#pradepsinghप्रदीप सिंह।

कर्नाटक विधानसभा चुनाव के नतीजे आ गए हैं। आखिर वह कौन से ऐसे मुद्दे थे जो बीजेपी की इतनी बड़ी हार और कांग्रेस की इतनी प्रचंड जीत हुई। इसके पीछे क्या कारण थे, क्या मोदी का जादू नहीं चला, क्या मोदी के चुनाव प्रचार अभियान का कोई असर नहीं हुआ, क्या डबल इंजन की सरकार का नारा नहीं चला, क्या बीजेपी का लाभार्थी कार्ड जो देश भर में चलता है वह भी कर्नाटक में नहीं चला, ये तमाम सवाल आने वाले दिनों में उठाए जाएंगे। भाजपा के जितने विरोधी हैं उनकी जुबान पर ये सवाल है कि मोदी का जादू चलना बंद हो गया है। यह हार बीजेपी की नहीं मोदी की हार है। इसको बताने की कोशिश अगले 10-11 महीनों तक होगी और लगातार इसका ढिंढोरा पीटा जाएगा। उनको यह बोलने का हक है।

मुझे लगता है कि जिस तरीके से नतीजा आया है, खासतौर से प्रधानमंत्री ने इस पूरे चुनाव के दौरान कैंपेन को  अपने कंधे पर उठा रखा था उससे यह निष्कर्ष निकालना कि उनके कैंपेन का असर नहीं हुआ, उनके विरोधियों के लिए आसान है। दरअसल, बीजेपी की यही समस्या है। बहुत से राज्यों में बीजेपी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर जरूरत से ज्यादा निर्भर हो गई है। किसी भी राज्य में केंद्रीय नेतृत्व की भूमिका ऐड-ऑन की होती है। अगर आपके पास आधार है तो उसमें केंद्रीय नेतृत्व और जोड़ सकता है, उसको आगे ले जा सकता है। अगर अगर आपका आधार ही कम हो तो मुश्किल होता है। ऐसा लग रहा था कि कर्नाटक में ऐसा नहीं है। मगर अब जो बात समझ में आ रही है, बीजेपी की जो कमी समझ में आ रही है वह यह कि बसवराज बोम्मई को अपना नेतृत्व स्थापित करने और लोगों तक अपनी बात पहुंचाने का पूरा समय नहीं मिला। सरकार पर भ्रष्टाचार के  जो आरोप लगे उसने समस्या और बढ़ा दी। एंटी इन्कम्बेंसी निश्चित रूप से थी और उसका असर दिखाई दिया। यह बात मैं पहले से कह रहा था कि सरकार के खिलाफ नाराजगी है लेकिन सरकार के खिलाफ ऐसी नाराजगी नहीं थी कि लोग सरकार को उखाड़ फेंकना चाहते थे।

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लगातार एक ही गलती कर रही भाजपा

यह बात मैं इसलिए कह रहा हूं कि 2018 में बीजेपी को 36.2 फीसदी वोट मिले थे। इस चुनाव में 35.8 फीसदी वोट मिले हैं यानी पिछले चुनाव की तुलना में सिर्फ 0.4 फीसदी का अंतर आया है। जिस सरकार को लोग उखाड़ फेंकना चाहते हों उसके वोट में ज्यादा फर्क न आए यह हो नहीं सकता। जिस सरकार से बड़ी नाराजगी हो, मतदाता उसको हटाने पर तुले हों उसका वोट शेयर निश्चित रूप से बड़ी मात्रा में घटता है जो भारतीय जनता पार्टी के साथ कर्नाटक में नहीं हुआ। बीजेपी के विरोधियों को लग रहा है कि उनको 2024 के लिए मुद्दा मिल गया है कि बीजेपी को हराया जा सकता है, मोदी को हराया जा सकता है, अगर आपका कैंपेन स्थानीय मुद्दों पर आधारित हो और आप बीजेपी की पिच पर न खेलने जाएं, अगर आप ध्रुवीकरण कर सकें और काउंटर ध्रुवीकरण न हो। बीजेपी की गलती यही है कि उसने 2015 में बिहार विधानसभा चुनाव में जो किया वही गलती लगातार करती जा रही है वह यह कि दूसरे प्रदेश के नेताओं को चुनाव वाले राज्य में भेजना। इनमें से ज्यादातर लोग ऐसे होते हैं जो उस प्रदेश की भाषा नहीं जानते हैं, अगर उत्तर भारत में नहीं हैं तो। उत्तर भारत में ही बीजेपी का ज्यादा बड़ा जनाधार है इसलिए दक्षिण में, पश्चिम में वहीं से नेता भेजे जाते हैं।

