जिसके जैसा न कोई था- न है- और न होगा।

प्रदीप सिंह।
देश में वैसे तो किस्म किस्म के नेता हुए हैं। आजादी के आंदोलन के समय से देखें- उसके बाद देश के विभाजन के बाद से देखें- या फिर इस दौर में देखें… अलग-अलग पार्टियों में अलग-अलग तरह के नेता हुए हैं। उनकी अलग-अलग खूबी होती है। किसी की बोलने की अलग स्टाइल होती है तो किसी के संवाद की। कुछ अच्छे संगठनकर्ता होते हैं। कई ऐसे नेता होते हैं जो वैचारिक रूप से बड़े दृढ़ होते हैं। विचारधारा के मामले में उनसे आप बात कर सकते हैं, बहस कर सकते हैं और उनकी बात सुन सकते हैं। जरूरी नहीं कि सहमत हों, असहमत भी हो सकते हैं।

ऐसे तमाम नेता अलग-अलग दलों में हैं। लेकिन एक नेता इस देश में ऐसा है जिसका कोई जवाब नहीं, जिसका कोई तोड़ नहीं, या कहें जिसका कोई मुकाबला नहीं है किसी से। इस नेता के बारे में पूरा देश एक गाना गा रहा है- तुम सा नहीं देखा। मुझे नहीं लगता कि भविष्य में कभी इस तरह का नेता भारत को देखने को मिलेगा। भारतीय राजनीति में दूसरा ऐसा नेता नहीं आने वाला। इसलिए इस नेता को धरोहर समझ कर सहेजना चाहिए। जी हां, इसमें ज्यादा कोई रहस्य की बात नहीं है।

आप समझ गए होंगे मैं किसकी बात कर रहा हूं। मैं बात कर रहा हूं कांग्रेस के वरिष्ठ नेता, पूर्व अध्यक्ष और लोकसभा में प्रतिपक्ष के नेता राहुल गांधी की। बहुत से लोग कहते हैं कि राहुल गांधी के बारे में चर्चा छोड़ देनी चाहिए। मैं इससे सहमत नहीं हूं। वो प्रतिपक्ष के नेता हैं। कांग्रेस सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी है देश की। दूसरे नंबर की पार्टी है। भाजपा के बाद उससे बड़ी कोई पार्टी नहीं है। उसकी एक लिगेसी है, विरासत हैं। आप उससे सहमत-असहमत हो सकते हैं, लेकिन कांग्रेस पार्टी अभी देश के सभी राज्यों में थोड़े या ज्यादा रूप में विद्यमान है। आप पूरी तरह से कांग्रेस पार्टी को ‘राइट ऑफ” नहीं कर सकते। लेकिन यही बात आप राहुल गांधी के बारे में नहीं कह सकते।

राहुल गांधी और कांग्रेस के बारे में समझना हो तो मशहूर व्यंग्य लेखक शरद जोशीकी एक रचना का छोटा सा अंश आपको सुनाता हूं। जब आजादी की रजत जयंती मनाई जा रही थी उस स मय शरद जोशी ने यह लेख लिखा था। उन्होंने कांग्रेस के बारे में लिखा है कि, “कांग्रेस एक समस्या बन गई है और समस्याएं कांग्रेस बन गई है।” आप समझने की कोशिश कीजिए आज से कितने दशक पहले यह बात लिखी गई थी और आज भी उतनी ही सही लगती है। उसके आगे उन्होंने लिखा- “कांग्रेस एक सरकार नहीं एक संतुलन का नाम था। (था शब्द का इस्तेमाल किया है उस समय उन्होंने।) संतुलन तंबू की तरह तनी रही। गुब्बारे की तरह फैली रही। हवा की तरह सनसनाती रही। बर्फ की तरह जमी रही। पूरे 30 साल। संतुलन की इंतहा तब हुई जब उत्तर में जोर था तब दक्षिण में कमजोर थे। दक्षिण में जीते तो उत्तर में हार गए।”

