आईजीएनसीए में स्टार्स शाइन’ प्रदर्शनी का आयोजन

आपका अखबार ब्यूरो।

इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र (आईजीएनसीए) के मीडिया सेंटर ने ‘विज्ञापनों में सितारों की चमक: एक अनोखी विज्ञापन प्रदर्शनी’ नामक विशेष प्रदर्शनी का आयोजन किया, जो 16 दिसंबर से 21 दिसंबर तक दर्शनम् गैलरी में दर्शकों के लिए खुली रहेगी। प्रदर्शनी का उद्घाटन फिल्म एवं थिएटर निर्देशक एवं लेखिका रमा पांडे, आईजीएनसीए के सदस्य सचिव डॉ. सच्चिदानंद जोशी और कम्युनिकेशन स्ट्रेटेजिस्ट श्री सुशील पंडित ने किया। इस अवसर पर मीडिया सेंटर के प्रमुख श्री अनुराग पुनेठा भी उपस्थित रहे। प्रदर्शनी के क्यूरेटर इकबाल रिजवी हैं। इसके बाद एक पैनल चर्चा का भी आयोजन किया, जिसमें विज्ञापनों की कला, उनके प्रभाव पर चर्चा हुई और प्रसिद्ध विज्ञापन फिल्मकार पीयूष पांडेय को श्रद्धांजलि दी गई।


इस मौके पर मुख्य अतिथि थीं फिल्म व थिएटर निर्देशक, लेखिका और प्रसिद्ध विज्ञापन फिल्मकार स्व. पीयूष पांडेय की बड़ी बहन रमा पांडे, जबकि विशिष्ट अतिथि संचार रणनीतिकार सुशील पंडित थे। मीडिया केन्द्र के नियंत्रक अनुराग पुनेठा ने उद्घाटन भाषण दिया।

मुख्य अतिथि के रूप में रमा पांडेय ने कहा कि विज्ञापन दिलों की दुनिया की बात है। कोई व्यक्ति अपना कुछ उत्पाद बेचना चाहता है, तो वह दिल में ही उतरकर बेच सकेगा। इसलिए ये दिल की बात है। उन्होंने विज्ञापन क्षेत्र से अपने जुड़ाव के बारे में बात करते हुए कहा, ये विज्ञापन की दुनिया मेरे कर्म की दुनिया, मेरे सृजन से जुड़ी हुई है।

उन्होंने अपने छोटे भाई पीयूष पांडेय को भावपूर्ण तरीके से याद किया। उनके योगदान को रेखांकित करते हुए रमा पांडेय ने कहा, पीयूष ने विज्ञापन की दुनिया को, हिन्दी को, भाव को, संवाद को एक उड़ान ही नहीं दी, ये साबित भी किया कि विज्ञापन की दुनिया अपने आप में कहानी है, उपन्यास है,  कविता है, लेख है। विज्ञापन लेखन साहित्य की नई विधा है। अपने आप में साहित्य है।


उन्होंने कहा, विज्ञापनों में आकर ही कबीर बेदी, विनोद खन्ना, विजयेंद्र घाटगे आदि स्टार बन गए। उन्होंने बताया, हमने राजस्थान में अपने घर से ही पहली पब्लिसिटी कंपनी ‘इला अरुण पब्लिसिटी’ शुरू की । उन्होंने कहा, विज्ञापन घरों से ही निकले हैं। घरों में बने हैं, घरों से सम्बंध रखते हैं, जाना भी उनको घरों में ही है, बात भी घर वालों से करनी है।

अंत में उन्होंने कहा, अब हम आने वाले दिनों में इन स्टार्स को भी बताएं कि गलत चीज़ों के विज्ञापन में मत जाइए। अगर दुनिया आप पर इतना विश्वास करती है, तो आपको भी खुद भी उतना ज़िम्मेदार होना होगा।

इस अवसर पर श्री सुशील पंडित ने कहा, “पीयूष के जीवन और कार्य को समझते हुए, वर्षों पहले इंडियन एक्सप्रेस और बाद में टेलीग्राफ में लिखते समय मुझे यह गहराई से समझ में आया कि विज्ञापन केवल उत्पाद बेचने का माध्यम नहीं, बल्कि अपने समय के सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक बदलावों का साक्ष्य रहा है। उन्होंने कहा कि एक समय ऐसा था, जब अख़बार एक रुपये या डेढ़ रुपये में बिकते थे और उनकी कीमत से छपाई की लागत भी पूरी नहीं हो पाती थी। ऐसे में प्रिंट मीडिया को जीवित रखने वाली वास्तविक शक्ति विज्ञापन ही थे। पत्रकारों की आज़ादी, लेखन की निरंतरता और पत्र–पत्रिकाओं का अस्तित्व उसी पर निर्भर था।


