प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत मिले घर में बिना इजाजत बनाया निजी म्यूजियम

#pradepsinghप्रदीप सिंह।
पूर्वोत्तर के सबसे बड़े राज्य असम की आबादी 2011 की जनगणना के मुताबिक लगभग सवा तीन करोड़ है। इसमें से 34.2 फीसदी मुस्लिम आबादी है। जम्मू-कश्मीर के बाद देश में सबसे ज्यादा मुस्लिम आबादी असम में ही है। ऐसे राज्य में भारतीय जनता पार्टी का एक बार नहीं बल्कि दो-दो बार लगातार पूर्ण बहुमत से सत्ता में आना सामान्य बात नहीं है। इस तरह की घटना के बाद जाहिर है कि कुछ लोगों को परेशानी हो रही है। जब मैं परेशानी की बात कर रहा हूं तो केवल मुसलमानों की परेशानी की बात नहीं कर रहा हूं, उन मुस्लिम मतदाताओं की बात नहीं कर रहा हूं जो भाजपा, संघ और मोदी विरोधी हैं। मैं उन सभी लोगों की बात कर रहा हूं जो भाजपा, संघ और मोदी विरोधी हैं। उन्हें यह बात सताए जा रही है कि इतनी बड़ी मुस्लिम आबादी वाले राज्य में भारतीय जनता पार्टी कैसे सत्ता में आ गई। उनको यह बात बर्दाश्त नहीं हो रही है। इसके लिए नए-नए शिगुफे छोड़े जा रहे हैं, नई-नई बातें की जा रही हैं।
अभी हाल ही में जो घटना हुई है वह आंखें खोलने और चौंकाने वाली है। 23 अक्टूबर को असम के ग्वालपाड़ा में एक मियां म्यूजियम बना। हिंदी भाषी राज्यों में आम बोलचाल में सभी मुसलमानों के लिए मियां शब्द का इस्तेमाल होता है। असम में इस शब्द का इस्तेमाल बांग्लादेशी घुसपैठियों या बांग्लाभाषी मुसलमानों के लिए होता है जो बहुत सम्मान के संदर्भ में नहीं है। इस निजी म्यूजियम को मेहर अली नाम के एक सज्जन ने बनाया था। प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत मेहर अली को मिले घर में यह म्यूजियम खोला गया था। इस म्यूजियम में जो समान रखा गया था उनमें लुंगी, मछली पकड़ने का सामान, पिठा, हल और इसके अलावा कुछ ऐसी चीजें थी जो आजकल इस्तेमाल में नहीं आती हैं। इनके जरिये यह बताने की कोशिश की गई कि यह मियां संस्कृति का प्रतीक है। ये सब हम बांग्लादेश से लेकर आए थे, ये हमारी चीजें हैं, हमारी सांस्कृतिक विरासत और पहचान है। जब इसका उद्घाटन हुआ और इसकी खबर आई तो यह मामला पूरे प्रदेश में फैल गया। इसकी जांच शुरू हुई तो सबसे पहले पता चला कि बिना किसी इजाजत के प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत मिले घर में इस तरह का म्यूजियम खोला ही नहीं जा सकता है। इसके अलावा एक और म्यूजियम खोलने के लिए सरकार से 11 बीघा जमीन मांगी गई। साथ ही यह घोषणा की गई कि प्रदेश के हर जिले में ऐसा म्यूजियम खुलेगा। जब इसकी खबर सरकार तक पहुंची तो मुख्यमंत्री हिमंत विस्व सरमा ने कहा कि इस म्यूजियम में जो कुछ है उनमें लुंगी के अलावा उनका कुछ भी नहीं है। वह साबित करें कि यह सब उनकी सांस्कृतिक पहचान है। उन्होंने कहा कि यह सब असमिया संस्कृति की पहचान है। इनमें से कोई भी चीज बांग्लादेशी घुसपैठियों की नहीं है।

