों को पानी देती रहेंगी तो पेड़ जीवित रहेगा। लेकिन 2026 आते-आते पश्चिम बंगाल के लोगों ने उनको बताया कि यह संभव नहीं है क्योंकि विकल्प के रूप में भाजपा आ गई थी।
तो ममता बनर्जी की ताकत बंगाली संस्कृति की अस्मिता की राजनीति नहीं थी बल्कि डर, गुंडागर्दी और हिंसा उनकी राजनीति की पहचान थी। उन्होंने भाषा का सवाल उठाने की कोशिश की। भोजन की पसंद का सवाल उठाने की कोशिश की लेकिन लोगों ने माना नहीं। उनसे पहले सीपीएम और कांग्रेस ने भी बांग्ला संस्कृति के मूल राष्ट्रवादी हिंदुत्व को दबाने की कोशिश की। लेकिन जो जड़ होती है वह धरती का सीना चीर कर बाहर निकलती है। पश्चिम बंगाल में थोड़ी देर से सही लेकिन निकली। आज बीजेपी 207 सीटों के साथ पश्चिम बंगाल में पहली बार सरकार बनाने जा रही है। तो क्षेत्रीय अस्मिता की राजनीति जो लोग करना चाहते हैं, उनके लिए यह राज्य और यह नेता सबक हैं कि इससे सीखें कि अब इस देश का मानस क्षेत्रीय अस्मिता की राजनीति के साथ चलने का नहीं रह गया है। इसीलिए दोनों द्रविड़ पार्टियां तमिलनाडु की सत्ता से बाहर हो गईं। क्षेत्रीय अस्मिता की राजनीति में भावनाएं भड़काना आसान होता है लेकिन लेकिन वह रास्ता कांटों से भरा होता है। यह बात आज शायद डीएमके और एआईडीएमके को समझ में आ रही होगी। महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे और उनके परिवार को भी समझ में आ रही होगी। लेकिन पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी को अभी समझ में नहीं आ रहा है। वह अब भी उसी पर अड़ी हुई हैं। देश में यह अनहोनी हो रही है कि चुनाव हारी हुई पार्टी का नेता कह रहा है कि हम मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा ही नहीं देंगे। अब इससे ज्यादा संविधान का अपमान और आप क्या कर सकते हैं? यह अलग बात है कि संवैधानिक स्थिति में उनके इस्तीफा देने या न देने से कोई फर्क नहीं पड़ता। 7 मई तक इस विधानसभा की मियाद है। 8 मई को नई विधानसभा का गठन हो जाएगा। अगर उस समय तक वह इस्तीफा नहीं देती हैं तो गवर्नर को उनको बर्खास्त करना पड़ेगा। चुनाव के दौरान वह जोर-शोर से बांग्ला संस्कृति का मुद्दा उठा रही थी कि ये बीजेपी वाले बांग्ला संस्कृति को नहीं समझते हैं, हम समझते हैं पर भवानीपुर के लोगों ने बताया कि और कोई समझता हो या नहीं, लेकिन आप तो बिल्कुल नहीं समझती हैं।
तो पश्चिम बंगाल में हिंदू राष्ट्रवाद का पुनरोदय हो रहा है। शुभेंदु अधिकारी पश्चिम बंगाल के नए मुख्यमंत्री होंगे,इसमें कोई शक नहीं है। उन्होंने अपना रास्ता भी स्पष्ट कर दिया है। उन्होंने कहा, नंदीग्राम में मुझे मुसलमानों ने वोट नहीं दिया इसलिए मैं नंदीग्राम के हिंदुओं के लिए काम करूंगा। यह संकेत था कि जो साथ देगा, उसका विकास होगा। वह बहुत ही प्रबल और बहुत मजबूत प्रशासक के रूप में उभरेंगे, इसके संकेत अभी से मिलने लगे हैं। ममता बनर्जी के लिए यह और बड़े संकट का कारण बनने वाला है। पश्चिम बंगाल में हिंदुत्व का विरोध करने वालों के लिए जो वातावरण बन रहा है,उसमें मुझे सरदार पटेल का एक बयान याद आता है। जब मुसलमान आजादी के बाद दंगा कर रहे थे तो लखनऊ के झंडेवाला पार्क में एक सभा में उन्होंने कहा था कि अगर दंगा करोगे तो धरती का तवा इतना गर्म करेंगे कि चूहों की तरह से बिल से बिलबिलाकर बाहर निकल आओगे। वही हाल पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी के गुंडा तंत्र का होने वाला है।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)