एसआईआर का एक दिन समर्थन करते हैं तो दूसरे दिन विरोध।
प्रदीप सिंह।इस समय उत्तर प्रदेश की राजनीति चौराहे पर खड़ी है। वहां भाजपा को छोड़कर किसी पार्टी को समझ में नहीं आ रहा है कि कौन सा रास्ता पकड़े। यूपी में यूं तो भाजपा,समाजवादी पार्टी,बसपा और कांग्रेस की मौजूदगी है,लेकिन मुझे लगता है कि चुनावी राजनीति के संदर्भ में कांग्रेस की बात करना समय नष्ट करना है। हालांकि समाजवादी पार्टी ने कांग्रेस के साथ लोकसभा चुनाव में गठबंधन किया था और वह विधानसभा चुनाव में भी कर सकती है,लेकिन कांग्रेस के पास है क्या? कांग्रेस के पास यूपी में वोट तो है नहीं। कांग्रेस के पास एक चीज है- नेशनल और इंटरनेशनल नैरेटिव बनाने की ताकत। उसका इको सिस्टम, जिसकी समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव को बहुत जरूरत है क्योंकि उनका मुकाबला भाजपा से है जिसके पास नेता है,नीति है,नेतृत्व है,संगठन है और उसके अलावा नैरेटिव भी है।अखिलेश यादव 2024 के लोकसभा चुनाव में 37 सीटें जीतकर बहुत प्रफुल्लित हैं। इन नतीजों से उनको लग रहा है कि उनकी पार्टी सबसे आगे है। लेकिन जब तक 2027 का विधानसभा चुनाव आएगा तब तक परिस्थितियों में बहुत बदलाव आ जाएगा। तो सपा को कांग्रेस की जरूरत वोट के लिए नहीं नैरेटिव बनाने के लिए है। भाजपा के विरोध में राष्ट्रीय स्तर पर अगर कोई विमर्श खड़ा कर सकता है तो वह इकोसिस्टम कांग्रेस के पास है। अखिलेश के प्रवक्ता जिस तरह से बोलते हैं,वे उनकी पार्टी का फायदा कम और नुकसान ज्यादा करते हैं। अखिलेश यादव की मुश्किल यह है कि वह अपने पिता की तरह से जमीन से उठे हुए नेता नहीं है। मुलायम हर जिले में कार्यकर्ताओं को नाम से जानते थे। लगातार राज्य के दौरे करते रहते थे। अखिलेश यादव का सारा दौरा सोशल मीडिया तक सीमित है। उनके मुकाबले में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जमीन के नेता हैं। मुख्यमंत्री रहते हुए भी वह लगातार प्रदेश का दौरा करते रहते हैं। उनसे मुकाबला करने के लिए अखिलेश यादव ने जैसे लगता है कि हथियार डाल दिए हों कि भाई इतना दौरा तो हम नहीं कर सकते। तो अखिलेश यादव बिना मेहनत के सत्ता का फल चखना चाहते हैं। उनको 2012 में जो सत्ता मिली, वह पिता की मेहनत से मिली थी। उस 5 साल की सत्ता में उन्होंने पिता से मिली राजनीतिक पूंजी को बढ़ाने के बजाय कम किया और लगातार कम करते जा रहे हैं। अखिलेश यादव के मुख्यमंत्री बनने के बाद से पांच चुनाव हुए हैं। इनमें से चार 2014 का लोकसभा चुनाव,2017 का विधानसभा चुनाव,2019 का लोकसभा चुनाव और 2022 का विधानसभा चुनाव अखिलेश यादव हारे हैं। 2024 के चुनाव के नतीजे को मैं अपवाद मानता हूं। इनमें 2017 का चुनाव वह कांग्रेस पार्टी के साथ, 2019 में लोकसभा का चुनाव बहुजन समाज पार्टी के साथ और 2024 का लोकसभा चुनाव फिर कांग्रेस पार्टी के साथ मिलकर लड़े। यह बताता है कि अकेले लड़ने की उनकी क्षमता नहीं है। 2019 में उन्होंने बसपा से गठबंधन तो कर लिया लेकिन उनको यह जमीनी अंदाजा नहीं था कि बसपा का वोट ट्रांसफर नहीं होगा। यह सामान्य सी बात है क्योंकि गांवों की सामाजिक स्थिति आप देख लें, वहां दलितों को सबसे ज्यादा खतरा यादव समाज या मुस्लिम समाज से है और ये दोनों अखिलेश यादव के कोर वोट हैं। अखिलेश को दिल्ली के कुछ बुद्धिजीवियों ने समझा दिया कि आप अंकगणित देखिए बाकी सब भूल जाइए। भाजपा का सफाया हो जाएगा लेकिन उल्टा अखिलेश की ही पार्टी पांच सीटों पर सिमट गई।
