ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट को एनजीटी की मंजूरी से धरे रह गए मंसूबे।

#pradepsinghप्रदीप सिंह।

कांग्रेस पार्टी,सोनिया गांधी और राहुल गांधी भारत में चीन के सबसे बड़े पैरोकार हैं। चीन जब भी मुश्किल में आता है राहुल गांधी हमेशा उसके समर्थन में खड़े होते हैं। इस बार चीन के बचाव में सोनिया गांधी ने आगे कदम बढ़ाया है। उन्होंने भारत के ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट का यह कहकर विरोध किया कि इससे निकोबारी जनजातीय समूह का अस्तित्व खतरे में पड़ जाएगा और पर्यावरण को खतरा होगा।

इस प्रोजेक्ट के विरोध में उन्होंने लेख लिखा। सोनिया के समर्थन में कई पर्यावरणविद भी आ गए और इस प्रोजेक्ट का विरोध करने लगे। सोनिया गांधी को यह दिखाई नहीं देता है कि इस प्रोजेक्ट का भारत की रणनीतिक, सामरिक और व्यापारिक दृष्टि से क्या महत्व है। भारत के आर्थिक विकास के लिए क्या महत्व है?

ग्रेट निकोबार 92,000 करोड़ की परियोजना है, जो 2040 तक पूरी होगी। इसमें ग्रेट निकोबार में डीप सी पोर्ट बनेगा, एक नई टाउनशिप बनेगी, जिसमें लाखों लोगों को बसाया जाएगा, 450 मेगावाट का पावर प्रोजेक्ट लगेगा, नागरिकों और सेना के लिए एयरपोर्ट बनेगा।

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अब सवाल है कि सोनिया गांधी इसका विरोध क्यों कर रही हैं? उसका कारण है कि इस परियोजना के पूरा होने के बाद हिंद महासागर में चीन की जो बढ़त है, वह खत्म हो जाएगी। भारत दुनिया का ट्रेडिंग और मैन्युफैक्चरिंग हब बन जाएगा। जो डीप सी पोर्ट होते हैं उनकी गहराई करीब 18 से 20 मीटर होती है। हमारे जो पोर्ट हैं उनकी गहराई 12 मीटर से कुछ ज्यादा है। इसलिए बड़े जहाज वहां नहीं आ सकते। हमें सिंगापुर, दुबई और श्रीलंका में अपना सामान उतारना पड़ता है। वहां से कंटनरों को छोटे-छोटे जहाजों से भारत लाया जाता है। उससे लॉजिस्टिक्स की कॉस्ट कई गुना बढ़ जाती है। दूसरा हमारा 40% ट्रांसशिपमेंट श्रीलंका के हंबनटोटा पोर्ट से होता है। उस पर चीन का कब्जा है। चीन वहां अपने जासूसी जहाज भी तैनात रखता है,जिससे हमारी सुरक्षा के लिए हमेशा खतरा बना रहता है और हमारी उस पर निर्भरता भी बनी रहती है। ग्रेट निकोबार परियोजना पूरी हो जाने के बाद यह सब खत्म हो जाएगा। यूं समझिए इससे हमको एक सिंगापुर मिल जाएगा। आप समझ सकते हैं कि दुनिया के समुद्री व्यापार में सिंगापुर का क्या योगदान है।

Great Nicobar Island Development Project - IAS EXAM
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यह परियोजना भारत के दक्षिणी छोर पर बन रही है। यह मलक्का जलडमरू मध्य, जहां से दुनिया भर का 30-40% समुद्री व्यापार होता है,के निकट होगा। इस पोर्ट के बनने से भारत की सैन्य और व्यापारिक क्षमता में कोई छोटा-मोटा परिवर्तन नहीं आएगा,बल्कि वह गेम चेंजर साबित होगा। सैन्य रणनीति, सुरक्षा, व्यापार और पर्यावरण इन चारों दृष्टियों से यह परियोजना बहुत महत्वपूर्ण है। तो इसका विरोध कौन सा बहाना बनाकर किया गया? एक तो पर्यावरण को नुकसान होगा और दूसरा वहां की मूल जनजाति के अस्तित्व को खतरा पैदा हो जाएगा और आपको मालूम है कि कांग्रेस को उसका साथ देने वाले ऐसे पर्यावरणविद आसानी से मिल जाते हैं क्योंकि उनमें से ज्यादातर विदेशी एजेंसियों के इशारे पर काम करते हैं और विदेशी एनजीओ से इनको फंडिंग मिलती है। मेधा पाटकर को अपना भूले नहीं होंगे। उन्होंने नर्मदा परियोजना का कितना और कितने लंबे समय तक विरोध किया। सालों एक झूठा अभियान चलाया गया। आखिर में सुप्रीम कोर्ट में उनको हार का सामना करना पड़ा और नर्मदा परियोजना पूरी हो पाई।

ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट के मामले में भी कलकत्ता हाईकोर्ट में कई याचिकाएं दायर की गई हैं, लेकिन अच्छी बात यह है कि नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने इस प्रोजेक्ट को पर्यावरण की क्लीयरेंस दे दी है। यह परियोजना अब शुरू हो जाएगी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का 2047 में विकसित भारत बनाने का जो अभियान है,उस दिशा में इस परियोजना की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका है। जिस तरह से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी काम करते हैं,आप मानकर चलिए कि यह परियोजना 2040 से पहले पूरी हो जाएगी। देश के विकास की सोचने नेता और एक चुनाव जीत लिया दूसरा कैसे जीतेंगे सिर्फ यह लक्ष्य रखने वाले नेता के विजन में बहुत फर्क होता है। देश की सुरक्षा और विकास के लिए दूरगामी योजना वही प्रधानमंत्री बना सकता है जिसको अपनी क्षमता और देश की क्षमता पर भरोसा हो। तो भारत को नुकसान पहुंचाने और चीन की मदद करने की कांग्रेस और सोनिया गांधी की एक और कोशिश नाकाम हो गई है।

चीन दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था और सैन्य ताकत है। उससे हमारे संबंध कभी अच्छे नहीं रहे और होंगे फिलहाल इसकी भी उम्मीद नहीं है। ऐसे में चीन की मदद करने का मतलब है भारत का विरोध करना। और कांग्रेस इस हद तक जाने के लिए तैयार है। कांग्रेस ने चीन के साथ 2008 में जो एमओयू साइन किया था,उसके बारे में आज तक नहीं बताया है। कांग्रेस पार्टी जो हर मुद्दे पर सरकार से सवाल पूछती है वह खुद इस सवाल का जवाब नहीं देती है। आप संसद में और संसद के बाहर देखिए,जब भी चीन का मामला आता है राहुल गांधी और कांग्रेस उसके बचाव में खड़े नजर आते हैं। राहुल जो भी भाषण देते हैं, वह चीन की प्रशंसा और भारत को नीचा दिखाने के लिए होता है। वह कभी गलवान में चीन को सबक सिखाने के लिए अपनी सेना की प्रशंसा नहीं करते। हमारे सैनिकों ने बिना किसी हथियार के चीन को एक इंच भूमि पर कब्जा नहीं करने दिया। सलामी स्लाइसिंग की चीन की सदियों पुरानी नीति रही है लेकिन पिछले 11 सालों में वह चल नहीं पाई। 11 सालों में यह पहली बार हुआ कि वह भारत की एक कतरा जमीन हासिल नहीं कर पाया वरना 1962 में तो उसने भारत के 38,000 स्क्वायर किलोमीटर इलाके पर कब्जा कर लिया था।

तो उस चीन का समर्थन जो करता है, वह कम से कम देश का हितैषी तो हो नहीं सकता। इस महत्वाकांक्षी परियोजना के विरोध में सोनिया ने अखबारों में लेख लिखे। लेकिन अपने प्रयासों में सफल नहीं हो पाईं। चीन को हिंद महासागर में अगर घेरना है तो इस परियोजना का सफल होना बहुत जरूरी है वरना भारत अपना सैन्य वर्चस्व नहीं बना पाएगा। सोनिया,राहुल और कांग्रेस इसी को रोकना चाहते हैं। अभी तक उनको सफलता मिली नहीं है, लेकिन यह मत समझिएगा कि उन्होंने प्रयास छोड़ दिया है।

(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)