नेताओं की जिम्मेदारी तय नहीं करती

बंगाल में यही हुआ, उसके अलावा दक्षिण के दूसरे राज्यों में यही हुआ। जो भाषा नहीं जानते हैं उन्हें चुनाव प्रबंधन का जिम्मा दे दिया जाता है। इनमें से ज्यादातर लोग स्थानीय नेताओं और कार्यकर्ताओं से अपना सामंजस्य नहीं बिठा पाते हैं। कुछ ऐसे होते हैं जो बिठाना ही नहीं चाहते हैं। उनके लिए यह ड्यूटी एक तरह से पेड हॉलिडे होती है। वह इसी रूप में जाते हैं, घूमते-फिरते और मजा करते हैं। उन पर कोई जिम्मेदारी नहीं होती है कि यह नतीजा आपको देना है। अगर यह नहीं आया तो आप इसके लिए जवाबदेह बनाए जाएंगे। जब पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष की ही कोई जवाबदेही न हो तो फिर नीचे के नेताओं और कार्यकर्ताओं की कैसे होगी। बीजेपी की यह समस्या कम होने की बजाय दिनोंदिन बढ़ती जा रही है। हिमाचल प्रदेश के चुनाव नतीजे के बाद अगर एक्शन लिया गया होता, अगर जिम्मेदारी तय की गई होती कि हार के लिए जिम्मेदार कौन है और उनको सजा दी गई होती और यह संदेश दिया गया होता है कि इसकी सजा भी दी जाती है तो शायद कर्नाटक में स्थिति इतनी खराब नहीं होती। बीजेपी अभी भी कर्नाटक की सामाजिक-राजनीतिक प्रकृति को पूरी तरह से समझ नहीं पाई है। कर्नाटक बिहार की तरह ही ऐसा राज्य है जहां धार्मिक मुद्दों पर जातिगत मुद्दे हावी रहते हैं। जाति वहां सबसे बड़ा निर्णायक फैक्टर है, जैसे बिहार में है उसी तरह से कर्नाटक में है।

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एंटी इन्कम्बेंसी मैनेजेबल थी

कर्नाटक में बीजेपी दो क्षेत्रों तटीय कर्नाटक और मुंबई कर्नाटक को छोड़कर बाकी क्षेत्रों में अपनी विचारधारा को लोगों तक ठीक से पहुंचा नहीं पाई है। अपनी विचारधारा से लोगों को उस तरह से जोड़ नहीं पाई है जैसे देश के दूसरे राज्यों में है। आप गुजरात की बात करें, मध्य प्रदेश, राजस्थान या उत्तर प्रदेश की बात करें, उस तरह से कर्नाटक में वह यह काम नहीं कर पाई है। वह निर्भर है एकमात्र नेता पर। एकमात्र नेता बीएस येद्दियुरप्पा थे जो रिटायर हो गए हैं। येद्दियुरप्पा के सीधे चुनावी मैदान में नहीं रहने पर क्या होता है यह 2013 में बीजेपी देख चुकी है। अब सवाल यह है कि इतने सारे फैक्टर खिलाफ होने के बावजूद बीजेपी का वोट शेयर 0.4 फीसदी ही कम क्यों हुआ। इसका मतलब यह है कि जो एंटी इन्कम्बेंसी थी वह मैनेजेबल थी। उसको मैनेज किया जा सकता था। उसको केंद्र सरकार की प्रो-इन्कम्बेंसी से मैनेज किया जा सकता था। उसको प्रधानमंत्री के कैंपेन से मैनेज किया जा सकता था जो नहीं हुआ। ऐसा क्यों नहीं हुआ इसका भी कारण है। आप  बीजेपी के चुनाव हारने के रहस्य को समझिए। अगर आप इसे समझ जाएंगे तो आगे आने वाले चुनाव में क्या हो सकता है यह भी आपको समझ में आ जाएगा। यह पहली बार नहीं हो रहा है। पश्चिम बंगाल में बड़े पैमाने पर देख चुके हैं और छोटे पैमाने पर अभी कर्नाटक में देखा है।