कांग्रेस के लिए आज भी यही बात है। कांग्रेस को लेकर अगर आप सोचिए तो कुछ नहीं बदला है। उस समय इंदिरा गांधी कांग्रेस की नेता थीं। देश की प्रधानमंत्री थीं। फिर प्रधानमंत्री पद से हट गई थीं। उसके बाद कांग्रेस को कई नेता मिले लेकिन राहुल गांधी जैसा नेता नहीं मिला। आज जो कांग्रेस की स्थिति है उससे पता चलता है कि जो जी-23 बना था इसमें वो आखिरी लोग थे जिनके पास रीढ़ थी… बोलने की और सार्वजनिक रूप से विरोध करने की हिम्मत थी। हालांकि उनमें से कुछ लोग अब भी कांग्रेस में रह गए हैं और जब तब इस बात का इशारा करते हैं कि- नहीं नहीं अभी हमारे पास रीढ़ है। लेकिन, ज्यादातर नेता और खासतौर से जो राहुल गांधी के करीबी नेता हैं उनमें कोई रीढ़ नहीं चाहे। बड़ा नेता हो वरिष्ठ /पुराना नेता हो और चाहे आज का राहुल गांधी का साथी हो, किसी में रीढ़ नहीं है।

हालत यह है कि बिहार में विधानसभा का चुनाव चल रहा है। चुनाव की अधिसूचना जारी होने वाली थी। उससे पहले राहुल गांधी चार देशों की यात्रा पर चले गए। उन देशों में उनको पूछने वाला कोई नहीं है। कांग्रेस का कुछ लेना-देना नहीं है उससे। राहुल गांधी के जाने या ना जाने से उन देशों से भारत के संबंध पर कोई असर नहीं पड़ने वाला है। अगर कुछ असर पड़ सकता है तो भारत की छवि खराब हो सकती है। यह हो सकता है जिन लोगों से वह मिले होंगे, उनको लगता होगा कि भाई भारत में प्रतिपक्ष का नेता ऐसा है, इस तरह के आईक्यू वाला है। तो भारत के लिए उन्होंने क्या किया इसी से आप अंदाजा लगा सकते हैं। वहां से लौटे तो सबको उम्मीद थी कि इन्होंने 16 दिन तक वोट अधिकार यात्रा चलाई थी। वोट चोर गद्दी छोड़ का नारा लगा रहे थे। सुप्रीम कोर्ट में मामला चल रहा था… लेकिन उनको कोई परवाह नहीं थी कि सुप्रीम कोर्ट क्या फैसला देगा, क्या बोल रहा है? इससे उनको कोई फर्क नहीं पड़ता। राहुल गांधी सुप्रीम कोर्ट से नहीं डरते हैं। आम लोग डरते होंगे अदालतों से। आम लोग डरते होंगे अदालत के फैसलों से- या उसका इंतजार करते होंगे- या उसका सम्मान करते होंगे। राहुल गांधी के साथ ये सब बातें नहीं है और इस परिवार के बारे में हमारी अदालतें भी कुछ विशेष रुख अपनाती हैं। यह एक बार नहीं बार-बार देखने को मिलता है।

राहुल गांधी विदेश यात्रा से लौट कर आए। उसके बारे में कांग्रेस कोई चर्चा नहीं करती है। उनके जाने से पहले जरूर बताया गया था कि विश्वविद्यालय में जाएंगे, इंटेलेक्चुअल से मिलेंगे और सरकार के लोगों से मिलेंगे। क्या हुआ? राहुल गांधी वहां से क्या लेकर आए? यह बात कांग्रेस पार्टी ने बताने की जरूरत नहीं समझी… या आप समझ लीजिए कि कुछ बताने लायक नहीं था।

