हाई कोर्ट ने लगाया एक लाख का जुर्माना।

कोर्ट के इस फैसले से योगी आदित्यनाथ को बड़ी राहत मिली है। यह फैसला न्यायमूर्ति डीके सिंह ने गोरखपुर के कथित सोशल वर्कर परवेज परवाज़ की आपराधिक पुनरीक्षण याचिका पर दिया। कोर्ट ने कहा कि आरोपी के लोक सेवक होने के नाते शासन से उनके खिलाफ अभियोग चलाने की मांगी गई अनुमति पर इनकार कर दिया। जिसकी वैधता पर हाईकोर्ट व सुप्रीम कोर्ट में सवाल उठे, जहां आदेश पर हस्तक्षेप नहीं किया गया। निष्पक्ष विवेचना पर उठे सवालों को हाईकोर्ट ने सही नहीं माना और विवेचना अन्य एजेंसी को सौंपने की मांग अस्वीकार कर याचिका खारिज कर दी। ऐसे में ट्रायल कोर्ट को प्रोटेस्ट अर्जी पर इन्हीं मुद्दों को फिर से सुनने का अधिकार नहीं है। ट्रायल कोर्ट ने प्रोटेस्ट अर्जी खारिज करने में कोई कानूनी प्रक्रियागत गलती नहीं की है। अर्जी खारिज करने की वैधता की चुनौती याचिका कोर्ट ने खारिज कर दी।
कोर्ट ने कहा याची अक्टूबर 2007 में योगी आदित्यनाथ, तत्कालीन सांसद गोरखपुर, के खिलाफ हाईकोर्ट आया कि हुए अपराध की प्राथमिकी दर्ज की जाय। कोर्ट ने कहा अधीनस्थ अदालत में धारा 156(3) में एफआईआर दर्ज करने की अर्जी दें। सीजेएम ने अर्जी खारिज कर दी। याची ने हाईकोर्ट में चुनौती दी। हाईकोर्ट ने सीजेएम का आदेश रद्द करते हुए प्राथमिकी दर्ज कर विवेचना का निर्देश दिया। 2नवंबर 2008 को गोरखपुर के कैंट थाने में प्राथमिकी दर्ज हुई। योगी सहित पांच लोग आरोपित किए गए। योगी इस आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट गए, किंतु राहत नहीं मिली। इसके बाद याची ने सही विवेचना के लिए अन्य एजेंसी को जांच सौंपने की मांग में हाईकोर्ट में याचिका दायर की। आरोप लगाया कि योगी के भाषण की डीवीडी व कंपैक्ट डिस्क की फोरेंसिक जांच सही नहीं कराई गई, जो उसने कोर्ट में पेश की थी। उसकी जांच न कराकर फर्जी डीवीडी व कंपैक्ट डिस्क जांच के लिए लैब भेजा गया। इसी दौरान शासन ने योगी के खिलाफ अभियोग चलाने की अनुमति देने से इनकार कर दिया। सीबीसीआईडी ने फाइनल रिपोर्ट पेश की।
कोर्ट में अभियोग चलाने के कानूनी मुद्दों पर सरकार से पक्ष रखने को कहा। विवेचना फेयर नहीं तो कोर्ट विवेचना स्थानांतरित कर सकती है। अंततः कोर्ट ने जांच प्रक्रिया सही मानी और याचिका खारिज कर दी। सुप्रीम कोर्ट ने भी हस्तक्षेप नहीं किया। इसके बाद प्रोटेस्ट अर्जी में अभियोग चलाने से इनकार आदेश पर सवाल खड़े किए गए। विशेष अदालत ने अर्जी खारिज कर दी और कहा कि अभियोग चलाने के राज्य शासन के इनकार के मुद्दे पर वह सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद सुनवाई नहीं कर सकती, जिसे चुनौती दी गई थी।
अपर महाधिवक्ता ने याची की संलिप्तता पर सवाल खड़े किए और कहा कि उसपर गंभीर अपराध के केस है। सोशल वर्कर नहीं कह सकते। कुछ ताकतें हैं जो मुख्यमंत्री योगी और प्रदेश का उनके द्वारा किया जा रहा विकास नहीं देखना चाहती। याची को ऐसी ताकतों का संरक्षण है। ताकतें प्रदेश की प्रगति को डिरेल करना चाहती है। याची ऐसी ताकतों का मुखौटा है, जिस पर कोर्ट ने राज्य पर इसकी जांच छोड़ते हुए विशेष अदालत के आदेश पर हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।(एएमएपी)



