#santoshtiwariडॉ. संतोष तिवारी।
भारतीय मूल के ऐसे कई वैज्ञानिक हुए जिन्होंने विदेश जाकर शोध कार्य किया और बाद में उन्हें नोबेल पुरस्कार मिला। लेकिन सर रोनाल्ड रॉस (Sir Ronald Ross 1857-1932) अकेले ऐसे विदेशी वैज्ञानिक हैं जिन्होंने अपना मूल शोध कार्य भारत में किया था और बाद में उन्हें नोबेल प्राइज मिला। सर रोनाल्ड रॉस का जन्म सन् 1857 में अल्मोड़ा जिले में हुआ था। आपके पिताजी ब्रिटिश सेना में जनरल थे। सर रोनाल्ड रॉस विश्व के ऐसे पहले वैज्ञानिक थे जिन्होंने सन् 1897 में यह पता लगाया था कि मलेरिया की बीमारी मच्छरों द्वारा होती है। और यह पता लगाने के बाद ही इस बीमारी का इलाज शुरू हो पाया। सर रोनाल्ड रॉस ने भारत में लगभग 25 वर्ष तक इंडियन मेडिकल सर्विस में काम किया। उन्होंने अपने 75 वर्ष के जीवनकाल का लगभग एक तिहाई हिस्सा भारत में ही बिताया था।

मलेरिया के बारे में उनका उनका रिसर्च पेपर सबसे पहले भारत में ही 27 अगस्त 1897 को इंडियन मेडिकल गजट में प्रकाशित हुआ था। बाद में यह रिसर्च पेपर दिसंबर 1897 में ब्रिटेन के ब्रिटिश मेडिकल जर्नल में प्रकाशित हुआ। सन 1902 में सर रोनाल्डो रॉस को इस शोध कार्य के लिए नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

इस लेख के लेखक को अर्थात मुझे भी रोनाल्डो रॉस के बारे में कोई जानकारी नहीं थी। परंतु हाल ही में मैं अपने मित्र प्रोफेसर ए. पी. दाश की आत्मकथा पढ़ रहा था। उसमें रोनाल्ड रॉस  के बारे में कई जगह जिक्र था। बाकी कुछ जानकारी उनके बारे में मैंने इंटरनेट से ढूंढी। प्रोफेसर आदित्य प्रसाद दाश की आत्मकथा का टाइटल है: A DASH OF HOPE. यह पुस्तक पहले अमेरिका में Black Eagle Books ने प्रकाशित की। और अब यह भारत में भी प्रकाशित हो गई है। प्रोफेसर आदित्य प्रसाद दाश का भी मलेरिया पर गहन शोध कार्य है। सन् 2022 में भारत सरकार ने प्रोफेसर दाश को विज्ञान और इंजीनियरिंग के क्षेत्र में पद्मश्री से सम्मानित किया। मेरी उनसे भेंट तब हुई थी जबकि वे सेंट्रल यूनिवर्सिटी आफ तमिलनाडु के वाइस चांसलर थे। तब उन्होंने मुझे यह बताया था कि कि भारत में मलेरिया का उन्मूलन में क्या-क्या कठिनाइयां हैं।

अपनी आत्मकथा A DASH OF HOPE में प्रोफेसर दाश ने लिखा कि बचपन में उन्हें भी मलेरिया हुआ था।

बाद में प्रोफेसर दाश ने अपना कैरियर भी  मलेरिया के क्षेत्र में सीनियर रिसर्च आफिसर के तौर पर शुरू किया था। इसके बाद धीरे-धीरे उन्होंने कई महत्वपूर्ण पदों पर काम किया जिनमें शामिल हैं:

Director, Institute of Life Science, Bhubaneswar;
Director, National Institute of Malaria Research, New Delhi;
Director, Centre for Research in Medical Entomology, Madurai;
Director, Desert Medicine Research Centre, Jodhpur;
President, National Academy of Vector Borne Disease;
Vice chancellor Central University of Tamil Nadu;
Vice chancellor, Asian institute of Public Health University;
आदि।

