केंद्र ने शुरू की घुसपैठियों पर कड़े प्रहार की तैयारी।

#pradepsinghप्रदीप सिंह।
अभी चंद दिन पहले कई राज्यों में नए राज्यपालों की नियुक्ति हुई। अब यह कोई ऐसी बात नहीं है जिस पर विशेष रूप से ध्यान दिया जाए। लेकिन मेरी समझ से यह फेरबदल बहुत ही दूरगामी रणनीति के तहत लिया गया है। यह लगता तो प्रशासनिक फेरबदल है , लेकिन यह दरअसल देश की सुरक्षा रणनीति के तहत उठाया गया कदम है।
जरा दो बयानों पर गौर कीजिए। पहला 15 अगस्त 2025 को लाल किले से प्रधानमंत्री का है,जब उन्होंने डेमोग्राफी कमीशन की घोषणा की और कहा कि कोई देश घुसपैठियों को अपने यहां रहने या निर्बाध तरीके से आने नहीं दे सकता। जिस तरह से देश की डेमोग्राफी बदल रही है, वह चिंता की बात है। दूसरा बयान केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह का है। उन्होंने कहा कि पश्चिम बंगाल में भाजपा की सरकार बनेगी और हम चुन-चुनकर एक-एक घुसपैठिए को देश से निकालेंगे। बिहार विधानसभा चुनाव के बाद शाह ने राज्य के सीमांचल इलाके में कई दौरे किए हैं और उसके साथ ही एक चर्चा चल रही है कि भारत सरकार नौवीं यूनियन टेरिटरी बनाने जा रही है। यूनियन टेरिटरी में प्रदेश का कोई दखल नहीं होता। वह सीधे केंद्र सरकार के अधीन होती है। एक-आध उदाहरण को छोड़ दें तो यूनियन टेरिटरी में विधानसभा भी नहीं होती। चर्चा है कि इस नौवीं यूनियन टेरिटरी में बिहार के सीमांचल के चार जिले किशनगंज, कटिहार, पूर्णिया और अररिया आएंगे। इन चार जिलों की डेमोग्राफी देखें तो सबसे ज्यादा किशनगंज में 68% मुस्लिम आबादी है और सबसे कम अररिया में है 42.2% मुस्लिम आबादी है। इन चारों जिलों की सीमा नेपाल और पश्चिम बंगाल से लगती है और यहां घुसपैठियों के आने की रफ्तार सबसे ज्यादा है। घुसपैठ पर अगर रोक लगानी है तो इन जिलों की सुरक्षा व्यवस्था और प्रशासन पर ध्यान देना होगा। कहा जा रहा है कि इन चार जिलों और पश्चिम बंगाल के दो जिलों मालदा और उत्तरी दिनाजपुर को मिलाकर छह जिलों की यूनियन टेरिटरी बनेगी। इसकी हालांकि कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन जिस तरह के कदम उठाए जा रहे हैं,उससे लगता है कि यह सचमुच होने जा रहा है।
हाल ही में जिन राज्यपालों की नियुक्ति हुई है,उसमें दो नामों पर ध्यान देने की जरूरत है। बिहार का राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल अता हसनैन को बनाया गया है। वे वरिष्ठ सेना अधिकारी रहे हैं और उनको एक समय जम्मू-कश्मीर का राज्यपाल बनाने पर भी विचार किया गया था। सरकार की नजर उन पर लंबे समय से थी। मुझे याद नहीं है कि बिहार में कभी किसी पूर्व वरिष्ठ सैन्य अधिकारी की गवर्नर के रूप में नियुक्ति हुई हो। वहां किसी पूर्व सैन्य अधिकारी को गवर्नर बनाने का सीधा सा मतलब है कि ये पॉलिटिकल अपॉइंटमेंट नहीं है। मेरी नजर में यह सुरक्षा की दृष्टि से उठाया गया बहुत बड़ा कदम है। इसी तरह आर एन रवि को पश्चिम बंगाल का राज्यपाल बनाया गया है। वह तमिलनाडु के गवर्नर थे। पूर्व आईपीएस अधिकारी हैं। आईबी में रह चुके हैं और उसके अलावा डिप्टी एनएसए पद पर भी रहे। सुरक्षा की दृष्टि से उनका दृष्टिकोण,उनका अनुभव, उनकी जानकारी क्या है,यह सबको पता है। तो यह दोनों नियुक्तियां देश की सुरक्षा, बदलती हुई डेमोग्राफी और घुसपैठ की बढ़ती हुई समस्या को ध्यान में रखकर हुई हैं। इन दोनों में इन समस्याओं से निपटने की क्षमता है।
