सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ठेकेदार या तीसरे पक्ष की एजेंसियों के जरिए नियुक्त किए गए कर्मचारी नियमित सरकारी कर्मचारियों के समान सेवा लाभ और दर्जे का दावा नहीं कर सकते। लाइव लॉ की रिपोर्ट में अनुसार, अदालत ने कहा कि यदि ऐसे कर्मचारियों को नियमित कर्मियों के बराबर माना गया तो इससे सार्वजनिक नियुक्ति की पारदर्शी और निष्पक्ष प्रक्रिया की बुनियाद ही कमजोर हो जाएगी।

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जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की खंडपीठ ने कहा कि राज्य संस्थाओं में नियमित नियुक्ति एक सार्वजनिक संपत्ति के समान है, जिसे ठेकेदारों के जरिए की गई संविदात्मक नियुक्तियों के बराबर नहीं ठहराया जा सकता।

कोर्ट ने टिप्पणी की, “यदि ठेकेदार के माध्यम से काम पर लगाए गए व्यक्तियों को नियमित कर्मचारियों के समान दर्जा और लाभ दिए जाते हैं तो यह एक ऐसी प्रक्रिया को मान्यता देना होगा, जो पूरी तरह मनमानी है। ठेकेदार द्वारा किसे और कैसे नियुक्त किया जाएगा, इसके लिए कानून में कोई निर्धारित प्रक्रिया नहीं है, सिवाय न्यूनतम योग्यता के।”

मामले की पृष्ठभूमि: यह मामला आंध्र प्रदेश के कर्नूल जिले की नंद्याल नगर परिषद से जुड़ा है, जहां वर्ष 1994 से सफाईकर्मियों समेत कई श्रमिक अलग-अलग ठेकेदारों के माध्यम से नियुक्त किए गए। वर्षों के दौरान ठेकेदार बदलते रहे लेकिन वही कर्मचारी लगभग तीन दशकों तक नगर परिषद के लिए कार्य करते रहे।

इन कर्मचारियों ने यह कहते हुए आंध्र प्रदेश प्रशासनिक न्यायाधिकरण का रुख किया कि वे नियमित नगर कर्मचारियों जैसा ही काम कर रहे हैं, लेकिन उन्हें कम वेतन दिया जा रहा है। उन्होंने नियमितीकरण और समान वेतन की मांग की। हालांकि न्यायाधिकरण ने उनकी याचिका खारिज कर दी थी। बाद में वर्ष 2018 में आंध्र प्रदेश हाइकोर्ट ने कर्मचारियों के पक्ष में फैसला सुनाते हुए नगर परिषद को निर्देश दिया कि उन्हें नियमित पदों के न्यूनतम वेतनमान और वार्षिक वेतनवृद्धि का लाभ दिया जाए।

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सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई: नगर परिषद ने हाइकोर्ट के आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। परिषद की ओर से दलील दी गई कि इन श्रमिकों और नगर परिषद के बीच कोई प्रत्यक्ष नियोक्ता-कर्मचारी संबंध नहीं है, क्योंकि वे ठेकेदारों के माध्यम से नियुक्त किए गए। इस आधार पर परिषद समान वेतन देने के लिए बाध्य नहीं है। वहीं कर्मचारियों की ओर से दलील दी गई कि यदि संविदात्मक कर्मचारी नियमित कर्मचारियों के समान काम करते हैं तो उन्हें भी समान लाभ मिलना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट ने नगर परिषद की दलीलों को स्वीकार करते हुए हाइकोर्ट का आदेश रद्द कर दिया। अदालत ने कहा कि ठेकेदार के माध्यम से नियुक्त कर्मचारियों और नियमित कर्मचारियों के बीच कानूनी तौर पर स्पष्ट और वैध अंतर है। कोर्ट ने कहा, “नियमित नियुक्तियों में पारदर्शी प्रक्रिया अपनाई जाती है, जिससे सभी पात्र नागरिकों को समान अवसर मिल सके और किसी प्रकार के पक्षपात से बचा जा सके। जबकि ठेकेदार के माध्यम से नियुक्ति पूरी तरह ठेकेदार के विवेक पर निर्भर होती है। यही दोनों के बीच मूलभूत अंतर है।”

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि इस मामले में जगजीत सिंह के फैसले को लागू नहीं किया जा सकता, क्योंकि उस प्रकरण में कर्मचारी सीधे सरकार द्वारा संविदा पर नियुक्त किए गए, जबकि वर्तमान मामले में नियुक्ति एक मध्यस्थ ठेकेदार के जरिए हुई।

मानवीय आधार पर सीमित राहत: हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए भी एक मानवीय पहलू पर विचार किया। अदालत ने नगर परिषद को निर्देश दिया कि वह यह जांच करे कि जिन पदों पर ये कर्मचारी दशकों से बिना किसी बाधा के काम कर रहे हैं, क्या उन्हें नियमित किया जा सकता है, क्योंकि ये कार्य स्थायी प्रकृति के प्रतीत होते हैं। साथ ही कोर्ट ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि यह निर्देश केवल इस विशेष मामले तक सीमित है। इसे भविष्य में किसी अन्य मामले के लिए मिसाल के रूप में नहीं माना जाएगा।