अखिलेश पिछले कुछ सालों से पीडीए-पीडीए की माला जप रहे हैं। उनकी पीडीए की परिभाषा बदलती रहती है। बिहार विधानसभा चुनाव में आरजेडी का प्रचार करने खामखा पहुंच गए। उनको लगा कि बिहार में आरजेडी की सरकार बनने जा रही है। चुनाव प्रचार करूंगा तो इसका श्रेय मुझे भी मिलेगा लेकिन हो गया ठीक उल्टा। जितना समय और पैसा उन्होंने बिहार में खर्च किया उतना यूपी पर खर्च किया होता तो शायद उनके लिए ज्यादा बेहतर होता। यूपी में एसआईआर को लेकर भी वह कनफ्यूज हैं। एक दिन समर्थन करते हैं तो दूसरे दिन विरोध। एक दिन खुश हो जाते हैं कि बीजेपी के वोट कट गए। दूसरे दिन नाराज हो जाते हैं कि यह नए वोटर कहां से जुड़ रहे हैं। तो जमीन पर क्या हो रहा है,इसका अंदाजा अखिलेश यादव को अभी तक नहीं हो पाया है। यह सही बात है कि 2024 के लोकसभा चुनाव में अपने राजनीतिक जीवन में पहली बार उन्होंने अच्छी सामाजिक रणनीति बनाई और टिकट डिस्ट्रीब्यूशन ऐसा किया जिसका भाजपा को भारी नुकसान और समाजवादी पार्टी को फायदा हुआ। लेकिन वह यह भूल जाते हैं कि उस समय भाजपा के एक नारे अबकी बार 400 पार की वजह से नैरेटिव भाजपा के खिलाफ बन गया था। विपक्ष ने मतदाता को यह कहकर डरा दिया कि 400 इसलिए मांग रहे हैं कि संविधान बदलेंगे और आरक्षण खत्म कर देंगे। लेकिन भाजपा देश में एकमात्र पार्टी है जो अपनी गलतियों से बहुत जल्दी सीखती है। यही कारण है कि लोकसभा चुनाव के बाद हरियाणा,दिल्ली,महाराष्ट्र और बिहार विधानसभा चुनावों ने उसे भारी जीत मिली।
तो 2027 की लड़ाई समाजवादी पार्टी और अखिलेश यादव के लिए राजनीतिक अस्तित्व की लड़ाई है। मैं जब राजनीतिक अस्तित्व की लड़ाई किसी पार्टी के लिए कहता हूं तो उसका मतलब यह नहीं होता है कि वह पार्टी खत्म होने जा रही है। उसका मतलब यह होता है कि वह पार्टी सत्ता की दौड़ में बनी रहेगी या उससे बाहर हो जाएगी। उत्तर प्रदेश का चुनाव उसी ओर जाता हुआ दिखाई दे रहा है। अखिलेश यादव जमीन से पूरी तरह से कटे हुए नजर आते हैं। 2024 के लोकसभा चुनाव में अच्छी सफलता मिलने के बाद भी अखिलेश यादव ने कितने जिलों का दौरा किया। उनको लगता है कि केवल सोशल मीडिया पर ट्वीट कर देने, मुख्यमंत्री पर तंज कसने और भाजपा का मजाक उड़ाने से वह चुनाव जीत जाएंगे। इस तरह से कोई पार्टी न कभी जीती है और न जीत सकती है। यूपी में दूसरे नंबर की पार्टी सपा अभी तय ही नहीं कर पा रही है कि उसको गठबंधन में चुनाव लड़ना है या अकेले लड़ना है। यूपी में उनका मुकाबला उस भाजपा से है,जिसके पास सबसे बड़ा कैडर बेस है। उसकी मदद के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ है। राज्य में कानून-व्यवस्था की स्थिति में बहुत सुधार है। अभी एक मित्र मिले। वह प्रयागराज संगम में नहाने गए। उन्होंने एक नाव वाले से पूछा कि आखिर योगी जी के शासन में क्या बदला है? उसने कहा आज हमारे घर की महिलाएं बिना डर के रात में निकलती हैं। इससे ज्यादा हमें क्या चाहिए? अब इस बात का अखिलेश यादव के पास क्या जवाब है? सुरक्षा से बड़ी कोई चीज मनुष्य के लिए नहीं हो सकती है। आज उत्तर प्रदेश में कानून सही मायने में डेटरेंस का काम कर रहा है। आम आदमी को भरोसा है कि उसके साथ अन्याय नहीं होगा। उसके अलावा आप बिजली सप्लाई की स्थिति देख लीजिए, सड़कों की स्थिति देख लीजिए, इंफ्रास्ट्रक्चर के निर्माण की स्थिति देख लीजिए्, गन्ना किसानों के भुगतान की स्थिति देख लीजिए। योगी लगातार उत्तर प्रदेश में सरप्लस बजट पेश कर रहे हैं। अखिलेश इन मुद्दों पर बात ही नहीं करते। लेकिन मेरा मानना है कि इस देश के ग्रामीण और गरीब मतदाता की जो सहज बुद्धि है,वह पढ़े-लिखों से ज्यादा होती है और उसको सब समझ में आता है,सब दिखाई देता है।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक और ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)