बिना इजाजत खुला म्यूजियम

इतना ही नहीं, जो व्यक्ति अपना घर नहीं बनवा सकता हो, उसे प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत घर मिला हो, वह एक निजी म्यूजियम कैसे खोल सकता है। मुख्यमंत्री ने कहा कि इस बात की जांच होगी कि इसके लिए पैसा कहां से आया। कांग्रेस के एक विधायक सरमानंद ने पिछली विधानसभा में यह मांग की थी कि सरकार मियां म्यूजियम खोलने की इजाजत दे या म्यूजियम खोले। इतना ही नहीं, गुवाहाटी में जो सबसे बड़ा कला क्षेत्र है श्रीमंत शंकरदेव कला क्षेत्र उसमें भी मियां म्यूजियम खोलने की मांग की गई। यह मांग समय-समय पर होती रही और इसको दरकिनार किया जाता रहा। जब यह निजी म्यूजियम खुल गया तब सरकार की आंख खुली और इसकी जांच शुरू हुई। तब पहले तो उस घर को बुलडोजर लगाकर गिरा दिया गया। इससे पहले भी ऐसे तीन अवैध मदरसे सरकार गिरा चुकी है। मियां म्यूजियम की जांच से जो बात सामने आई है वह चिंता में डालने वाली बात है। इसकी फंडिंग दो संगठनों से हुई है। मियां म्यूजियम के मेहर अली का संबंध इन दोनों संगठनों से है। एक है अलकायदा इन इंडियन सबकॉन्टिनेंट और दूसरा है अंसारुल्लाह बांग्ला टीम। दोनों आतंकवादी संगठन है और दोनों संगठन आतंकवादी गतिविधियों को पालते पोसते हैं। उनके एजेंट असम और उत्तर पूर्व के दूसरे राज्यों में भी हैं। इनके दो तीन एजेंटों की गिरफ्तारी हुई है। उनसे जो बात निकल कर सामने आई है उसे पता चला कि मेहर अली अली और इनका संबंध पहले से है। मेहर अली को म्यूजियम खोलने के लिए पहली किस्त के तौर पर दस हजार रुपये दिए गए थे।

असम को अस्थिर करने की कोशिश

अब इस बात को समझिए कि इसके पीछे का मकसद क्या है। भाजपा का पिछले विधानसभा चुनाव में जो मुख्य नारा भूमि-पुत्रों को बांग्लादेशी घुसपैठियों से बचाने का था। एनआरसी का मुद्दा राज्य में लंबे समय से चल रहा है। ये सब कोशिशें उन लोगों की ओर से हो रही हैं जो चुनावी मैदान में नाकाम रहे हैं। जनता की अदालत में जिनके पक्ष में फैसला नहीं आया वे अब जनता के मैंडेट को तोड़फोड़ के जरिये, आतंकवाद के जरिये बदलना चाहते हैं। वे असम में आतंकवाद, हिंसा और सांप्रदायिक दंगे फैलाना चाहते हैं। चाहते हैं कि हिंदू-मुस्लिम टकराव हो, सांप्रदायिक घटनाएं हों ताकि सरकार को बदनाम किया जा सके। सरकार के कामकाज और कार्यशैली पर सवाल उठे। सरकार की विकास योजनाओं और नीतियों को लेकर सवाल उठे। इसमें कोई हर्ज नहीं है लेकिन सरकार को इस तरह से अस्थिर करने की कोशिश। यह मामला केवल असम तक का नहीं है। इसमें अंतरराष्ट्रीय ताकतें शामिल हैं। यह बात उन लोगों को कतई हजम नहीं हो रही है जो मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति करते हैं। उनके लिए यह कल्पना में भी नहीं था कि असम जैसे राज्य में भाजपा की कभी सरकार बन सकती है। अब तो दो-दो बार स्पष्ट बहुमत से बन चुकी है। ऐसे में सारी कोशिश यह है कि प्रदेश में राजनीतिक अस्थिरता पैदा की जाए। इसके लिए आतंकवादी संगठनों का सहारा लिया जाए या जो भी हो सकता है वह किया जाए और प्रदेश को दंगों की आग में झोंक दिया जाए। असम में इस तरह की घटनाएं कोई नई नहीं हैं। मगर पिछले छह साल से- जब से यह सरकार आई है तब से- असम में सांप्रदायिक स्थिति नियंत्रण में है। कोई दंगा-फसाद नहीं हुआ, कोई ऐसी बड़ी घटना नहीं हुई।