जेडीएस के मुस्लिम वोटों में कांग्रेस ने लगाई सेंध

इसका रहस्य समझना है तो आप समझिए कि बजरंगबली और बजरंग दल का मुद्दा चला या नहीं। यह सवाल हम सबके मन में है। बजरंग दल और बजरंगबली का मुद्दा चला और खूब चला लेकिन किस मायने में। जब कांग्रेस पार्टी ने अपने मेनिफेस्टो में बजरंग दल और पीएफआई की तुलना की और बजरंग दल पर प्रतिबंध लगाने की बात की तो बीजेपी ने और प्रधानमंत्री ने इस मुद्दे को जोर-शोर से उठाया। कांग्रेस बचाव की मुद्रा में आ गई। कांग्रेस ने तुरंत कहा कि हम ऐसा नहीं करने वाले हैं। राज्य सरकार ऐसा कर ही नहीं सकती। फिर कहा कि हम बजरंग दल पर प्रतिबंध लगाने की बात ही नहीं कर रहे। यह सब सफाई कांग्रेस देती रही लेकिन उसका असर क्या हुआ। बजरंग दल के खिलाफ प्रतिबंध लगाने की बात के पीछे कांग्रेस का इरादा सिर्फ इतना था कि मुस्लिम वोट का ध्रुवीकरण हो। कांग्रेस पार्टी चाहती थी कि जो मुस्लिम वोट जेडीएस को जाता है वह मुस्लिम वोट एकीकृत होकर कांग्रेस के साथ आ जाए। बीजेपी ने इस मुद्दे को जोर-शोर से इसलिए उठाया कि बीजेपी को लगा कि इस मुद्दे को जोर-शोर से उठाएंगे तो काउंटर ध्रुवीकरण होगा। इसका असर हिंदुओं पर पड़ेगा। अगर मुसलमान एकजुट होंगे और कांग्रेस के साथ जाएंगे तो हिंदू भाजपा के साथ एकजुट होगा। भाजपा की यही सबसे बड़ी गलती थी।

मुस्लिम मतों से कांग्रेस का वोट शेयर बढ़ा

कांग्रेस पार्टी वोट शेयर में बीजेपी से 7 फीसदी आगे निकल गई, कैसे? पिछले चुनाव में भी दो फीसदी आगे थी। इस चुनाव में उसको 5 फीसदी अतिरिक्त वोट मिले। यह वोट कहां से आए, उसको यह वोट आया जेडीएस से। जेडीएस का वोट 5 फीसदी घटा है और कांग्रेस का बढ़ा है। दो कारणों से बढ़ा है। पहला, मुस्लिमों के एकजुट होने से और दूसरा वोक्कालिंगा समुदाय का एक बड़ा तबका एचडी कुमारस्वामी से नाराजगी और निराशा के कारण इस उम्मीद में कांग्रेस के साथ आया कि शायद डीके शिवकुमार मुख्यमंत्री बनेंगे। यह जो 7 फीसदी का अंतर आया इसी ने पूरा चुनाव बदल दिया। मैंने ऊपर जो बात कही कि बीजेपी कर्नाटक की सामाजिक-राजनीतिक प्रकृति को समझ नहीं पाई है, उसकी वजह यही थी कि जब उसने फैसला किया इस मुद्दे को बड़ा मुद्दा बनाने की तब उसने सोचा नहीं कि हिंदू एकजुट नहीं होगा। कर्नाटक का हिंदू इस तरह से सोचता ही नहीं है। वही हुआ जैसे बंगाल में हुआ। मुसलमान एकजुट होकर ममता बनर्जी के साथ आए लेकिन हिंदू एकजुट नहीं हुआ। अगर हिंदुओं की थोड़ी भी एकजुटता भाजपा के पक्ष में होती तो नतीजे अलग हो सकते थे लेकिन ऐसा हुआ नहीं। हिंदुओं ने जाति के आधार पर वोट दिया और मुसलमानों ने अपने मजहब के आधार पर। नतीजा आपके सामने है। यह आखिरी चुनाव नहीं है जिसमें ऐसा हो रहा है। आगे आने वाले चुनाव में भी ऐसा हो सकता है और ऐसा होगा। जैसे ही हिंदुओं के खिलाफ, हिंदू संगठनों के खिलाफ बात होगी मुस्लिम वोट कंसोलिडेट होगा। उसके जवाब में काउंटर पोलराइजेशन कराने की ताकत कर्नाटक भाजपा के नेताओं में नहीं थी। इसलिए वह करा नहीं पाए और उसका नतीजा यह हुआ कि बीजेपी अपना वोट बढ़ा नहीं पाई। उसे 2018 में जो मिला था वही वोट शेयर 2023 में भी रहा।

