ज्यादा हिस्सेदारी की चाह से पीडीए समीकरण संकट में।

#pradepsinghप्रदीप सिंह।
उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव ने पीडीए (पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक) को जो राजनीतिक समीकरण बनाया है, उस पर खतरे के बादल मंडरा रहे हैं। कुछ समय पहले ही मुख्तार अंसारी के भाई और गाजीपुर से सांसद अफजाल अंसारी ने कहा था,अब समय है कि यादव भाइयों को कुर्बानी देनी चाहिए। उनका मतलब था कि चुनाव में समाजवादी पार्टी यादवों को कम और दूसरों को ज्यादा टिकट दे। उनके जवाब में गाजीपुर में ही एक कार्यक्रम के दौरान काशीनाथ यादव ने कहा कि यादव ही हर बार क्यों कुर्बानी दें? दूसरे लोग क्यों नहीं? उन्होंने अफजाल अंसारी से सीधे कहा कि आप क्यों नहीं गाजीपुर की सीट दूसरों के लिए छोड़ देते?
यह जो टकराव है उसका कारण यह है कि 2024 के लोकसभा चुनाव में अखिलेश यादव ने प्रदेश के हर जिले से यादव नेताओं को बुलाकर कहा था कि इस चुनाव में आपको थोड़ा संतोष करना पड़ेगा। हम गैर यादवों को ज्यादा टिकट देंगे। आपकी बारी विधानसभा चुनाव के समय आएगी। उनकी बात से सब सहमत हो गए और उसका फायदा भी लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी को मिला। अब 2027 में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं तो यादव कह रहे हैं कि हमारी बारी आ गई है। लेकिन फिर कहा जा रहा है कि दूसरे लोगों को भी एडजस्ट करना है। मुसलमान वोट देते हैं तो मुसलमानों को ज्यादा टिकट मिलना चाहिए। यादव समाज के लोग कह रहे हैं कि पिछड़ा वर्ग में हम सबसे ज्यादा आबादी वाला समाज हैं। हमारा हिस्सा सबसे बड़ा होना चाहिए। किसी पार्टी या संगठन में जब हिस्से के बंटवारे की बात आती है तब समस्या बढ़ने लगती है। वही उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी के साथ हो रहा है। निषाद और राजभर भी बड़ा हिस्सा मांग रहे हैं। दलित समाज के लोगों का कहना है कि लोकसभा चुनाव में हमने भी सपा को वोट दिया था। वे यह बात भी उठा रहे हैं कि अगर 27 में सपा की सरकार बन गई तो क्या गारंटी है कि दलितों पर उस तरह का अत्याचार नहीं होगा,जैसा 2012 से 2017 के बीच में हुआ। तो इस समस्या से अखिलेश यादव को आने वाले समय में दोचार होना पड़ेगा। और यह सिर्फ अखिलेश की बात नहीं है, कोई भी नेता हो वह सबको खुश नहीं कर सकता।
इस खबर के जरिए मैं एक बड़े विषय को उठाना चाहता हूं कि क्या जातिवादी नारों से राजनीतिक सफलता मिलती है? मैं शुरू करता हूं डॉ. राम मनोहर लोहिया से। उन्होंने नारा दिया था- संसोपा ने बांधी गांठ, पिछड़े पावें सौ में साठ। इसके बावजूद लोहिया की पार्टी संसोपा यानी संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी कहीं भी सत्ता में अकेले दम पर नहीं आ पाई। 1977 में जनता पार्टी की जीत से पहले कांग्रेस को छोड़कर जिस पार्टी ने लोकसभा में सबसे ज्यादा सीटें जीती थीं वह थी स्वतंत्र पार्टी। उसे 44 सीटें मिली थीं लेकिन उसने कभी कोई जातीय गठजोड़ का नारा नहीं दिया था। गुजरात में कांग्रेस के बड़े नेता रहे माधव सिंह सोलंकी ने खाम (क्षत्रिय,हरिजन, आदिवासी और मुस्लिम) का नारा दिया था। उन्हें लगा कि यह गठजोड़ बनाने से गुजरात में कांग्रेस पार्टी हमेशा सत्ता में रहेगी। नतीजा क्या हुआ? कांग्रेस पिछले 36 सालों से राज्य की सत्ता से बाहर है। इसी तरह उत्तर प्रदेश में चौधरी चरण सिंह ने अजगर (अहीर,जाट,गुर्जर और राजपूत) बनाया। फिर उनको कहा गया कि