भाजपा को द्रमुक विरोधी गठबंधन की धुरी बनाना चाहते हैं शाह।

प्रदीप सिंह।
जैसे चाणक्य ने अपनी चुटिया खोलकर प्रतिज्ञा ली थी कि इसको तभी बांधूंगा जब नंद वंश का विनाश कर लूंगा,अगर उसको वर्तमान संदर्भ में देखें तो ऐसा लगता है कि दो राज्यों के बारे में ऐसी ही प्रतिज्ञा केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने ली है। उनमें एक है पश्चिम बंगाल और दूसरा तमिलनाडु। अमित शाह रविवार को तमिलनाडु में थे। चूंकि राज्य में अप्रैल में चुनाव होने वाले हैं तो चेन्नई में भाजपा के कोर ग्रुप की बैठक हुई। उस बैठक में शाह ने कहा कि चुनाव सिर्फ लड़ने के लिए नहीं लड़ना है, चुनाव जीतने के लिए लड़ना है। इस तरह की भाषा भारतीय जनता पार्टी में कम ही सुनने को मिलती है। भाजपा को जनसंघ के समय से ही चुनाव हारने की आदत सी है। हार उनको हताश नहीं करती। लेकिन 2014 से भाजपा की हार-जीत का जो मामला है,उसमें बदलाव आया है। अब पार्टी जीतती ज्यादा है,हारती कम है। इसलिए हारना तो छोड़िए्, जब वह तय लक्ष्य से पीछे रह जाती है तो उसको भी हार माना जाता है।

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2016 के पश्चिम बंगाल विधानसभा के चुनाव में भाजपा सिर्फ तीन सीटें जीती थी। 2021 के चुनाव में वह तीन से सीधे 77 सीटों पर पहुंच गई, लेकिन भाजपा ने खुद और उसके विरोधियों ने भी इसे भाजपा की हार माना क्योंकि वह तय लक्ष्य तक नहीं पहुंच पाई थी। उस लक्ष्य को 2021 की हार के बाद भाजपा ने छोड़ नहीं दिया और निराश नहीं हो गए कि यह लक्ष्य इतना बड़ा है कि हम हासिल नहीं कर सकते। मुझे लगता है कि तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल में अमित शाह कोई बड़ा खेल खेलने की तैयारी कर रहे हैं, ऐसा इन दोनों राज्यों के चुनाव और नतीजों के बारे में उनका जो कॉन्फिडेंस है,उससे लगता है। उन्होंने कोई रणनीति बना रखी है जिससे धीरे-धीरे पर्दा हटा रहे हैं। तो चेन्नई में भाजपा कोर ग्रुप की बैठक में शाह ने पार्टी नेताओं से एक और महत्वपूर्ण बात यह कही कि जमीन पर लोगों से बात कीजिए,फीडबैक लीजिए कि अगर हम विजय की पार्टी टीवीके से अलायंस करें तो उसका कैसा असर होगा। फायदा होगा या नुकसान होगा। कितने लोग ऐसा चाहते हैं,कितने लोग ऐसा नहीं चाहते हैं। उसकी वजह है यह है कि विजय की पार्टी नई-नई बनी है। किसी को मालूम नहीं है कि जब चुनाव में वे उतरेंगे तो कितना वोट ले पाएंगे। वह अपनी जो फिल्म की फॉलोइंग है,उसको अपना मतदाता मानकर चल रहे हैं। एक दूसरी बात कि विजय क्रिश्चियन हैं और क्रिश्चियनिटी को प्रमोट करते हैं। लेकिन एक तीसरी बात जो भाजपा को उनकी ओर आकर्षित करती है,वह है उनका डीएमके विरोध। विजय एंटी डीएमके वोट के बड़े चुंबक बन सकते हैं। इसलिए भाजपा ने इस संभावना के द्वार बंद नहीं किए हैं कि वह तमिलनाडु विधानसभा चुनाव में विजय की पार्टी से गठबंधन नहीं कर सकती।

भाजपा इस समय तमिलनाडु की राजनीति में कोई कोना खाली नहीं छोड़ना चाहती। उसकी कोशिश है कि जहां भी पॉलिटिकल स्पेस बने उसको भर लो। एनडीए में अभी एआईएडीएमके,पीएमके और कुछ छोटी पार्टियां शामिल हैं। अमित शाह और भाजपा चाहते हैं कि डीएमके विरोधी जितनी राजनीतिक शक्तियां हैं,वे सब एक मंच पर आएं। शाह ने साफ-साफ कहा कि हम यह नहीं चाहते कि यह चुनाव पर्सनालिटीज का हो यानी एमके स्टालिन बनाम विजय हो जाए। हम चाहते हैं यह चुनाव एनडीए बनाम डीएमके हो। राज्य सरकार के खिलाफ जो एंटी इनकंबेंसी है,भाई भतीजावाद में जिस तरह से स्टालिन अपने बेटे को आगे बढ़ा रहे हैं और जिस तरह से उनका हिंदू विरोधी रुख है,उसका भाजपा पूरा फायदा उठाना चाहती है। उदयनिधि स्टालिन का वह बयान कौन भूलेगा कि सनातन धर्म संक्रामक बीमारी है। इसका समूल नाश कर देना चाहिए। डीएमके इस देश में अकेली ऐसी पार्टी है, जो इस तरह का बयान देकर पॉलिटिकली सर्वाइव करना चाहती है। देश में अलग-अलग राज्यों में जो मंदिर हैं, उनमें सबसे ज्यादा मंदिर तमिलनाडु में हैं। तमिलनाडु में हिंदू साम्राज्य का लंबा इतिहास है। आज भी तमिलनाडु की आबादी का अधिकांश हिंदू ही हैं। वहां क्रिश्चियन और मुसलमानों की संख्या बहुत कम है। फिर भी हिंदू विरोध पहले डीएमके के पूर्ववर्ती नेताओं ने शुरू किया। एथिस्ट बनने का नाटक किया फिर धीरे-धीरे हिंदू धर्म के विरोध में हो गए। क्रिश्चियनिटी और इस्लाम को गले लगा लिया। अब यह लड़ाई एक तरह से सांस्कृतिक लड़ाई बन गई है। जो लड़ाई पश्चिम बंगाल में लड़ी जा रही है,वही तमिलनाडु में लड़ी जा रही है। बस दोनों का स्वरूप अलग-अलग है।

