त्याग, तपस्या और धैर्य से हासिल किया लक्ष्य।

#pradepsinghप्रदीप सिंह।

त्याग,तपस्या,धैर्य। ये तीन शब्द राजनीति में अनजान से लगते हैं, लेकिन जिन पार्टियों का लक्ष्य दूरगामी होता है,वे इन तीन शब्दों या कहें सिद्धांतों को छोड़ती नहीं। भाजपा ने बिहार में इसका उदाहरण पेश किया है।

नीतीश कुमार की जेडीयू के साथ संबंधों को निभाने के लिए भाजपा ने क्या-क्या नहीं किया। घोर अपमान सहा, ब्लैकमेल हुई, राज्य में अपने ही नेताओं का कद छोटा किया और अपने ही सबसे लोकप्रिय नेता को बिहार में चुनाव प्रचार नहीं करने दिया। बिहार में भाजपा और नीतीश कुमार की पार्टी के चुनावी गठबंधन की शुरुआत 2000 में हुई। उस समय भाजपा बड़ी और नीतीश की पार्टी छोटी थी। फिर भी बीजेपी ने नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया। देखने में तो लगता है कि यह बहुत ही बेवकूफी का कदम था, लेकिन इसके पीछे भाजपा की लॉन्ग टर्म प्लानिंग थी। बिहार देश का सबसे बड़ा समाजवादी मानसिकता वाला प्रदेश है और भाजपा का हिंदुत्व का कार्ड यहां आसानी से चलने वाला नहीं था। यह उसने अयोध्या आंदोलन के दौरान भी देख लिया था। ऐसे में उसे एक कंधे की जरूरत थी, जिस पर बंदूक रखकर वह अपने लक्ष्य पर निशाना साध सके। उसके लिए उसने नीतीश कुमार को चुना। नीतीश कुमार ने इसका खूब फायदा उठाया। चुनावी गठबंधन में भाजपा ने दो बार त्याग किया और ज्यादा सीटें होते हुए भी नीतीश को मुख्यमंत्री बनाया। 2020 में तो भाजपा की सीटें जेडीयू से कहीं ज्यादा थीं,वह चाहती तो आराम से अपना मुख्यमंत्री बना लेती लेकिन वह तात्कालिक लाभ होता। उसने ऐसा किया होता तो इस समय विपक्ष में बैठी होती और आज उसका मुख्यमंत्री नहीं बन पाता।

जेडीयू से चुनावी गठबंधन में भाजपा को कई बार अपमान का घूंट भी पीना पड़ा। एक बार भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक पटना में हो रही थी। नीतीश कुमार मुख्यमंत्री थे। उन्होंने रात्रि भोज पर भाजपा की पूरी कार्यकारिणी को इनवाइट किया। उस समय पटना में नरेंद्र मोदी भी मौजूद थे। वह तब गुजरात के मुख्यमंत्री थे। उसी दिन सुबह पटना के अखबारों में एक विज्ञापन छपा। गुजरात सरकार ने बाढ़ राहत में एक करोड़ रुपये दिए थे। उससे नीतीश कुमार को इतना बुरा लगा कि उन्होंने रात्रि भोज का निमंत्रण रद्द कर दिया। भाजपा के लोगों को समझ में नहीं आया कि यह हुआ क्या? इस मुद्दे पर गठबंधन टूट सकता था, लेकिन भाजपा ने नहीं तोड़ा। नीतीश ने भाजपा को यह भी स्पष्ट कर दिया था कि नरेंद्र मोदी बिहार में भाजपा उम्मीदवारों के लिए चुनाव प्रचार के लिए नहीं आएंगे। वह भी भाजपा ने मान लिया। कौन सी पार्टी ऐसा कर सकती है? उस समय देखने में लगता था कि यह सरेंडर है। लेकिन जो चतुर शिकारी होता है, वह धैर्य का साथ नहीं छोड़ता है। भाजपा ने ऐसा ही किया। अपमान बर्दाश्त किया और दो-दो बार नीतीश कुमार का धोखा भी सहा। 2013 में जब नरेंद्र मोदी को भाजपा ने प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाया तब नीतीश ने गठबंधन तोड़ दिया। यह भाजपा का अंदरूनी मामला था। इससे नीतीश का क्या मतलब फिर भी उन्होंने ऐसा किया।

