उनका कांसेप्ट क्लियर, गलतफहमी हमें।
प्रदीप सिंह।
इस समय देश में दो बातों की बहुत चर्चा है। एक जिहाद और दूसरा मुसलमानों पर जुल्म हो रहा है। इसके समर्थन में अंतरराष्ट्रीय जनमत जुटाया जा रहा है। हाल ही में न्यूयॉर्क के नए मेयर जोहरान ममदानी ने जब शपथ ली तो उसके बाद उन्होंने उमर खालिद के बारे में कहा कि हमको आपकी चिंता है। उमर खालिद कौन है? उमर खालिद दिल्ली में हिंदू विरोधी दंगों का आरोपी है,जो 5 साल से जेल में है और जिसको हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट ने जमानत देने से मना कर दिया है। अब उसको लेकर विक्टिम कार्ड खेला जा रहा है कि मुसलमानों पर बड़ा जुल्म हो रहा है।

इस विषय पर डॉक्टर शंकर शरण का एक लेख है। चूंकि इन विषयों पर उनका बड़ा गहन अध्ययन है,तो उन्होंने जो बातें कही हैं,वही शेयर कर रहा हूं। उन्होंने अपनी बात की शुरुआत जमाते उलेमा के मुखिया महमूद मदनी के एक भाषण से की है। भोपाल में 30 नवंबर को हुए एक जलसे में मदनी ने कहा था कि जिहाद जैसी इस्लाम की पवित्र अवधारणा को बदनाम किया जा रहा है और इसको हिंसा और अव्यवस्था से जोड़ा जा रहा है। तो डॉक्टर शंकर शरण ने अपने लेख में जिहाद को लेकर ही बिहार के राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान की बात को कोट किया है। आरिफ मोहम्मद खान से जिहाद के बारे में एक इंटरव्यू में पूछा गया था तो उन्होंने कहा कि देवबंद में क्या पढ़ाया जा रहा है,जरा वह किताब खोलकर देख लीजिए। देवबंद में पढ़ाया जाता है कि दीन की तरफ बुलाने पर जो आना कबूल न करे उसके साथ जंग करने को ही जिहाद कहते हैं। दीन की तरफ बुलाने का क्या मतलब है? इसको भी उन्होंने स्पष्ट किया। दीन की तरफ बुलाने का मतलब यह है कि अगर आपसे कहा जाए कि आप इस्लाम स्वीकार कर लीजिए। मुसलमान बन जाइए और आप मना कर देते हैं तो आपसे जंग करना ही जिहाद है। ध्यान देने की बात यह भी है कि देवबंद से ही देशभर में कई मदरसे संचालित होते हैं। तो डॉक्टर शंकर शरण ने सवाल उठाया कि मौलाना मदनी किसको इस्लाम का दुश्मन बता रहे हैं? वे कहते हैं-इस्लामी किताबें बताती हैं कि जो अल्लाह के कहे से इनकार करते हैं,वे काफिर होते हैं और अल्लाह काफिरों का दुश्मन है। दुश्मन की यह परिभाषा है इस्लाम में कि जो काफिर है वो दुश्मन है। तो जाहिर है कि इस्लाम ही गैर मुस्लिमों को दुश्मन बनाकर उन्हें अपमानित करने और उनके खिलाफ जंग छेड़ने की बात करता है।
