राजीव रंजन

भारतीय सिने-संगीत के आकाश में यदि कुछ स्वर शाश्वत हैं, तो उनमें आशा भोसले का नाम अत्यंत आदर और प्रेम से लिया जाएगा। उनका जाना केवल एक महान गायिका का जाना नहीं, बल्कि एक ऐसे युग का अवसान है, जिसने भारतीय संगीत को नई संवेदनाएं, नई लय, नए तेवर और नई पहचान दी।

प्रसिद्ध संगीतकार ओपी नय्यर ने एक बार कहा था – “लता जी जैसी गायिका सौ साल में एक बार पैदा होती हैं और आशा भोसले जैसी गायिका हज़ार साल में।” यह कथन अतिशयोक्ति नहीं, बल्कि उस विलक्षण प्रतिभा का सटीक मूल्यांकन है, जिसने हर शैली, हर भाव और हर युग में अपने स्वर की अमिट छाप छोड़ी।

लता मंगेशकर जैसी महान गायिका की छोटी बहन होना अपने आप में एक बड़ी चुनौती थी। किंतु आशा भोसले ने इस चुनौती को अपनी पहचान का आधार नहीं बनने दिया। उन्होंने अपनी अलग राह चुनी और उस राह पर चलकर इतिहास रचा। कला-जगत सहित जीवन के किसी में क्षेत्र में अक्सर देखा गया है कि कई लोग अपने मां, पिता, पति, पत्नी, भाई, बहन आदि की महानता में दबकर खो जाते हैं। ऐसे उदाहरण भरे पड़े हैं। स्वयं आशा भोसले के परिवार में ऊषा मंगेशकर, मीना मंगेशकर और हृदयनाथ मंगेशकर जैसे अत्यंत प्रतिभाशाली नाम रहे। लेकिन वे बड़ी बहन लता मंगेशकर की छाया में खो से गए। वहीं आशा भोसले ने यह सिद्ध किया कि आपमें कुछ ख़ास है, तो आप किसी भी छाया से बाहर निकलकर अपना स्वयं का आकाश बना सकते हैं।

आशा भोसले की आवाज़ में जो चुलबुलापन, खनक और मादकता थी, वह उन्हें भीड़ से अलग करती थी। गीता दत्त के गायन के अवसान के बाद हिन्दी फिल्म संगीत में जो खालीपन आया था, उसे आशा भोसले ने न केवल भरा, बल्कि उसे नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया। आशा भोसले केवल एक गायिका नहीं थीं, वे एक ऐसी आवाज़ थीं, जिसने परम्पराओं को चुनौती दी।

ओपी नय्यर के साथ उनकी जोड़ी ने हिन्दी फिल्म संगीत को एक नया तेवर दिया – तेज़ लय, पश्चिमी वाद्ययंत्रों का प्रयोग और एक अलग तरह के संगीत का सृजन। बाद में अपने पति और संगीतकार आरडी बर्मन के साथ उनका संगीत एक नए शिखर पर पहुंचा। यह सम्बंध केवल निजी नहीं, बल्कि रचनात्मक साझेदारी भी था, जहां हर गीत एक प्रयोग, एक खोज और एक इनोवेशन बन गया। “दम मारो दम” से लेकर “पिया तू अब तो आजा” तक, उन्होंने हर गीत में अपने स्वर से एक नया संसार रचा।

आशा भोसले की सबसे बड़ी विशेषता थी, उनकी बहुमुखी प्रतिभा। ग़ज़ल, भजन, पॉप, कैबरे, लोकगीत, कोई भी शैली उनसे अछूती नहीं रही। वे केवल गीत नहीं गाती थीं, वे भावों को जीती थीं। उनकी आवाज़ में कभी शरारत होती थी, कभी दर्द, कभी प्रेम और कभी विद्रोह।

आशा भोसले का दैहिक अवसान निश्चय ही एक स्वर्णिम युग का अंत है, किंतु उनका कृतित्व अमर है। उनके गीत आने वाली पीढ़ियों को न केवल संगीत का आनंद देंगे, बल्कि यह भी सिखाएंगे कि कला में मौलिकता और साहस कितने मायने रखते हैं। उनकी आवाज़ हमेशा गूंजती रहेगा – रेडियो की तरंगों में, स्मृतियों के कोनों में और हर उस दिल में, जिसे संगीत से प्यार है।

भारतीय परम्परा में समय की अवधारणा चक्रीय है। यह चक्र की तरह घूमता रहता है। जो आज है, पहले भी कभी रहा था और कल भी लौटकर आएगा। इसीलिए हम पुनर्जन्म में विश्वास करते हैं। आशा भोसले फिर लौट कर आएंगी। आशा भोसले केवल एक नाम नहीं, एक युग हैं, और युग कभी समाप्त नहीं होते, लौट-लौटकर आते रहते हैं चक्र की गति की तरह।

आशा भोसले को सादर नमन। विनम्र श्रद्धांजलि।