प्रोफेसर दाश विश्व स्वास्थ्य संगठन अर्थात वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन (WHO) के दक्षिण पूर्व एशिया के लिए क्षेत्रीय सलाहकार भी रहे।
भारत में मलेरिया उन्मूलन का कार्यक्रम सन् 1950 के दशक से चल रहा है। मलेरिया के मरीज भारत में धीरे-धीरे कम होते जा रहे हैं। ऐसा लक्ष्य है कि सन् 2030 तक भारत में मलेरिया का पूर्णतः उन्मूलन हो जाए।

मलेरिया वेक्टरजनित बीमारी है। वेक्टरजनित बीमारी उसे कहते हैं जो मच्छर, मक्खी आदि के जरिए फैलती हैं। मलेरिया का तो उन्मूलन हो जाएगा,  लेकिन वेक्टरजनित कुछ अन्य कई भयंकर बीमारियां भी हैं जिनका उन्मूलन होना अभी बाकी है। वे हैं: डेंगू, चिकनगुनिया,  जापानी एन्सेफेलाइटिस, आदि।

रॉस और दाश दोनों ही ईश्वर भक्त

रोनाल्ड रॉस और प्रोफेसर दाश में एक समानता यह भी है कि दोनों ही ईश्वर में विश्वास रखते हैं।

रोनाल्ड रॉस ने जब मलेरिया के बारे में शोध किया तो उसे ईश्वर को समर्पित करते हुए अंग्रेजी में एक कविता लिखी:
This day relenting God
Hath placed within my hand
A wondrous thing; and God
Be praised. At His command,
Seeking His secret deeds
With tears and toiling breath,
I find thy cunning seeds,
O million-murdering Death. …

यह कविता कोलकाता में एक शिला पट पर रोनाल्ड रॉस स्मारक में उन्हीं के नाम से लिखी हुई है।

अपनी आत्मकथा A DASH OF HOPE में प्रोफेसर दाश ने लिखा कि सन् 1982 से उन्होंने गायत्री मंत्र का जाप शुरू किया था। पहले आठ-दस महीने तक दस बार यह मंत्र जाप करते थे। फिर धीरे-धीरे 108 बार करने लगे। सन् 1988-90 में कुछ परेशानियां बढ़ीं, सुबह-सुबह दोपहर शाम तीनों बार 108-108 बार गायत्री मंत्र का जाप करने लगे। यह क्रम कई वर्ष  तक चला।  फिर जिम्मेदारियां बढ़ने के साथ-साथ इतना समय देना मुश्किल हो गया, तो भी अभी तक वह सुबह के वक्त गायत्री मंत्र का जाप अवश्य करते हैं। गायत्री मंत्र ऋग्वेद का एक महत्वपूर्ण मंत्र है।

प्रोफेसर दाश की पत्नी भी भुवनेश्वर में सिद्धयोग साधना केन्द्र चलाती हैं और वहां हर माह नियमित सत्संग आयोजित करती हैं।

प्रोफेसर दाश अयोध्या में 22 जनवरी 2024 को राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा समारोह में भी शामिल हुए थे।

प्रोफेसर दाश ने अपनी आत्मकथा में यह भी लिखा कि भारत में विज्ञान के शोध कार्य में क्या सुधार की जरूरत है।

लगभग 400 पृष्ठों की इस पुस्तक में वाइस चांसलरों की नियुक्तियों आदि के बारे में कई रोचक तथ्य दिए गए हैं।

वैज्ञानिकों की  रहस्यमय मृत्यु
इस पुस्तक में एक अध्याय है – Vanishing  Scientists। इसमें यह बताया है कि किस प्रकार से हमारे कुछ वैज्ञानिकों का रहस्यमय परिस्थितियों में अंत हुआ या किसी ने आत्महत्या कर ली।
भारत में यह पुस्तक Amazon पर भी उपलब्ध है और इसके पेपर बैक संस्करण का मूल्य चार सौ रुपए है।
(लेखक सेवानिवृत्त प्रोफेसर हैं)