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कांग्रेस ने उठाया बजरंग दल के मुद्दे का फायदा

वहीं कांग्रेस पार्टी का वोट केवल एक मुद्दे की वजह से बढ़ा। इसलिए बजरंग दल और बजरंगबली का मुद्दा तो चला लेकिन कांग्रेस के पक्ष में चला। उसका फायदा कांग्रेस ने उठाया। कांग्रेस बचाव की मुद्रा में आई तो इससे भाजपा और खुश हो गई कि उसके पक्ष में यह मुद्दा जा रहा है लेकिन इसका उल्टा असर हुआ। बीजेपी ने इस बात पर ध्यान ही नहीं दिया कि वह पिछले दो साल से टीपू सुल्तान, हिजाब का मुद्दा और तमाम दूसरे मुद्दे उठा रही थी जिनका कोई असर नहीं हो रहा था, बल्कि बीजेपी ने खुद ही उन मुद्दों को छोड़ दिया। चुनाव के दौरान उसके नेता बोलते रहे कि ये मुद्दे हैं ही नहीं। इसके बावजूद बजरंग दल के मुद्दे को इतना ताना कि उसका असर यह निकला कि कांग्रेस के पक्ष में मुस्लिम मतदाता एकजुट हो गया और भारतीय जनता पार्टी की यह दुर्दशा हुई। भारतीय जनता पार्टी के लिए कर्नाटक में हताश होने की नहीं बल्कि चिंता करने की जरूरत है कि कैसे रणनीति में बदलाव किया जाए। उसका जनाधार खत्म नहीं हुआ है, घटा भी नहीं है। उसका जनाधार जस का तस है। अब सवाल यह है कि उसको कैसे बढ़ाना है आगे के चुनाव के लिए, इस पर विचार करना पड़ेगा। एक बात बड़ी स्पष्ट है जो इस चुनाव के दौरान भी बड़ा स्पष्ट था कि लोग विधानसभा चुनाव और लोकसभा चुनाव के बारे में अलग-अलग तरह से सोचते हैं। जिस तरह से विधानसभा चुनाव में वोट करते हैं वैसे लोकसभा चुनाव में नहीं करते।

बीजेपी को अपने सामाजिक समीकरणों को दुरुस्त करना पड़ेगा। मुसलमानों का 4 फीसदी रिजर्वेशन चुनाव अधिसूचना जारी होने से 48 घंटे पहले हटाया जिसका कोई असर नहीं हुआ। इसे हटाकर जिनको दिया उनको मिला नहीं, जिनसे छीना उनका गया नहीं। उसका नतीजा यह हुआ कि बीजेपी को कोई फायदा नहीं हुआ बल्कि नुकसान हो गया। बीजेपी ने रणनीति के लिहाज से और राज्य के सामाजिक-राजनीतिक समीकरण को समझने के लिहाज से दो बड़ी गलती की जिसका खामियाजा उसे भुगतना पड़ा।

(लेखक राजनीतिक विश्लेषक और ‘आपका अखबार’ न्यूज पोर्टल एवं यूट्यूब चैनल के संपादक हैं)