नई बनने वाली यूनियन टेरिटरी में छह जिलों के साथ ही सिलीगुड़ी का गलियारा, जिसको चिकन नेक भी कहते हैं,को भी शामिल करने की चर्चा है। चिकन नेक नॉर्थ ईस्ट की सुरक्षा की दृष्टि से बेहद अहम है। इसके बारे में तमाम मुस्लिम संगठनों के नेता, जो जिहादी हैं, बार-बार कहते रहे हैं कि चिकन नेक को काट देंगे तो पूरा नॉर्थ ईस्ट भारत से कट जाएगा। शरजील इमाम का बयान तो आपको याद ही होगा। बांग्लादेश में जब यूनुस था, तब वह भी इसी तरह की बातें करता था। इस इलाके को यूनियन टेरिटरी में शामिल किए जाने का मतलब है कि इस पूरे क्षेत्र का प्रशासन सीधे केंद्र सरकार के हाथ में होगा। सिलीगुड़ी गलियारे के दोनों तरफ कहा जा रहा है पूरी तरह से डेमोग्राफी बदल दी गई है। दोनों तरफ मुसलमानों की बहुतायत हो गई है और इनमें से ज्यादातर घुसपैठिए हैं, जो बांग्लादेश से आए हैं। यह भारत के लिए बेहद चिंता की बात है। कल को मान लीजिए कोई युद्ध की स्थिति आती है और चिकन नेक खतरे में पड़ता है तो इन लोगों की निष्ठा किस तरफ होगी? बांग्लादेश की तरफ या भारत की तरफ? जाहिर है बांग्लादेश की तरफ होगी। उसकी तैयारी पहले से नहीं हुई तो ऐन मौके पर हमको बहुत बड़ी निराशा,बहुत बड़ा धक्का लगने वाला है।
देश की इंटरनल सिक्योरिटी को पहला चैलेंज नक्सलवाद या माओवाद का था। उसका लगभग सफाया हो गया है। दूसरा चैलेंज घुसपैठिये हैं। ये घुसपैठिए जंगल में नहीं रहते। हमारे आपके बीच में रहते हैं और कुछ राज्य सरकारें, राजनीतिक दल और नेता इनको संरक्षण देते हैं। ये बांग्लादेश के जरिए पश्चिम बंगाल में आते हैं। वहीं इनके सारे आइडेंटिटी पेपर बनते हैं और उसके बाद देश के अलग-अलग हिस्सों में इनको भेज दिया जाता है। उसके लिए पैसा दिया जाता है। पूरा एक तंत्र काम करता है। कुछ राजनीतिक दलों के लिए ये बड़ा वोट बैंक हैं तो वे इनको पालती पोसती हैं। वे इस बात की चिंता नहीं करतीं कि ये देश की सुरक्षा के लिए कितना बड़ा खतरा हैं। तो इस परिस्थिति और सोच से भारत सरकार को लड़ना है। उसी की तैयारी चल रही है। घुसपैठ पर प्रभावी रूप से अगर लगाम लगानी है तो केंद्र सरकार के प्रशासनिक अधिकार क्षेत्र में यह इलाका आना चाहिए। वह तभी आ सकता है जब यह यूनियन टेरिटरी बने।
हालांकि सरकार चिकन नेक की सुरक्षा पर ध्यान दे रही है। वहां जिस तरह से आर्मी, एयरफोर्स और बीएसएफ का डिप्लॉयमेंट हुआ है,वह बताता है कि सरकार ने पूरे इलाके की एक तरह से किलेबंदी कर ली है, लेकिन डेमोग्राफी का क्या करें? आपका दुश्मन हमला करता है और स्थानीय लोग आपके खिलाफ हो जाते हैं तो समझिए क्या परिस्थिति होगी। पंजाब में हम मिलिटेंसी इसलिए खत्म कर पाए कि वहां की बहुसंख्यक आबादी हमारे साथ थी। जम्मू कश्मीर में यही सबसे बड़ी दिक्कत आ रही है। वहां की स्थानीय आबादी हमारे साथ नहीं है बल्कि हमारे खिलाफ है। इसका नजारा हम अभी खामेनई की हत्या के खिलाफ हुए प्रदर्शनों के दौरान देख चुके हैं। घाटी में जिस तरह के नारे लगे हैं, वह बताता है कि उनकी निष्ठा कहां है? इसी तरह से सिलीगुड़ी गलियारे और इन छह जिलों में जो घुसपैठियों की आबादी है, उनकी निष्ठा जाहिर है कि भारत के साथ नहीं है। तो इसकी तैयारी में ही मेरा मानना है कि लेफ्टिनेंट जनरल अता हसनैन और आर एन रवि की राज्यपाल के रूप में नियुक्ति की गई है।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)