राहुल गांधी को बहुत भारी पड़ने वाली है हर किसी को धमकाने की आदत।

#pradepsinghप्रदीप सिंह।
कहते हैं कि बुरी आदतों का नतीजा कभी न कभी भुगतना ही पड़ता है। मुझे लगता है कि यह बात अब लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी को समझ में आ रही होगी।
राहुल गांधी की लोगों को धमकाने की आदत हो गई थी। किसी को भी धमकी देने में वह बड़ा गर्व महसूस करते थे। उनको लगता था कि वह अपनी शक्ति का प्रदर्शन कर रहे हैं। अपनी इसी आदत के चलते वह 12 अक्टूबर को जब भीड़ लेकर सुप्रीम कोर्ट पहुंचे तो उनको लगा कि बहुत बड़ा काम कर दिया। अब मैं तो सुप्रीम कोर्ट से भी नहीं डरता। सुप्रीम कोर्ट का कामकाज बंद होने के बाद राहुल तीन—चार हजार लोगों को लेकर रजिस्ट्री में पहुंच गए। उनके इस रवैये पर चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सूर्यकांत ने कड़ा रुख अपनाते हुए कहा कि कोई अदालत को धमका नहीं सकता। इसके बाद उन्होंने नोटिस जारी कर दिया। हालांकि उन्होंने किसी का नाम नहीं लिया पर कहा कि सुप्रीम कोर्ट परिसर में जो कुछ हुआ है उस पर हम एक व्यक्ति से स्पष्टीकरण मांगेंगे। सबको मालूम है कि वह व्यक्ति राहुल गांधी होंगे क्योंकि उस पूरी भीड़ में सबसे बड़ी जिम्मेदारी के पद पर राहुल गांधी ही थे। बहुत से लोगों के मन में सवाल होगा कि राहुल सुप्रीम कोर्ट पर चढ़ाई करके क्या हासिल क्या करना चाहते हैं? तो उसका जवाब है,वह बताना चाहते थे कि देखो यह है मेरी ताकत। उनकी यह आदत नई नहीं है। इसके मैं आपको कुछ उदाहरण दे रहा हूं।
2004 में यूपीए की सरकार बनने जा रही थी और 10 जनपथ में बैठक हो रही थी। उस बैठक में सोनिया गांधी, नटवर सिंह, मनमोहन सिंह, प्रणव मुखर्जी और राहुल गांधी थे। सोनिया गांधी प्रधानमंत्री बनना चाहती थीं। तभी राहुल गांधी ने कहा कि अगर आप प्रधानमंत्री बनेंगी तो मैं कुछ कर लूंगा। यह कोई सामान्य धमकी नहीं थी। कोई भी बेटा अगर ऐसी धमकी दे तो मां डर ही जाएगी और सोनिया गांधी उसके बाद रोने लगीं। इसके बाद सोनिया गांधी ने मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बनाने का फैसला किया। तो उस समय राहुल की धमकी चल गई। दरअसल राहुल गांधी के अंदर एक डिक्टेटर है, जो उनको बार-बार उकसाता है। उसके बाद राहुल ने दूसरी धमकी प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और उनकी पूरी कैबिनेट को दी। कैबिनेट से पास प्रस्ताव को प्रेस कॉन्फ्रेंस में फाड़ दिया और बताया कि तुम्हारी कोई औकात नहीं है। मैं तय करूंगा कि क्या कानून बनेगा और क्या नहीं बनेगा। यह पूरे देश और खासतौर से कांग्रेस के लोगों को संदेश था, लेकिन कांग्रेस पार्टी में किसी की हिम्मत नहीं थी क्योंकि बेटे को माताजी का आशीर्वाद प्राप्त था। इसी तरह 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को धमकी दी और कहा कि छह—आठ महीने इंतजार करो। इस देश का युवा इसको डंडे से मारेगा। यह उनकी भाषा थी। उसके बाद राहुल ने जांच एजेंसियों को धमकाना शुरू किया कि किसी को छोड़ेंगे नहीं। सबको जेल भिजवा देंगे। मतलब वह इस गलतफहमी में जी रहे हैं कि उनकी सरकार आएगी और वह प्रधानमंत्री बनेंगे। फिर उन्होंने संवैधानिक संस्थाओं पर हमला बोलना शुरू किया। राज्यसभा के सभापति और उपराष्ट्रपति को धमकी दी। लोकसभा के अध्यक्ष को धमकी दी। उनके खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाए। जब राम मंदिर का मामला आया था तो चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया