यूपी जीतना है तो 2017 की तरह लड़ना होगा।

#pradepsinghप्रदीप सिंह।

देश की राजनीति एक अजीब से मोड़ पर ठहरी हुई है। मतदाता भी दुविधाग्रस्त है कि उसका भविष्य का निर्णय क्या हो? जिससे नाराज है, उसके खिलाफ नहीं जाना चाहता क्योंकि विकल्प उससे ज्यादा खराब है और जो है उससे उसकी संतुष्टि का स्तर लगातार कम हो रहा है। इसका नतीजा है कि सत्तारूढ़ भाजपा का हॉरिजॉन्टल विस्तार तो हो रहा है। वह नए भौगोलिक क्षेत्रों में पहुंच बना रही है। अभी जो चार राज्यों में विधानसभा चुनाव हो रहे हैं,उसमें उसकी स्थिति पहले से बेहतर होने वाली है। लेकिन नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद से भाजपा का जो वर्टिकल विस्तार हो रहा था, उसकी गति थम गई है।

पिछले दो साल में भाजपा नेतृत्व ने दो बड़ी गलतियां कीं। पहली, 2024 के लोकसभा चुनाव के समय उसने 400 पार का जो नारा दिया, उसने पार्टी को बहुत नुकसान पहुंचाया और बहुमत से पीछे कर दिया। 400 पार का नारा भाजपा के अहंकार को बता रहा था। यह नारा मतदाता के निर्णय का इंतजार करने को तैयार नहीं था। उसने इस बात का कोई जवाब नहीं दिया गया कि आखिर 400 पार क्यों? तो उसका फायदा विपक्ष ने उठाया। भाजपा सरकार ने दूसरी गलती यूजीसी की गाइडलाइंस लाकर की। बनता हुआ काम बिगाड़ना जिसको कहते हैं, वह इसके जरिए हुआ। भाजपा में अगर कुछ लोग सोचते हैं कि हिंदू एकता एक मिथक है तो मेरा मानना कि सही है। अगर हिंदू एक रहता तो हम हजार साल तक गुलाम न रहते। यह हिंदू एकता की कमी ही थी जो 2024 में भाजपा बहुमत से दूर रह गई। वरना आप बताइए 500 साल के संघर्ष के बाद अयोध्या में भव्य राम मंदिर का निर्माण, काशी विश्वनाथ कॉरिडोर, काशी तमिल संगमम, अनुच्छेद 370 व 35 ए का हटना, बड़े पैमाने पर मंदिरों का पुनरुद्धार जैसे कितने काम हुए फिर भी उसकी सीटें क्यों घट गईं। पिछले 11 साल में इस सरकार ने हिंदुओं को बोलने की हिम्मत तो दे दी, लेकिन उसके बावजूद हिंदू एकजुट नहीं हुआ। हिंदू जब एकजुट नहीं होता है तो वह जातियों में बंटता है।  डॉक्टर रामधारी सिंह दिनकर की किताब संस्कृति के चार अध्याय में बताया गया है कि मुगलों के गुलाम हम क्यों हुए? हम किसी भी क्षेत्र में उनसे कम नहीं थे। वे कोई बहुत बड़ी सेना लेकर नहीं आए थे फिर भी हमारे देश पर कब्जा कर लिया। दिनकर जी ने लिखा है कि हिंदू इसलिए हार गए क्योंकि उनका राजनीतिक जीवन मंद पड़ गया था। जब-जब हिंदू का राजनीतिक जीवन मंद पड़ जाएगा तो वह हिंदुत्व को छोड़कर जातियों में बंटेगा और जातियों में बंटेगा तो हार की गारंटी तय है।

हिंदुओं में संगठन की कमी हमेशा से रही है और आज भी है। अयोध्या आंदोलन के समय विश्व हिंदू परिषद, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भाजपा ने इसे जोड़ने की कोशिश की। तात्कालिक रूप से कुछ समय के लिए हिंदू आपस में जुड़ा भी, लेकिन वह दौर बहुत लंबा नहीं चला। 1992 में अयोध्या में विवादित ढांचे के गिरने के बाद भी भाजपा हार गई। कल्पना कीजिए जिस उत्तर प्रदेश में बाबरी का ढांचा गिराया गया वहीं उसे चुनाव में मात मिली। इसके अलावा मध्य प्रदेश और हिमाचल में जहां उसकी सरकारें बर्खास्त कर दी गई थीं,वहां भी हार मिली जबकि विक्टिम कार्ड भी भाजपा के पास था। केवल राजस्थान में किसी तरह सरकार बन सकी। वह एक संदेश था कि हिंदू के नाम पर हिंदू एक नहीं होता। हां,वह जाति के नाम पर जरूर एक हो जाता है। मंडल के बाद से यादव जाति को बिहार और उत्तर प्रदेश में देख लीजिए। एक पार्टी और एक नेता के साथ लगातार खड़ी हुई है। उसको इस बात से कोई मतलब नहीं है उसको मिला क्या? लेकिन वह यादव परिवार को छोड़ने के लिए तैयार नहीं।

