#pradepsinghप्रदीप सिंह।
भारत में हिंदू-मुस्लिम संबंध सुधारने की लगातार कोशिश होती रही है, आजादी से पहले भी और आजादी के बाद भी। मैं यहां आजादी के बाद की बात कर रहा हूं। इसमें कभी सफलता नहीं मिली जिसके कई कारण हैं। अभी हाल ही में सर संघचालक मोहन भागवत ने एक प्रयास किया। वह पहले पांच मुस्लिम बुद्धिजीवियों से मिले और उसके बाद इमाम काउंसिल के चेयरमैन से मस्जिद में जाकर मिले। इस तरह का प्रयास संघ की ओर से पहला नहीं है। 1961 में पहली बार गुरु गोलवलकर ने एक कोशिश की थी। तब वह अरबी स्कॉलर सैफुद्दीन जिलानी से मिले थे और उनको बताया था कि हिंदुओं की मुसलमानों से समस्या क्या है। साथ ही यह बताया कि किस तरह के सुधार की जरूरत है और कैसे इस समस्या का समाधान खोजा जा सकता है। 

बड़ा झूठ

इस समस्या का समाधान अगर कहीं है तो वह इस्लाम के सुधार में है। बातचीत की कोशिश से, सरकारी योजनाओं से, वोट मांगने से, तुष्टीकरण से ये समस्या हल होने वाली नहीं है। मोहन भागवत ने मुस्लिम बुद्धिजीवियों से कहा कि हिंदुओं के लिए काफिर शब्द का इस्तेमाल सबसे ज्यादा खटकता है। भारत के मुस्लिम समाज में इस पूरे मुद्दे को दूसरी दिशा में ले जाने की कोशिश हो रही है। यह बताने की कोशिश हो रही है कि यह ऐसा बुरा शब्द नहीं है और केवल हिंदुओं के लिए नहीं है। काफिर शब्द का इस्तेमाल होता है इस्लाम को नहीं मानने वालों के लिए। इसमें एक नया तर्क यह आया है कि जो भी एकेश्वरवादी मजहब हैं वहां इस तरह का होता है क्योंकि वे एक ही ईश्वर को मानते हैं- उसके अलावा किसी ईश्वर को माना नहीं जा सकता। इससे बड़ा झूठ कोई और नहीं हो सकता। आप समाधान खोजने निकलें और झूठ का सहारा लें तो फिर आपकी नीयत पर शक होने लगता है। यहूदी धर्म सबसे पुराना एकेश्वरवादी मजहब है। उसमें कहीं भी इस बात का जिक्र नहीं है कि गैर-मजहबियों के लिए क्या शब्द इस्तेमाल किया जाए। दूसरा है ईसाई धर्म जो इस्लाम से 600 साल पहले आया। ईसाई धर्म को आए हुए दो हजार साल और इस्लाम को आए हुए 14 साल हुए हैं। ईसाई धर्म में भी गैर-मजहबियों के लिए ऐसा कोई शब्द इस्तेमाल नहीं किया जाता जिसके अर्थ निकलते हैं कि आप दोयम दर्जे के व्यक्ति हैं। आपको जीने का अधिकार नहीं है। इसके अलावा सनातन धर्म की जो विभिन्न शाखाएं हैं बौद्ध, सिख और जैन धर्म उनमें भी, जो धर्म को मानने वाले नहीं हैं या गैर-धर्म के लोग हैं उनके लिए कोई ऐसा शब्द इस्तेमाल नहीं होता है।

हिंदुओं को काफिर कहना

यह समस्या सिर्फ इस्लाम के साथ क्यों है? इसका कारण यह है कि इस्लाम मूल रूप से एक राजनीतिक मजहब है। इस शब्द का इजाद उस दौर में किया गया जब इस्लाम तलवार के बल पर पूरी दुनिया को फतह करने निकला था। इसलिए हिंदू-मुस्लिम एकता की जितनी भी कोशिशें होती हैं वह नाकाम होती हैं क्योंकि काफिर शब्द का मतलब केवल उस धर्म को नहीं मानने वाला नहीं होता है- बल्कि उसका मतलब होता है ऐसा व्यक्ति जिसे दोयम दर्जे का नागरिक होना चाहिए, उसे कोई अधिकार नहीं मिलना चाहिए, वह बहुत निकृष्ट व्यक्ति होता है। यह इतने तक ही होता तो शायद गनीमत होती, इस्लाम में यह भी है कि ऐसे व्यक्ति को जीने का अधिकार नहीं है। जब आप गैर-इस्लामी लोगों के लिए इस तरह के शब्द का इस्तेमाल करते हैं तो फिर आप कैसे उम्मीद करते हैं कि आपस में भाईचारा होगा। मैं बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर की इस संबंध में कही हुई बात कई बार कह चुका हूं। वह बात मुझे दिल से समझ में आती है कि यह मूल कारण है। अपनी बात को स्पष्ट करने के लिए उनकी बात को मैं फिर दोहरा रहा हूं। उन्होंने कहा था, “इस्लाम का जो भाईचारा है वह यूनिवर्सल ब्रदरहुड नहीं है, वह एक क्लोज कॉरपोरेशन है। केवल इस्लाम के मानने वालों के लिए है, जो इस्लाम को नहीं मानता है उनके लिए ईर्ष्या, द्वेष, घृणा और दुश्मनी यह सब कुछ है। इसलिए सनातन धर्म और इस्लाम को मानने वालों का इस तरह का मेलजोल कभी हो नहीं सकता।”