राहुल गांधी लौट कर आए तो तेजस्वी यादव उनसे मिलने के लिए दिल्ली आए। आरजेडी के नेता हैं। डिप्टी चीफ मिनिस्टर रह चुके हैं। प्रतिपक्ष के नेता हैं बिहार विधानसभा में और आरजेडी महागठबंधन में सबसे बड़ी पार्टी है। कांग्रेस छोटी पार्टी है। फिर भी तेजस्वी यादव मिलने के लिए राहुल गांधी से दिल्ली आए। राहुल गांधी ने समय नहीं दिया। तेजस्वी लौट गए। फिर राहुल गांधी ने तेजस्वी यादव को दिल्ली बुलवाया बात करने के लिए। तेजस्वी यादव नहीं आए। उन्होंने अपने नेता संजय यादव को भेज दिया। ये ‘नेपो किड्स’ की अहंकार की लड़ाई है- मैं बड़ा कि तू बड़ा? मेरे परिवार के लोगों ने ज्यादा राज किया कि तुम्हारे परिवार के लोगों ने ज्यादा राज किया। किसका सिक्का चलता था- किसका नहीं चलता था? यह जो एंटाइटलमेंट का भाव है, यह दोनों में कूट-कूट कर भरा हुआ है। आप कह सकते हैं दोनों में अहंकार भरा हुआ है। यह मैं नहीं कह रहा हूं। यह झारखंड मुक्ति मोर्चा (जेएमएम) के नेताओं ने कहा है। झारखंड में झारखंड मुक्ति मोर्चा की सरकार है जिसमें कांग्रेस पार्टी और राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) दोनों शामिल हैं। जेएमएम बिहार में महागठबंधन में शामिल थी। महागठबंधन से निकल गई। आरोप लगाया कि राहुल गांधी और तेजस्वी यादव उनके अहंकार के कारण वह हटी है। ये तक कह दिया कि बिहार विधानसभा चुनाव के बाद झारखंड में जो गठबंधन है उस पर भी पुनर्विचार करेंगे।

बिहार हारने के बाद झारखंड की सरकार से कांग्रेस पार्टी और आरजेडी बाहर हो सकती है- इस खबर के लिए तैयार रहिए। जब तेजस्वी यादव नहीं आए तो उसके बाद राहुल गांधी चंडीगढ़ चले गए। क्यों चले गए- यह तो कांग्रेस के लोग बता सकते हैं। वहां से शिमला चले गए परिवार के साथ छुट्टी मनाने। बिहार में चुनाव चल रहा है। कांग्रेस की प्रतिष्ठा जुड़ी हुई है। पूरे विपक्ष की प्रतिष्ठा जुड़ी हुई है। विपक्ष के लिए यह बहुत ही बड़े स्टेक वाला चुनाव है। इसके बावजूद राहुल गांधी बिहार जाने की बजाय शिमला में छुट्टी मना रहे थे अपने परिवार के साथ। परिवार प्रथम उनका नारा है देश जाए भाड़ में। शिमला से लौट कर राहुल गांधी फिर खोजने लगे कि कहां दलित के यहां जा सकते हैं। तो रायबरेली चले गए। फतेहपुर चले गए। फिर हरियाणा चले गए जहां एक दलित अधिकारी ने आत्महत्या की थी। लेकिन उसके कुछ ही दिन बाद एक जाट अधिकारी ने आत्महत्या की उसके यहां नहीं गए।

कांग्रेस तमिलनाडु में डीएमके के साथ गठबंधन में है। वहां डीएमके की सरकार है। करूर में सुपरस्टार विजय की रैली में आए 41 लोगों की भगदड़ में मौत हो गई। राहुल गांधी किसी के यहां संवेदना-सहानुभूति जताने नहीं गए। राहुल गांधी की सहानुभूति का फव्वारा कब फूटता है, सोता कब बहता है- जब उनको लगे कि पीड़ित कोई दलित है। यह दलित से प्रेम नहीं है। उनको लगता है कि दलित के यहां जाकर, दलित के प्रति सहानुभूति दिखाकर वह भाजपा और मोदी पर हमला कर सकते हैं, उनको कटघरे में खड़ा कर सकते हैं। वरना दलित से उनका कोई संबंध, कोई लेना देना नहीं है। वो बताएं कि जब कांग्रेस पार्टी की सरकारें थीं तो पार्टी की वर्किंग कमेटी में दलित समाज से कितने लोग थे?