श्री सुशील पंडित ने यह भी कहा, विज्ञापनों ने केवल समाचार उद्योग को ही नहीं, बल्कि साहित्य, कविता और सांस्कृतिक विमर्श को भी सहारा दिया। उन्होंने स्मरण किया कि किस तरह रेडियो और अख़बार के दौर से लेकर टेलीविज़न के आगमन तक विज्ञापन आम जनजीवन का अभिन्न हिस्सा बने और सामूहिक स्मृति में दर्ज होते चले गए। उन्होंने कहा कि पीयूष पांडेय का सबसे बड़ा योगदान विज्ञापन की भाषा को औपचारिकता से निकालकर आम बोलचाल की सहज और आत्मीय भाषा में ढालना था। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि तकनीक, उत्पाद और सुविधाएं समय के साथ बदली जा सकती हैं और उनकी नक़ल भी संभव है, लेकिन ब्रांड और उपभोक्ता के बीच बनने वाला भावनात्मक रिश्ता अमूर्त होता है, उसकी नक़ल नहीं की जा सकती।

अपने वक्तव्य के अंत में श्री पंडित ने कहा कि यह प्रदर्शनी भारतीय विज्ञापन की उस लंबी यात्रा को समझने का अवसर देती है, जिसने उपभोक्ता संस्कृति, रचनात्मक संप्रेषण और सामाजिक व्यवहार को आकार दिया है। उन्होंने आयोजकों को बधाई देते हुए कहा कि अतीत की इस समझ के बिना भविष्य की दिशा को पहचानना कठिन है।”

उद्घाटन वक्तव्य देते हुए अनुराग पुनेठा ने कहा, विज्ञापन हमें नॉस्टेलजिया में ले जाते हैं। विज्ञापन हमें ख़ुशी देते हैं और हमसे जुड़ाव स्थापित करते हैं। उन्होंने कहा कि आईजीएनसीए में चल रही विज्ञापन आर्काइविंग पहल इस मूल्यवान दृश्य अभिलेख को निरंतर समृद्ध और विस्तृत करने का निरंतर प्रयास कर रही है, ताकि आने वाले समय में शोधकर्ता इस इस विषय पर काम कर सकें।

ग़ौरतलब है कि 1950 से 1990 तक के विज्ञापनों पर आधारित यह प्रदर्शनी सिनेमा और विज्ञापन के बीच गतिशील संबंधों को दर्शाती है। विज्ञापनों से यह जुड़ाव सिर्फ़ फिल्मी कलाकारों तक ही सीमित नहीं था। जाने-माने गायक और अन्य फिल्मी हस्तियां, जिनमें लता मंगेशकर, मोहम्मद रफ़ी, मुकेश, बेगम अख़्तर और पटकथा लेखक सलीम खान आदि शामिल हैं, भी विज्ञापनों में नज़र आईं। इससे उनकी सांस्कृतिक उपस्थिति व्यावसायिक क्षेत्र तक फैल गई।

यह प्रदर्शनी दर्शाती है कि कैसे सिनेमा से परे, फिल्मी हस्तियों ने विज्ञापनों के माध्यम से आम लोगों के फैशन, स्वाद और आकांक्षाओं को प्रभावित किया। उनमें भरोसा और उनकी लोकप्रियता ने उन्हें भारतीय विज्ञापन के विकास का केन्द्र बिंदु बना दिया। उत्पादों के साथ उनका जुड़ाव देश के दृश्य और सांस्कृतिक इतिहास में एक महत्वपूर्ण चरण था।

उल्लेखनीय है कि विज्ञापन जगत, मीडिया और भारत की सांस्कृतिक विरासत को समझने वालों के लिए यह प्रदर्शनी अद्वितीय तथा बेहद महत्वपूर्ण है। यह दर्शकों को उन प्रतिष्ठित विज्ञापनों को फिर से जीने का मौका देती है, जिन्होंने दशकों तक भारतीय घरों पर अपना अमिट प्रभाव छोड़ा।