इसका नतीजा यह हुआ कि 2014 के लोकसभा चुनाव में नीतीश अकेले लड़े और उनकी पार्टी की सिर्फ दो सीटें आईं और भाजपा ने अपने गठबंधन के साथियों के साथ 40 में से 31 सीटें जीतीं। इसके बाद तो कायदे से बीजेपी को नीतीश कुमार से संबंध तोड़ ही देने चाहिए थे, लेकिन बीजेपी ने ऐसा नहीं किया। 2015 के विधानसभा चुनाव में नीतीश कुमार ने आरजेडी के साथ महागठबंधन बनाया। उनकी सरकार बन गई, लेकिन उसके बाद उनको आटे दाल का भाव मालूम हो गया कि बीजेपी में उनको किस तरह से ट्रीट किया जाता था और आरजेडी के साथ उनकी हालत क्या हो गई थी। लालू प्रसाद यादव को तो छोड़िए तेजस्वी यादव तक उनको भाव नहीं देते थे। अपमानित होकर बाहर निकले और फिर बीजेपी के साथ आ गए। फिर बीजेपी ने अपना लिया। 2020 में छोटी पार्टी बन गए। फिर भी बीजेपी ने मुख्यमंत्री बनाया तब भी 2021 में गठबंधन तोड़कर निकल गए। फिर लौटे फिर बीजेपी ने अपना लिया। क्योंकि बीजेपी लंबा खेल खेल रही थी। नीतीश कुमार की तरह केवल मुख्यमंत्री का पद उसे नहीं दिख रहा था। उसे पूरे बिहार बल्कि कहें पूरे पूरब की राजनीति दिख रही थी। तो एक अच्छे शिकारी की तरह समय का इंतजार करती रही। नीतीश कुमार के कमजोर होने का इंतजार किया और जब लगा कि शिकार बिल्कुल निशाने की जद में आ गया है तब तीर चलाया।

जब यह स्थिति आई कि खराब स्वास्थ्य के कारण नीतीश को हटना पड़ सकता है तो उनके सामने यह प्रस्ताव रखा गया कि जेडीयू के अस्तित्व को बचाना है तो आपको अपने बेटे को लाना पड़ेगा। अब देखिए यह किस तरह की रणनीति थी। नीतीश कुमार की दो-तीन सबसे बड़ी खूबियां थीं। एक उनकी प्रशासनिक क्षमता जिसके कारण उन्हें सुशासन बाबू का तमगा मिला। दूसरा उनकी ईमानदारी और तीसरा वह वंशवादी राजनीति से जीवन भर परहेज करते रहे और ऐसा करने वालों पर आक्रमण करते रहे। तो खराब सेहत के कारण उनके सुशासन का मामला पहले ही ढीला हो रहा था और अब बेटे को राजनीति में लाने के लिए उन्हें मनाकर वंशवादी राजनीति से उनकी दूरी को एक झटके में खत्म कर दिया। मैं मानता हूं कि यह बीजेपी का मास्टर स्ट्रोक था क्योंकि नीतीश कुमार बहुत ही घाघ राजनीतिज्ञ हैं उनसे निपटना बीजेपी के लिए बहुत कठिन था। लेकिन उनके बेटे निशांत कुमार से निपटना बीजेपी के लिए आसान होगा। दूसरी बात बीजेपी ने कभी यह संकेत नहीं दिया कि वह नीतीश कुमार का अपमान करना चाहती है। नीतीश जो मांग करते थे,भाजपा सब पूरी करती रही। उनको भाजपा से नाराज होने का कोई बहाना नहीं दिया। हालांकि फिर भी वह दो-दो बार छोड़कर गए। दूसरी बार जब वह लौट कर आए तब से बीजेपी ने तय कर लिया था कि अब दूरगामी रणनीति पर काम करने का समय आ गया है। 2025 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने आखिरी मौके पर घोषणा कर दी कि चुनाव नीतीश कुमार के नेतृत्व में लड़ा जाएगा। गठबंधन प्रचंड बहुमत से जीत गया। नीतीश कुमार को फिर से मुख्यमंत्री बना दिया गया। उसके बाद बीजेपी ने अपना काम करना शुरू किया और नीतीश कुमार को ऐसी जगह पर पहुंचा दिया जब उनके पास कोई विकल्प नहीं रह गया। बेटे को राजनीति में लाने के लिए तैयार हो गए तो एक सिद्धांत से समझौता कर लिया। राज्यसभा में जाने को तैयार हो गए तो सत्ता की लालसा खत्म नहीं हुई है, यह संदेश चला गया। इससे नीतीश कुमार का कद थोड़ा कम होता है और त्याग, तपस्या व धैर्य का भाजपा का पक्ष मजबूत होता है।