बंगाल हाथ से निकलने का डर

यह उनके लिए चिंता की बात बन गई है। उनकी सबसे बड़ी चिंता यह है कि असम में आज ऐसा हुआ है तो बंगाल में कल हो सकता है क्योंकि बंगाल में मुस्लिम आबादी का प्रतिशत असम से कम है। असम में ऐसा हुआ और बंगाल में नहीं हो पाया क्योंकि असम के हिंदू एकजुट हो गए। बंगाल के नहीं हो पाए। मामला यह है कि किसी तरह से हिंदू एकजुटता को तोड़ा जाए। इसके लिए जरूरी है कि अशांति पैदा की जाए। आजकल पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी जिस तरह की भाषा बोल रही हैं, जिस तरह से उन्होंने चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया की मौजूदगी में कहा कि लोकतंत्र को बचाइए, इस देश की संस्थाओं को बचाइए, कोई भी मुख्यमंत्री या संवैधानिक पद पर बैठा हुआ व्यक्ति चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया के सामने इस तरह का राजनीतिक भाषण नहीं दे सकता। ममता बनर्जी ने जो कहा वह उनकी हताशा का संकेत है। उनके हिसाब से फेडरलिज्म खतरे में है। अभी हाल ही में केंद्रीय गृह मंत्रालय की ओर से देश भर के गृह मंत्रियों, गृह सचिवों और पुलिस महानिदेशकों की नई दिल्ली में बैठक बुलाई गई थी। उस बैठक में न तो वह खुद आईँ, न अपने गृह सचिव और डीजीपी को भेजा, वह फेडरलिज्म की बात कर रही हैं। बंगाल से असम तक बड़ी राजनीतिक अस्थिरता पैदा करने की कोशिश हो रही है। इसके जरिये यह दिखाया जाए कि बीजेपी के सत्ता में आने से असम में राजनीतिक परिस्थितियां प्रतिकूल हो गई हैं। बीजेपी जब तक सत्ता में रहेगी तब तक स्थिति सामान्य नहीं होUगी। बंगाल और असम दोनों की राजनीति को जोड़ कर देखिए, जो आज असम में हुआ है वह कल बंगाल में होगा इसकी प्रबल संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता है।

इरादे खतरनाक

समस्या की जड़ यही है। समस्या की मूल वजह यही है कि जो असम में हुआ है वह बंगाल में न होने पाए। इसलिए पहले असम को अशांत करो, वहां राजनीतिक अस्थिरता पैदा करो। आतंकवादी संगठनों के सहयोग से निजी म्यूजियम के बहाने जो शुरुआत हुई है यह आने वाले समय में बड़े खतरे का संकेत है। इसको अगर शुरुआत में ही नहीं रोका गया, जिसकी कोशिश हो रही है, तो यह बड़ा रूप ले सकता है। यह ऐसी भी परिस्थिति पैदा कर सकते हैं कि बात हाथ से बाहर निकल जाए। मगर जिस तरह से असम सरकार प्रोएक्टिव है, मुझे लगता नहीं कि उनके इरादे सफल हो पाएंगे। लेकिन चौकन्ना रहने की जरूरत है क्योंकि तमाम विदेशी और देश के अंदर की बहुत सी ताकतें नहीं चाहती कि यह देश आगे बढ़े। नहीं चाहते कि इस देश में अमन-चैन रहे, नहीं चाहते कि देश में विकास की गति तेज हो, नहीं चाहते कि भारत का रुतबा बढ़े, नहीं चाहते कि भारत का ताकतवर हो। ऐसी ताकतों का मुकाबला करने के लिए लोगों को तैयार रहना चाहिए। मुकाबले का एक ही तरीका है और वह है वोट। वोट के जरिये आप ऐसी ताकतों का मुंहतोड़ जवाब दे सकते हैं।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक और ‘आपका अखबार’ न्यूज पोर्टल एवं यूट्यूब चैनल के संपादक हैं)