फिर डॉक्टर शंकर शरण ने मदनी से पूछा है कि यह बताइए कि जो मूर्ति पूजक हैं,उनकी सोच इस्लाम के प्रति क्या होनी चाहिए? उनको इस्लाम को किस रूप में देखना चाहिए? और फिर उन्होंने कहा कि आरिफ मोहम्मद खान की टिप्पणी के मुताबिक सबसे बड़ा जुल्म मूर्ति पूजा करना है। सब कुछ माफ किया जा सकता है,लेकिन शिर्क यानी मूर्ति पूजा को माफ नहीं किया जा सकता। तो हम आप जो सनातनी हैं,हम तो मूर्ति पूजा में विश्वास रखते हैं। तो इस्लाम कहता है कि इसे माफ़ नहीं किया जा सकता। यानी जब तक सनातन धर्म रहेगा तब तक जिहाद चलेगा। वहां कासेप्ट में कोई कंफ्यूजन नहीं है। सब कुछ क्लियर है। सारा कंफ्यूजन हिंदुओं में है। उनको समझ में ही नहीं आता है कि उनके बारे में इस्लाम के मानने वाले क्या सोचते हैं। वे उनके साथ कैसा व्यवहार करना चाहते हैं। और यह बात इस्लाम की स्थापना के समय से कही जा रही है- या तो हमारा मजहब आप स्वीकार कर लीजिए या फिर हमारी तलवार आपकी गर्दन पर चलने के लिए तैयार है।
जो मदनी बोल रहे हैं,इस सब का मकसद सिर्फ यह है कि जिहाद को पवित्र मानकर हिंदू चुप रहे। उसका विरोध न करें। जिहाद का जो असली मकसद है,उसको हम छिपा कर रखें। जब किताब में पढ़ाया जाता है तो छिपा कर क्या रखना? केवल सार्वजनिक बयानों में छिपा कर रखा जाता है कि जिहाद एक पवित्र अवधारणा है। अत्याचार से लड़ना,जुल्म से लड़ना,यह जिहाद है। और जुल्म क्या है? उस देश में या दुनिया के उस भूभाग पर रहना,जहां दारुल इस्लाम नहीं है यानी जहां शरिया का राज नहीं है। वहां अगर मुसलमान रहता है तो उस पर जुल्म हो रहा है। तो आप जुल्म का अर्थ समझिए। फिर उसके बाद तय कीजिए कि मुसलमान पर जुल्म हो रहा है या नहीं। तो मदनी साहब जो कह रहे हैं उसके हिसाब से और इस्लाम के हिसाब से तो मुसलमानों पर बहुत बड़ा जुल्म हो रहा है और इस्लामी मुल्कों को छोड़कर जहां-जहां मुसलमान हैं,उन सब जगहों पर मुसलमानों पर जुल्म हो रहा है। मदनी मीडिया को,सरकार को और यहां तक कि सुप्रीम कोर्ट को भी धमकाते हैं। मुसलमानों का आह्वान करते हैं कि वे वंदे मातरम न गाएं क्योंकि वंदे मातरम गाना भी मुसलमानों पर जुल्म है। तो यह सारी कवायद इसलिए है कि भारत में हिंदुओं के मन में अपराध बोध पैदा करो कि वे मुसलमानों पर बहुत जुल्म कर रहे हैं। क्यों? क्योंकि वे भारत में शरिया का राज स्थापित नहीं होने दे रहे हैं। भारत का राज संविधान के मुताबिक चलाने की बात करते हैं। फिर डॉक्टर शंकर शरण कहते हैं जिहाद का सिद्धांत राजनीतिक इस्लाम की बुनियाद है। राजनीतिक इस्लाम का उद्देश्य पूरा ही नहीं होगा जब तक जिहाद नहीं होगा। जिहाद का मतलब है कि ऐसी जगह पर रहना जहां शरिया के मुताबिक राज ना चलता हो। तो इस्लाम दुनिया को दो हिस्सों में बांट कर देखता है। एक दारुल इस्लाम और दूसरा दारुल हर्ब। दारुल इस्लाम,जहां इस्लाम का राज है यानी शरिया का राज है। दारुल हर्ब जहां शरिया का राज नहीं है। तो जब तक भारत में शरिया का राज नहीं आता,भारत दारुल इस्लाम नहीं बनता तब तक यहां रहने वाले मुसलमानों पर जुल्म हो रहा है। और जुल्म के खिलाफ जिहाद करना यह तो इस्लाम में कहा ही गया है।