आरजेडी के साथ जाने का डर दिखाकर नीतीश हमेशा भाजपा को ब्लैकमेल करते रहे और भाजपा ब्लैकमेल होती रही। इसे आप भाजपा की कमजोरी मान सकते हैं। लेकिन कमजोरी या रणनीति यह अंतिम परिणाम से तय होती है और अंतिम परिणाम यह हुआ कि राज्य में पहली बार भाजपा का मुख्यमंत्री बनने जा रहा है। नीतीश कुमार को छोड़े बिना और नीतीश कुमार को हटाए बिना उसका सपना पूरा होने जा रहा है। इस पूरे राजनीतिक घटनाक्रम में बीजेपी ने एक बात और इंश्योर की है। उसने जेडीयू और आरजेडी के फिर से मिलने की संभावनाएं खत्म कर दी हैं। आरजेडी से समझौता करने की ताकत केवल नीतीश कुमार में थी। निशांत कुमार में नहीं होगी। अभी की परिस्थितियों में कहा जा सकता है निशांत कुमार पहले अपने पैर जमाने की कोशिश करेंगे। ऐसे में उनको सबसे ज्यादा जरूरत बीजेपी की होगी। उनको मालूम है कि उनकी राजनीति और उनकी पार्टी का सर्वाइवल बीजेपी के साथ पर निर्भर है। तो जो बीजेपी नीतीश कुमार पर निर्भर थी उसे अब बीजेपी ने ठीक उल्टा कर दिया। तपस्या, धैर्य और त्याग से बीजेपी ने बिहार में बहुत कुछ हासिल किया। भाजपा के लिए आरजेडी से लड़ना शायद ज्यादा मुश्किल होता। तो नीतीश कुमार को साथ लेकर आरजेडी को खत्म किया। दूसरा, बिहार में अपना मुख्यमंत्री का लक्ष्य हासिल कर लिया। तीसरा,यह सब लक्ष्य हासिल करते हुए जेडीयू और नीतीश कुमार को नाराज नहीं किया। और चौथी सफलता आरजेडी-जेडीयू के गठबंधन की संभावना को खत्म कर दिया। यह सब तात्कालिक लाभ उठाने की नीति पर चलने वाले राजनीतिक दल या नेता नहीं हासिल कर सकते। यह भाजपा जैसी पार्टी ही हासिल कर सकती है, जो लॉन्ग गेम खेलने के लिए तैयार हो। इसी तरह का काम बीजेपी ने उड़ीसा में भी किया था। तो उड़ीसा और बिहार के बाद अब पूरब के तीसरे राज्य पश्चिम बंगाल की बारी है। बिहार में भाजपा ने जिस तरह का खेल खेला, मुझे लगता है कि यह राजनीति शास्त्र में पढ़ाया जाना चाहिए। उसने दिखाया कि धैर्य,त्याग और तपस्या से आप राजनीति में अपना दूरगामी लक्ष्य हासिल कर सकते हैं।

(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)।