बिना सुधार भाईचारा मुमकिन नहीं

उसमें कोढ़ में खाज में यह है कि मुस्लिम और मुगल शासकों के राज्य में जो अत्याचार हुए, मंदिर तोड़े गए, जबरन धर्म परिवर्तन कराया गया, कत्लेआम और बलात्कार हुआ वह सब कुछ सनातन धर्म के मानने वालों की स्मृति से खत्म नहीं हुआ है। जब तक उसका खात्मा नहीं होता, जब तक मुस्लिम समाज की ओर से इसके बारे में स्पष्टीकरण नहीं आता, जब तक वह अपने को इससे दूर नहीं करते तब तक भाईचारा मुमकिन नहीं दिखता। संघ की जो कोशिश है, गुरु गोलवलकर से लेकर मोहन भागवत तक, वह यह है कि भारत का मुसलमान भारतीय मुसलमान बन कर रहे उसका अरबीकरण न होने पाए। इसी को रोकने की कोशिश होती है। उन्हें यह बार-बार समझाने की कोशिश होती है कि आपका रिश्ता अरब से नहीं है। आपका रिश्ता अकबर, औरंगजेब, अलाउद्दीन खिलजी, मोहम्मद गौरी, गजनी और गजनवी से नहीं है। मगर भारत के मुसलमानों का एक बड़ा वर्ग, खासकर अशरफ वर्ग- जो पढ़ा-लिखा है- वह हमेशा खुद को उन्हीं लोगों से जोड़ता है। उन लोगों से जोड़ने का नतीजा यह है कि जैसे ही वह खुद को उन लोगों से जोड़ता है वैसे ही हमको अतीत में हुए सारे अत्याचार याद आ जाते हैं। यह एक तरह से घाव को कुरेदने जैसा है। अब आप बताइए कि कोई व्यक्ति आजाद हिंदुस्तान में, किसी लोकतांत्रिक देश में अपने बेटे का नाम तैमूर, औरंगजेब, गजनी या गजनवी कैसे रख सकता है। यह मानसिकता बताती है कि सोच बदली नहीं है और सोच बदलने को तैयार भी नहीं हैं। अगर गरीब और अनपढ़ मुस्लिम तबके को बदलने का काम उनके बीच रहकर किया जाए तो जो मुल्ला-मौलवी हैं, जो अशरफ वर्ग के बुद्धिजीवी हैं वह नहीं होने देता है। उनको लगता है कि अगर इनको समझ में आ गया कि इससे बाहर भी दुनिया है तो फिर हमारे लिए सारे रास्ते बंद हो जाएंगे।

समस्या की जड़- शरिया

 

संघ की ओर से तमाम कोशिशें हुई हैं, राष्ट्रीय मुस्लिम मंच बनाकर मुसलमानों के बीच में काम करने की भी कोशिश हुई है लेकिन जितनी बार भी कोशिश होती है उतनी बार उधर से यह संदेश आता है कि हम इसके लिए तैयार नहीं हैं। आप कुछ भी कर लीजिए, हम आप पर विश्वास करने के लिए तैयार नहीं है। दूसरी बात यह है कि जितनी भी कोशिशें हुई हैं सब हिंदू समाज की ओर से हुई हैं, मुस्लिम समाज की ओर से कोई कोशिश नहीं हुई है। अगर समस्या का हल निकल सकता तो जितने मुस्लिम देश हैं उनमें मारकाट न हो रही होती। आप कह सकते हैं कि यह हिंदू-मुसलमान का मुद्दा है, आप हिंदुओं को दोष दे सकते हैं लेकिन सवाल यह है कि मुस्लिम देशों में ऐसा क्यों हो रहा है। पड़ोसी पाकिस्तान में देख लीजिए, पहले उन्होंने हिंदुओं, सिखों, बौद्धों, जैनों और ईसाइयों को मारा। जब इनको मार कर लगभग खत्म कर दिया तो अब मुसलमानों को मार रहे हैं। सवाल यह है कि कुछ तो गड़बड़ी है, कुछ तो ऐसी चीज है जिसको ठीक किए जाने और जिसका सुधार होने की जरूरत है। यह बात जब तक मुस्लिम समुदाय- खासतौर पर उसके बुद्धिजीवी वर्ग को समझ में नहीं आती है, उसकी ओर से जब तक यह कोशिश नहीं होती- जब तक इस्लाम के स्कॉलर्स के बीच में इसकी चर्चा नहीं होती- यह समझने की कोशिश नहीं होती कि आखिर ऐसा क्यों है कि जहां भी इस्लाम है वहां लोकतंत्र नहीं है- लोकतंत्र और इस्लाम का यह विरोधाभास, यह परस्पर बैर इसलिए है कि उसकी जड़ें कहीं न कहीं शरिया में हैं।