अरे भाई आपने मुसलमानों को तो छोड़ दिया तो उन्होंने मजगर बना दिया। इसके बावजूद चौधरी चरण सिंह उत्तर प्रदेश में अपनी पार्टी को कभी बहुमत नहीं दिला पाए। वह जब भी मुख्यमंत्री बने तो जनसंघ और दूसरे दलों के समर्थन से बने। प्रधानमंत्री भी कुछ महीने के लिए कांग्रेस के समर्थन से बने। तो जातीय नारों या जातीय गठबंधन के नारों से जनाधार का कोई संबंध नहीं है और जनता इसको कभी गंभीरता से लेती नहीं। तो अखिलेश यादव को कैसे लगा कि वह पीडीए के नारे की बदौलत सफल हो जाएंगे।
अखिलेश यादव 5 साल सत्ता में रहने के बाद 224 से 47 सीट पर लुढ़क गए थे। 2014 और 2019 के लोकसभा चुनाव में उनकी पार्टी की जबर्दस्त हार हुई थी। 2017 और 2022 का विधानसभा चुनाव भी उनकी पार्टी बुरी तरह हारी। 2024 के लोकसभा चुनाव में सपा को जरूर सफलता मिली और वह 37 सीटें जीत गई,लेकिन मेरा मानना है कि उनकी यह सफलता बाढ़ का पानी है और बाढ़ के पानी से कभी भी नदी के जलस्तर का अनुमान नहीं लगाना चाहिए। समाजवादी पार्टी को लग रहा है कि 37 लोकसभा सीटें जीतने के बाद 2027 के विधानसभा चुनाव में वह आगे ही जाएगी, लेकिन ऐसा होने नहीं जा रहा है।
केवल जातीय गठजोड़ की घोषणा कर देने से गठजोड़ बन नहीं जाता है। यह समस्या भाजपा भी झेल रही है। जैसे ही आप दायरा बढ़ाकर और ज्यादा सामाजिक वर्गों को जोड़ते हैं तो जाहिर है कि कुछ वर्गों के हिस्से में कटौती होगी और कोई नहीं चाहता कि उसके हिस्से में कटौती हो। यही मुश्किल समाजवादी पार्टी के सामने आने वाली है। क्या यादव समाज इस बात के लिए तैयार है कि उसके टिकटों की संख्या, उसके पदों की संख्या कम हो जाए? मुझे नहीं लगता कि तैयार होंगे। ऐसा ही पिछड़ा वर्ग की अन्य जातियों और मुसलमानों के साथ है। कोई कटौती नहीं चाहता। सपा के साथ एक मुश्किल यह भी है कि वह मुस्लिम-यादव समीकरण पर बहुत ज्यादा निर्भर है। यह जरा भी गड़बड़ हुआ तो उसे बड़ा झटका लगेगा।
2009 का लोकसभा चुनाव याद कर लीजिए। मुलायम सिंह यादव ने इस उम्मीद में कि वह सारे पिछड़ा वर्ग के नेता बन जाएं, कल्याण सिंह से हाथ मिला लिया। उस समय कल्याण सिंह भाजपा छोड़कर अपनी पार्टी बना चुके थे। उसका नतीजा यह हुआ कि मुसलमानों ने उन मुलायम सिंह का साथ छोड़ दिया जिन्होंने कार सेवकों पर गोली चलवाई थी। उस नतीजे से मुलायम सिंह यादव ने सबक सीखा और कल्याण सिंह से अपना गठबंधन तोड़ दिया।
राजनीति में जो जनता के संदेश को नहीं समझते उनको मुंह की खानी पड़ती है। यह बात सभी पार्टियों पर लागू होती है। राजनीति केवल जातीय नारों और जातीय गठजोड़ से नहीं चलती। आपके पास एक विश्वसनीय नेतृत्व होना चाहिए। जिसके काम पर लोगों का भरोसा हो। क्या अखिलेश यादव ऐसे नेता हैं? पीडीए का नारा देकर अखिलेश यादव ने दरअसल अपने गले में फंदा डाल लिया है। जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आएगा,टिकट बंटवारे का समय आएगा,हर वर्ग की ज्यादा से ज्यादा की मांग का उन पर दबाव बढ़ने लगेगा।
इतिहास चीख-चीख कर कह रहा है कि जातियों का राजनीतिक गठजोड़ हमेशा नुकसानदायक होता है। उन्हें तेजस्वी यादव का उदाहरण देखना चाहिए। बिहार में उनका क्या हाल हुआ। उनके पास भी एमवाई समीकरण था और अखिलेश यादव से ज्यादा मजबूत था क्योंकि यादव और मुसलमानों दोनों की जनसंख्या बिहार में उत्तर प्रदेश की तुलना में ज्यादा है। अखिलेश यादव का भविष्य इससे कुछ अलग होगा, यह दिखाई नहीं देता है।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)