भारत को दारुल इस्लाम बनाना इस्लाम का अधूरा एजेंडा है। मुगलों ने 800 साल भारत पर राज किया,लेकिन उसे दारुल इस्लाम नहीं बना पाए। यह पछतावा आज की पीढ़ी में भी है। महमूद मदनी उन्हीं लोगों को जगा रहे हैं कि इस्लाम के इस अधूरे एजेंडे को पूरा करो।
पाकिस्तान बनने के बाद भारत में रह गए बहुत से मुस्लिम कहते हैं कि हम अपनी इच्छा से यहां रह गए। किसी ने हम पर जबरदस्ती नहीं की थी। सही बात है। भारत के नेताओं ने यह गलती की कि उन्होंने जबरदस्ती नहीं की। सरदार पटेल और डॉ.अंबेडकर चाहते थे कि धर्म के आधार पर बंटवारा हुआ है तो सारे मुसलमान पाकिस्तान चले जाएं और सारे हिंदू भारत में आ जाएं,लेकिन ऐसा नहीं हुआ। क्यों नहीं हुआ? एक और नारे को याद कीजिए, जो डायरेक्ट एक्शन डे के बाद लगाया गया था कि लड़कर लेंगे पाकिस्तान,हंसकर लेंगे हिंदुस्तान। तो जो रह गए वे इसीलिए रह गए। भारत में रह गए लोगों में मेजॉरिटी ऐसे लोगों की है,जिन्होंने पाकिस्तान के पक्ष में मुस्लिम लीग को वोट दिया था। उन्हीं के वोट से मुस्लिम लीग जीती। लेकिन वह भारत छोड़कर नहीं गए क्योंकि वह बहुत दूर तक की सोचते हैं। उनको अपना एजेंडा क्लियर है। यह मतिभ्रम हिंदुओं को है,जिनको समझ में नहीं आया। जब बांग्लादेश को हमने आजाद कराया तब भी यह बात समझ में नहीं आई कि हमने 1947 में जो गलती की उसको कुछ अंश तक बांग्लादेश के जरिए सुधार लें। दरअसल हिंदुओं में न तो इतिहास बोध है,न शत्रु बोध,न स्वयं बोध और स्मृति का बोध भी नहीं है। हम लगातार गलती करते जा रहे हैं और आज भी कर रहे हैं। जो हिंदू मुसलमानों पर जुर्म की बात का समर्थन करते हैं,वे दरअसल देश के एक और विभाजन का आधार तैयार कर रहे हैं। अब आप उनकी लॉन्ग टर्म प्लानिंग देखिए डेमोग्राफी किस तरह से बदल रहे हैं।
क्या किसी हिंदू ने इस बारे में सोचा कि डेमोग्राफी बदलते ही कैसे सब कुछ बदल जाता है। सबसे बड़ी बात है कि आपकी पहचान खत्म हो जाती है। आपकी संस्कृति खत्म हो जाती है। लेकिन हम हैं कि इसको समझने को तैयार ही नहीं है। बांग्लादेश में हिंदू मारे जा रहे हैं। मंदिर तोड़े जा रहे हैं। ऐसे में शाहरुख खान की हिम्मत होती है कि वह अपनी आईपीएल टीम के लिए एक बांग्लादेशी क्रिकेटर को खरीदे और भारत सरकार एवं बीसीसीआई ऐसा होने देती है। जब विरोध होता है तब उसको रिलीज किया जाता है। तो आप समझिए शाहरुख खान किसके साथ है? शाहरुख खान पहले मुसलमान है,फिर इंसान है और फिर शायद भारतीय हैं। इसमें कोई गलतफहमी उनको नहीं है। गलतफहमी हमको आपको है। जो सच्चाई को देखने से साफ-साफ इंकार कर रहे हैं। जो अपनी मौत का फरमान लिख रहे हैं। जो अपने विनाश की नींव तैयार कर रहे हैं। और इस गलतफहमी में हैं कि कुछ होगा नहीं।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक और ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)