सनातन धर्म जैसी सहिष्णुता कहीं नहीं

अब आप देखिए कि ये एकेश्वरवादी किस तरह से काम करते हैं। जितने भी मुस्लिम, ईसाई या यहूदी बहुल देश हैं वे सब उस धर्म के आधार पर हैं। भारत एकमात्र ऐसा देश है जो हिंदू बहुल होते हुए भी हिंदू राष्ट्र नहीं बना। यह सोच समझ कर, तय करके नहीं बना लेकिन 75 साल में जो कुछ हुआ है वह यह सोचने पर मजबूर करता है कि हमने 1947 में जो फैसला लिया वह गलत फैसला था। वह फैसला इसलिए लिया गया था और यह मानकर लिया गया था जिसमें सच्चाई भी है कि सनातन धर्म में सब धर्मों को समाहित करने की क्षमता है। सनातन धर्म में जिस तरह की सहृदयता है और जिस तरह की सहिष्णुता है वह किसी और धर्म में नहीं है। इसीलिए हजारों साल से अलग-अलग मजहब के लोग भारत में रहे और शांति पूर्वक रहे। जब तक मुस्लिम और  मुगल शासक नहीं आए और जब तक उनका अत्याचार नहीं शुरू हुआ, शांति बनी रही। उसके बाद भी मुसलमानों को भारत में रखने में रुचि अगर किसी की थी तो वह हिंदुओं की थी। भारत का विभाजन न होने पाए इसकी मांग सबसे ज्यादा हिंदुओं की ओर से हुई। 1946 के काउंसिल चुनाव में जितनी मुस्लिम बहुल सीटें थी उन सबमें मुस्लिम उम्मीदवार ही जीते। कांग्रेस उस समय की मुख्य पार्टी थी और उसके अध्यक्ष एक मुसलमान मौलाना अब्दुल कलाम आजाद थे। उनके नेतृत्व में कांग्रेस पार्टी ने जो सीटें जीती वह हिंदू बहुल सीटें थी। भारत में जो यह समावेशी राजनीति है, सनातन धर्म की जो यह सहिष्णुता है वह और किसी मजहब में नहीं है। इसलिए हम कितनी भी कोशिशें करते रहें, कामयाब नहीं होगी। दो ऐसे मुद्दे हैं जो इस कोशिश को कामयाब नहीं होने देते। एक है इस्लाम में सुधार न करने की जिद और दूसरा है भारतीय मुसलमानों का खुद को इस देश पर बार-बार आक्रमण करने वाले, अत्याचार करने वाले, इस देश की संस्कृति को नष्ट करने और सनातन धर्म को खत्म करने की कोशिश करने वालों से अपने को जोड़ने की कोशिश। ये दो चीजें जब तक होती रहेंगी तब तक हिंदू-मुस्लिम एकता की कोई भी कोशिश सफल नहीं होने वाली। यह बात हमको अच्छी तरह से समझ लेनी चाहिए।

बातचीत के लिए बातचीत

यह ठीक है कि बातचीत के लिए बातचीत होनी चाहिए लेकिन उसकी भी एक सीमा है। कब तक हम यही काम करते रहेंगे। पाकिस्तान से संबंध सुधारने की कोशिश में हम यही करते रहे कि बातचीत होनी चाहिए, बातचीत से ही हल निकलता है लेकिन क्या निकला। युद्ध भी कर लिया, बातचीत भी कर ली लेकिन कोई हल नहीं निकला। आखिर में बातचीत का रास्ता बंद करना पड़ा। जब हम पाकिस्तान को बातचीत का मौका देते हैं तो वह नए हमले की तैयारी करता है। इसको देखते हुए मेरा तो स्पष्ट मानना है कि हिंदू-मुस्लिम एकता की कोशिश छोड़ देनी चाहिए और उस समय तक छोड़ देनी चाहिए जब तक मुस्लिम समाज आगे बढ़ कर यह न कहे कि हम इन दो मुद्दों पर सुधार के लिए तैयार हैं, उसके बिना कोई रास्ता निकलने वाला नहीं है।

(लेखक राजनीतिक विश्लेषक और ‘आपका अख़बार’ न्यूज़ पोर्टल और यूट्यूब चैनल के संपादक हैं)