तो भारत का जो मतदाता है, उसकी अपेक्षा भाजपा से लगातार बढ़ती जा रही है। अब उसको यह महसूस होने लगा है कि हमारी अपेक्षा भाजपा से जिस रफ्तार से काम करने की थी, उस रफ्तार से वह काम नहीं कर रही है। और अब मुझे लगता है भाजपा भी यह अहसास करने लगी है कि हिंदुत्व के रास्ते पर चलकर बहुत दूर तक नहीं जा सकते। इतिहास में इसके उदाहरण भरे पड़े हैं। कांची कामकोटी के शंकराचार्य का मामला हमें याद रखना चाहिए। हत्या का झूठा मुकदमा चलाकर दिवाली की रात उनकी गिरफ्तारी की गई। लेकिन पूरे हिंदुस्तान में इस गिरफ्तारी के विरोध में एक आवाज नहीं उठी। कोई हिंदू संगठन उनके लिए आगे नहीं आया। और उनका कसूर क्या था? वे तमिलनाडु में ईसाई मिशनरियों द्वारा कराए जा रहे हिंदुओं के धर्म परिवर्तन को रोक रहे थे। सोनिया गांधी के कहने पर जिस जयललिता ने उन्हें जेल भिजवाया,वे फिर से चुनाव जीत गईं। ऐसा ही मालाबार में हुआ था। वहां हिंदुओं के खिलाफ हिंसा का नंगा नाच हुआ लेकिन गांधी समेत किसी ने उनके लिए आवाज नहीं उठाई।

तो फिर मुझे दिनकर जी की एक और बात याद आती है कि इस देश का हिंदू हमेशा रक्षात्मक लड़ाई लड़ा है। वह कभी आक्रामक लड़ाई नहीं लड़ा। उन्होंने कहा कि अपने दुश्मन को हराना है तो उसके घर में जाकर आक्रमण करना पड़ेगा। ऐसा इस देश के हिंदुओं ने कभी नहीं किया। हिंदू समाज की उदारता का दंड उसे मिला। तो इसलिए मुझे लगता है कि कहीं न कहीं भाजपा नेताओं के मन में भी यह है कि हिंदुत्व के मामले में एक सीमा के बाद उसका कोई पॉलिटिकल रिटर्न नहीं मिलता। हिंदुओं की जो राजनीतिक चेतना है, वह मंद पड़ने लगती है। वे उसी भाव में आ जाते हैं, कोउ नृप होई,हमै का हानि।

उनको वह खतरा दिखाई नहीं देता कि किसके रहने से सुरक्षित हैं और किसके जाने के बाद असुरक्षित हो जाएंगे। तो मतदाताओं के बीच में यह जो भाव आ रहा है, मैं मानता हूं कि अभी किसी निर्णायक स्तर पर नहीं पहुंचा है। उसके मन में भाजपा से असंतोष का एक पुट आना शुरू तो हुआ है, लेकिन उसको सामने दिखाई दे रहा है कि जो विकल्प है, वह भाजपा से और ज्यादा बुरा है। यही कारण है कि इस समय जो राजनीति दिखाई दे रही है उसमें कोई स्पष्ट दिशा नहीं है। यही कारण है कि 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले तक भाजपा जिस तरह से देश की सबसे वर्चस्ववादी पार्टी बनती दिख रही थी,ऐसा होता हुआ अभी दिखाई नहीं दे रहा है।

मुझे लगता है कि 2024 के बाद भाजपा को यह अहसास होने लगा है कि केवल हिंदुत्व से काम नहीं चलेगा। जातीय समीकरण बिठाकर जो हमने हासिल किया, खासतौर से उत्तर प्रदेश में,उसको आगे बढ़ाने की जरूरत है। मेरी स्पष्ट धारणा है कि यूजीसी की यह गाइडलाइन उसी सोच के कारण आई। लेकिन भाजपा नेताओं को यह जरूर समझ लेना चाहिए कि जाति की राजनीति उनकी पिच नहीं है। इसमें उसकी हार तय है।

2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में क्या होगा, यह प्रश्न आज सबके सामने है। मुझे लगता है कि अगर भाजपा 2017 की तरह लड़ती है-सामाजिक समीकरण, हिंदुत्व, विकास और सबको साथ लेकर तो उसकी 350 से ज्यादा सीटें आएंगी। 2022 की तरह लड़ती है,जब उसके अंदर ही समस्या हो गई लेकिन फिर भी उसने सबको साध लिया था, तो 250 सीटें आएंगी। लेकिन अगर वह 2024 के लोकसभा चुनाव की तरह लड़ेगी तो बहुमत का आंकड़ा पार करेगी या उसके आसपास रह जाएगी, यह कहना मुश्किल है। तो 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा के चुनाव का नतीजा भाजपा को खुद ही तय करना है। मतदाता तो तीसरी बार उसकी सरकार बनाने के लिए तैयार है। लेकिन क्या भाजपा तैयार है? भाजपा की जो दुविधा है कि किस रास्ते पर जाएं? जाति की राजनीति पर आगे बढ़ें या हिंदुत्व की राजनीति पर चलते रहें या दोनों का समन्वय इस तरह का बिठाएं कि दोनों में परस्पर मतभेद न हो। भाजपा नेतृत्व, उसके संगठन और उसके वैचारिक परिवार के सामने यह बड़ी चुनौती है।

(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)