केरल के निकाय चुनावों में दिखाया दम,लेफ्ट का 45 साल का दबदबा खत्म किया।

प्रदीप सिंह।
भारतीय जनता पार्टी सार्वदेशिक पार्टी,जिसका पूरे देश में वर्चस्व हो,बनने की ओर तेजी से बढ़ रही है। भाजपा उत्तर और पश्चिमी भारत में पहले ही काफी मजबूत है। पूर्वी भारत में केवल एक किला पश्चिम बंगाल रह गया है। जिस दिन वह ढहा,पूरा पूर्वी भारत भी उसके कब्जे में होगा। अब दक्षिण भारत की बारी है। लेकिन दक्षिण में परिवर्तन की शुरुआत इतनी जल्दी हो जाएगी इसकी उम्मीद बहुत कम थी। दक्षिण भारत के राज्यों में कर्नाटक में भाजपा सत्ता में रह चुकी है। अभी मुख्य विपक्षी दल है। अगले चुनाव में उसके सत्ता में आने की बड़ी प्रबल संभावना है। 2024 में हुए लोकसभा चुनाव में उसे तेलंगाना में भी 16 में से आठ सीटें मिली हैं। हालांकि उससे पहले हुए विधानसभा चुनाव में पार्टी ने अपने लोकप्रिय प्रदेश अध्यक्ष बंडी संजय कुमार को पद से हटाकर खुद ही अपने पैर पर कुल्हाड़ी मार ली थी। अब भाजपा ने दक्षिण के एक और राज्य केरल में चमत्कार किया है।

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केरल की राजधानी तिरुवनंतपुरम के म्युनिसिपल कॉरपोरेशन पर लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट का 45 साल से कब्जा था। राज्य की सत्ता में आने के बाद भी कांग्रेस पार्टी वहां से लेफ्ट को हटा नहीं पाई। लेकिन भाजपा ने 9 से 11 दिसंबर के बीच हुए स्थानीय निकाय के चुनाव में तिरुवनंतपुरम के 101 वार्डों में से 50 पर जीत हासिल कर इतिहास रच दिया है। राज्य में सत्तारूढ़ लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट वहां सिर्फ 29 सीटों पर सिमट गया जबकि कांग्रेस पार्टी को 19 सीटे मिली हैं। भाजपा की यह सफलता इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि वह राज्य में कोई बड़ी राजनीतिक शक्ति नहीं रही और उसके पास केरल से केवल एक लोकसभा सीट है।

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केरल में लंबे समय से सत्ता की लड़ाई दो गठबंधनों माकपा के नेतृत्व वाले एलडीएफ और कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूडीएफ के बीच ही होती रही है। इस समय एलडीएफ के पिनराई विजयन मुख्यमंत्री हैं। उनके खिलाफ एंटी इनकंबेंसी बहुत ज्यादा है। अमूमन एंटी इनकंबेंसी का फायदा नंबर दो की पार्टी को होता है, जो कांग्रेस के नेतृत्व वाला गठबंधन है। राज्य में भाजपा नंबर तीन की पार्टी है और नंबर तीन में भी बहुत नीचे की पार्टी है। इसके बावजूद उसने वह काम करके दिखाया जो नंबर दो का गठबंधन नहीं कर पाया। भाजपा ने इसके अलावा तिरुपनीतुरा म्युनिसिपल कॉरपोरेशन पर भी अपना कब्जा बरकरार रखा है। तो केरल के शहरी क्षेत्रों में भाजपा का जनाधार काफी बढ़ा है और वह सीपीएम को चुनौती देती दिख रही है। राज्य में कुछ ऐसी भी जगह हैं, जहां पर सीपीएम का कैंडिडेट तीसरे नंबर पर चला गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भाजपा की इस सफलता को ऐतिहासिक बताया है। 2026 के मार्च-अप्रैल में केरल में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। भाजपा वहां बहुत तेजी से तीसरे राजनीतिक ध्रुव के रूप में उभर रही है। एंटी इनकंबेंसी का जादू चला तो संभव है कि सीपीएम तीसरे नंबर पर चली जाए और लड़ाई मुख्य रूप से भाजपा और कांग्रेस के बीच में हो जाए। सवाल यह है कि क्या भाजपा अगले साल-सवा साल में अपना जनाधार इतना बढ़ा पाएगी? अगर यह लड़ाई कांग्रेस और बीजेपी के बीच हो गई तो आप समझ सकते हैं कि इस चुनाव में नहीं तो अगले चुनाव तक केरल में भाजपा की सरकार बन सकती है क्योंकि जहां भी सीधी लड़ाई भाजपा और कांग्रेस की होती है वहां कांग्रेस के हारने की प्रबल संभावना रहती है। कांग्रेस के खिलाफ भाजपा का स्ट्राइक रेट लगभग 90% है।