को धमकी देने की कोशिश की। जस्टिस मिश्रा के खिलाफ महाभियोग के प्रस्ताव का नोटिस दिया गया था। यह अलग बात है कि बहुमत न होने से नोटिस स्वीकार नहीं हुआ। इसके बाद चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया बने रंजन गोगोई को धमकाने की कोशिश हुई। उनके स्टाफ में काम करने वाली एक महिला से उन पर आरोप लगवाया गया। यह अलग बात है कि वह किसी धमकी में नहीं आए और उन्होंने राम मंदिर के पक्ष में फैसला सुनाया। तो यह धमकी देने की उनकी बीमारी धीरे-धीरे बढ़ती जा रही थी। उनको लगा कि अपनी लगातार हो रही हार के लिए जिम्मेदारी से कैसे बचूं? तो उसका उन्होंने तरीका निकाला कि जनादेश की लेजिटिमेसी पर सवाल उठा दो। उसके लिए चुनाव आयोग को जिम्मेदार ठहराओ। उससे पहले उन्होंने ईवीएम पर ठीकरा फोड़ा। वह हो नहीं पाया तो बिहार में एसआईआर पर सवाल उठा दिया। उसका भी कोई असर नहीं हुआ, लेकिन उनको लगा कि लगातार इस मुद्दे पर हमला करते रहे तो इसका असर हो सकता है। इसीलिए अब वह चीफ इलेक्शन कमिश्नर ज्ञानेश कुमार के खिलाफ जिस तरह की भाषा बोल रहे हैं, वह गली का गुंडा भी नहीं बोल सकता है। इससे आप अंदाजा लगा सकते हैं कि उनके मन में संवैधानिक संस्थाओं के लिए कितनी घृणा भरी हुई है। राहुल गांधी को लगता है कि संवैधानिक संस्थाएं उनके प्रधानमंत्री बनने के रास्ते की सबसे बड़ी बाधा हैं। इनको ध्वस्त कर दो तो मैंडेट की लेजिटिमेसी खत्म हो जाएगी। तो जैसे—जैसे इस मुद्दे पर राहुल गांधी आक्रामक होते जा रहे हैं, वैसे—वैसे वह अपने को और ज्यादा एक्सपोज करते जा रहे हैं। अब उन्होंने राष्ट्र विरोधी शक्तियों से भी हाथ मिला लिया है। ऐसा नहीं है कि पहले साथ वह उनके नहीं थे, लेकिन अब खुलकर सामने आ गए हैं। एक यूट्यूबर जर्मनी में बैठकर भारत के खिलाफ जहर उगलता रहता है। उसने कहा कि सेना और पुलिस को सड़क पर आ जाना चाहिए। राहुल गांधी उसके समर्थक हैं। सीजेपी वाले जो बाहर वालों से पैसा लेकर आए हैं और अराजकता फैलाना चाहते हैं। अब राहुल गांधी को लग रहा है कि इनको साथ लिए बिना आगे नहीं बढ़ पाएंगे। राहुल के गुरु सैम पित्रोदा भी फिर से मैदान में आ गए हैं। उन्होंने जॉर्ज सोरोस से अपील की है कि वह 10 बिलियन डॉलर भारत में रिजीम चेंज करने के लिए खर्च करें। प्रशांत भूषण प्रेस कॉन्फ्रेंस करके कह रहे हैं कि हां, हम रिजीम चेंज कराना चाहते हैं।
राहुल गांधी के पूरे व्यवहार को आप एनालाइज कर लीजिए। जब उसके पास सत्ता होती है तो उनके अंदर बैठा डिक्टेटर बहुत प्रभावी दिखता है। तब वह भारत जैसे देश के प्रधानमंत्री और उनके पूरे मंत्रिमंडल को अपमानित कर सकता है। अब सवाल यह है कि 12 साल से सत्ता तो है नहीं। ऐसे में इस डिक्टेटर का प्रभाव खत्म हो गया। इसीलिए अब वह गाली गलौज पर उतर आए है। अब वह कोई फैसला नहीं करवा सकते। सिर्फ गालियां दे सकते हैं और गाली देते—देते इतना मन बढ़ा कि सुप्रीम कोर्ट के खिलाफ चले गए। अब उनको पता चलेगा कि सुप्रीम कोर्ट के खिलाफ मोर्चा खोलने का मतलब क्या होता है? सुप्रीम कोर्ट को मालूम है कि किसने लक्ष्मण रेखा लांघी है और ऐसे लोगों के साथ क्या होना चाहिए? उम्मीद करनी चाहिए कि सुप्रीम कोर्ट इस मामले में कोई नरमी नहीं बरतेगा। राहुल गांधी पहली बार सुप्रीम कोर्ट के लपेटे में ठीक से आए हैं। एक बार पहले आए थे तो बिना शर्त लिखित माफी मांग कर छूटे थे। इस बार क्या होगा, यह देखने वाली बात है।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)