मैं 1946 से जब जवाहरलाल नेहरू अंतरिम प्रधानमंत्री बने- तब से लेकर जब 2014 तक जब मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री थे- तब तक की बात कर रहा हूं। इस बीच में कुछ और पार्टियों की सरकारें बनी। लेकिन मैं केवल कांग्रेस की सरकार की बात कर रहा हूं। दलित की चिंता तब नहीं हुई। दलित के लिए कुछ करने का ख्याल तब नहीं आया। पिछड़ा वर्ग का ध्यान तब नहीं आया। जब सत्ता से बाहर हो गए तो सत्ता में आने के लिए छटपटा रहे हैं। अब लग रहा है कि दलित और पिछड़ों का साथ मिल जाए तो सत्ता मिल सकती है। इतना ही सरोकार है राहुल गाँधी और उनकी कांग्रेस पार्टी का दलितों और पिछड़ा वर्ग से। इससे ज्यादा का कुछ नहीं है।

बिहार में उन्होंने इतना बड़ा मुद्दा बनाया था वोट चोरी का। उन्होंने कर्नाटक की बात की- हरियाणा की बात की- महाराष्ट्र की बात की- यात्रा निकाली, 16 दिन तक बिहार में घूमे। लेकिन उस मुद्दे को पहले मुख्य चुनाव आयुक्त ने अपनी प्रेस कॉन्फ्रेंस में उड़ा दिया। उसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने तो पूरी तरह से खत्म कर दिया। इन लोगों ने पहले तो कोशिश की कि सुप्रीम कोर्ट एसआईआर रोक दे बिहार में। सुप्रीम कोर्ट ने मना कर दिया। फिर कोशिश की कि एक एसआईटी का गठन कर दे। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट से कहा कि जांच के लिए एसआईटी गठित कर दीजिए। सुप्रीम कोर्ट ने उस याचिका पर सुनवाई करने से ही मना कर दिया। कहा आप चुनाव आयोग के पास जाइए। तो जो खिलौना उनके हाथ में था, जिस झुनझुने को वे पिछले कुछ महीने से बजा रहे थे, वो झुनझुना पहले चुनाव आयोग ने छीन लिया। फिर जो रही सही कसर थी वो सुप्रीम कोर्ट ने पूरी कर दी। तो राहुल गांधी के पास कोई मुद्दा नहीं बचा। बिहार जाएं तो बोलें क्या?

राहुल गांधी जैसा विलक्षण नेता भारत में दूसरा कोई नहीं है। जिसे अपने देश की परवाह नहीं है। अपने देश के विरोधियों के साथ खड़े होने में उसको कोई दिक्कत नहीं है। जिसको अपनी पार्टी की परवाह नहीं है- अपनी पार्टी के भविष्य की परवाह नहीं है- अपनी पार्टी के संगठन की परवाह नहीं है- जिसको इस बात की चिंता नहीं है कि उसके सहयोगी उसके बारे में क्या सोचते हैं। कोई ऐसा सहयोगी दल नहीं है जिससे राहुल गांधी के संबंध बहुत अच्छे हों। खेल शुरू होगा 14 नवंबर के बाद, जब बिहार विधानसभा चुनाव का नतीजा आएगा। उसके बाद आप देखिएगा इंडी गठबंधन का क्या होता है और साथ ही साथ राहुल गांधी का क्या होता है। कांग्रेस में कोई बोलेगा ऐसी मुझे कोई उम्मीद नहीं है। कांग्रेस में किसी की बोलने की हिम्मत नहीं है। हिम्मत उसकी होती है जिसकी हैसियत हो। कांग्रेस में किसी की हैसियत ही नहीं बची है तो हिम्मत कहां से आएगी?
(लेखक ‘आपका अख़बार’ के संपादक हैं)