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दक्षिण के एक और राज्य तमिलनाडु में भी 2026 में चुनाव होने हैं। मुझे लगता है कि केरल के स्थानीय निकाय चुनाव के नतीजों से डीएमके नेता और तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन को भी झटका लगा होगा। उनकी सरकार की नीतियों के कारण तमिलनाडु में माहौल हिंदू बनाम मुस्लिम बन गया है। यह भाजपा के लिए उनका सबसे बड़ा उपहार है। दीपथून मामले में जिस तरह से उनकी सरकार ने सैकड़ों साल से चली आ रही परंपरा को रोकने की कोशिश की और कहा कि हिंदुओं को दीपक नहीं जलाने देंगे। उससे काफी  रोष है। उनकी सरकार का कहना था कि पास में एक मकबरा है,दीपक जलाने से मुस्लिमों की भावनाएं आहत होंगी। यह मामला मद्रास हाईकोर्ट में गया तो सिंगल जज बेंच ने मौके का मुआयना किया। इसके बाद बेंच ने फैसला दिया कि हिंदू पक्ष को दीपथून की परंपरा को निभाने का अधिकार है। इस पर सरकार हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच के पास चली गई। डिवीजन बेंच ने भी सिंगल बेंच के फैसले को बरकरार रखा और कहा कि सरकार दीपथून की इजाजत और सुरक्षा दे, लेकिन सरकार ने ठीक उल्टा किया। सरकार ने बैरिकेड खड़े किए और दीपथून की परंपरा का निर्वाह नहीं होने दिया। जबकि दूसरा मुस्लिम पक्ष कह रहा है कि हमको कोई समस्या नहीं है। लेकिन एमके स्टालिन को समस्या है। जब देखा कि कोर्ट में भी हार रहे हैं तो उन्होंने विपक्षी दलों के सांसदों को जुटाया और 107 सांसदों ने लोकसभा अध्यक्ष के यहां मद्रास हाईकोर्ट के जज के खिलाफ महाभियोग का प्रस्ताव दिया। यह जुडिशरी को डराने और राजनीतिक हथियार से दबाने की कोशिश थी। इसके कारण पूरे तमिलनाडु में सरगर्मी है। संघ प्रमुख मोहन भागवत ने कहा है कि तमिलनाडु में हिंदुओं की संख्या के बल पर इसका निर्णय हो जाएगा। यानी बीजेपी और आरएसएस इस मुद्दे पर पीछे हटने को तैयार नहीं है। अब यह मुद्दा पूरी तरह से राजनीतिक बन चुका है। एमके स्टालिन के लिए तमिल फिल्मों के सुपरस्टार विजय और उनकी पार्टी टीवीके ने भी मुश्किल पैदा कर दी हैं। स्टालिन को डर है कि चुनाव में उनके माइनॉरिटी वोट का एक हिस्सा विजय ले जा सकते हैं। राज्य में ईसाइयों और मुसलमानों की लगभग 14% आबादी है। इसी घबराहट में वह कोर्ट को धमकाने की कोशिश कर रहे हैं। ऐसा पहली बार हो रहा है कि फैसला आपके पक्ष में नहीं आया तो उस जज के खिलाफ इंपीचमेंट मोशन ला रहे हैं। दीपथून का मामला अब मामला सुप्रीम कोर्ट में गया है। देखिए वहां से क्या फैसला आता है। एम के स्टालिन का बेटा उदयनिधि तो सनातन धर्म को समूल नष्ट करने का बयान पहले ही देता रहा है। तो हिंदुओं के समर्थन की हवा अब तमिलनाडु में भी चलने लगी है। राज्य में काफी समय से हिंदू विरोधी मानसिकता को बदलने का प्रयास चल रहा था। काशी तमिल संगमम उसी का प्रयास था। उसके अलावा पिछले कुछ सालों में प्रधानमंत्री ने तमिल संस्कृति,तमिल भाषा,तमिलनाडु के विकास के लिए जिस तरह से काम किया है और योजनाएं बनाई हैं,उससे तमिलनाडु की राजनीति बदल सकती है। केरल के स्थानीय निकाय के चुनाव के नतीजों ने दिखाया है कि मतदाताओं का रुख बदल रहा है। तो यह हवा केवल केरल तक नहीं रुकने वाली है। यह हवा तमिलनाडु पहुंचते-पहुंचते अगर 2026 में आंधी बन जाए तो कोई आश्चर्य नहीं होगा। खतरा केवल पिनराई विजय के लिए नहीं है। यह खतरा एमके स्टालिन के लिए भी है और यह भाजपा के बढ़ने एवं उसके भौगोलिक और सामाजिक विस्तार का प्रमाण है। यह संदेश है कि दक्षिण भारत भाजपा को और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व को स्वीकार करने के लिए तैयार है।

2026 में भाजपा की असली निगाह तीन राज्यों पश्चिम बंगाल,केरल और तमिलनाडु पर होगी। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह बार-बार बोल रहे हैं कि पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में भाजपा की सरकार बनेगी। हालांकि राजनीतिक नेता अपनी-अपनी पार्टी के पक्ष में इस तरह के बयान देते हैं, लेकिन उनको बोलते हुए अगर आप सुनेंगे और उसकी तुलना 2021 से करेंगे तो उनके जो आत्मविश्वास का स्तर है,उसमें बहुत अंतर दिखाई देगा। अब उनका जो आत्मविश्वास है, उस पर पार्टी कितना खरा उतरेगी यह तो पता नहीं, लेकिन इन तीनों राज्यों में पार्टी की स्थिति पहले से बेहतर होगी, इसमें कोई शक नहीं है।

(लेखक राजनीतिक विश्लेषक और ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)