अमित शाह और EPS की मुलाकात बता रही है कि तमिलनाडु में बीजेपी के पास कोई और  रास्ता नहीं है - amit shah and palaniswami delhi meet has almost tied bjp  aiadmk
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तमिलनाडु के अपने इस दौरे में अमित शाह एआईएडीएमके प्रमुख ई पलनिस्वामी से नहीं मिले। लेकिन यह एक संदेश देने के लिए था। पलनिस्वामी के रवैये से भाजपा नाराज है। भाजपा चाहती है कि एआईएडीएमके से निकले हुए या निकाले गए जो नेता हैं चाहे वह दिनकरण हों या ओ पनीरसेल्वम,इन सबको एक मंच पर लाना चाहिए ताकि डीएमके विरोधी सारी ताकतें एक हों। भाजपा एआईएडीएमके को यहां तक ऑफर दे रही है कि आप इनको सीट मत दीजिए। हम अपने कोटे से इनको सीट देंगे। लेकिन एआईएडीएमके इन नेताओं को पार्टी में लेने को तैयार नहीं है। तमिलनाडु में भाजपा का लक्ष्य ऐसी परिस्थिति पैदा करना है कि वहां जो भी सरकार बने,वह भाजपा के समर्थन के बिना न बन पाए। लोकसभा चुनाव में भाजपा को हालांकि एक भी सीट नहीं मिली लेकिन उसको 11% से ज्यादा वोट मिले। राज्य में भाजपा की स्वीकार्यता धीरे-धीरे बढ़ रही है। शाह ने भाजपा कोर ग्रुप के नेताओं से कहा कि उम्मीदवारों का चयन शुरू कर दीजिए। भाजपा मकर संक्रांति के बाद इस बारे में बड़ी तेजी से काम करना चाहती है। उन्होंने कहा कि एक बड़े विपक्षी गठबंधन का खाका तैयार कीजिए। उनका इशारा साफ है कि जितनी डीएमके विरोधी राजनीतिक शक्तियां हैं सबको एक मंच पर आना चाहिए। इस समय भाजपा को विजय के क्रिश्चियन प्रेम से भी कोई ऐतराज नहीं है। उसका एकमात्र लक्ष्य है डीएमके को सत्ता से बाहर करना। डीएमके को सत्ता से बाहर करने का मतलब है द्रविड़ राजनीति का जो वर्चस्व तमिलनाडु की राजनीति पर इतने दशकों से बना हुआ है उसको तोड़ना। तमिलनाडु में इस राजनीति को बदलने का मानस बन रहा है। सवाल है विकल्प का। विकल्प तभी बनेगा जब डीएमके विरोधी शक्तियां एकजुट होंगी और उसमें अन्ना द्रमुक की भूमिका प्रमुख नहीं होगी। तो उसके लिए दो पार्टियां हैं। एक विजय की पार्टी है। तमिलनाडु में विजय की लोकप्रियता तो बहुत है। वे तमिल फिल्मों के सुपरस्टार हैं, लेकिन जो फिल्मी प्रशंसक हैं,वे आपके कार्यकर्ता नहीं होते। विजय अभी तक अपनी पार्टी का कोई संगठन नहीं तैयार कर पाए। वह बार-बार अपने को सेकुलर बताने की कोशिश कर रहे हैं। सवाल यह है कि तमिलनाडु का मतदाता उनको किस रूप में देखता है? तो तमिलनाडु की राजनीति में आप मानकर चलिए अगले दो से तीन हफ्ते में बड़ा परिवर्तन हो सकता है।

शाह भाजपा को एआईएडीएमके विरोधी गठबंधन में केंद्रीय भूमिका में लाना चाहते हैं पार्टी ने तमिलनाडु का प्रभारी केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल को बनाया है। पीयूष गोयल तमिलनाडु में जमीनी नेताओं से फीडबैक ले रहे हैं। तो आपको इस बार तमिलनाडु के विधानसभा चुनाव में भाजपा की परफॉर्मेंस में एक लंबी छलांग लगती हुई दिखाई देगी। अब वह छलांग कहां तक जाएगी,यह अभी कहना मुश्किल है।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक और ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)