आईजीएनसीए के कला निधि प्रभाग का  37वां स्थापना दिवस संपन्न।

आपका अखबार ब्यूरो।
इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र (आईजीएनसीए) के कला निधि प्रभाग ने केन्द्र के समवेत सभागार में अपने प्रतिष्ठा दिवस (स्थापना) के अवसर पर एक गरिमामय शैक्षणिक एवं सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन किया।

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि थे ‘प्रज्ञा प्रवाह’ के राष्ट्रीय संगठन सचिव श्री जे. नंदकुमार थे। विशेष अतिथि के रूप में दिल्ली प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय (डीटीयू) के कुलपति प्रो. प्रतीक शर्मा तथा सम्माननीय अतिथि के रूप में आयुष मंत्रालय, भारत सरकार के सचिव वैद्य राजेश कोटेचा उपस्थित रहे। कार्यक्रम की अध्यक्षता आईजीएनसीए के अध्यक्ष श्री राम बहादुर राय ने की। आईजीएनसीए के सदस्य सचिव डॉ. सच्चिदानंद जोशी ने उद्घाटन भाषण दिया, जबकि कलानिधि प्रभाग के निदेशक एवं प्रमुख तथा आईजीएनसीए के डीन प्रो. (डॉ.) रमेश चंद्र गौड़ ने स्वागत वक्तव्य प्रस्तुत किया। इस अवसर पर जेएनयू की एसोसिएट प्रोफेसर एवं एन्थ्रोपोस फाउंडेशन की अध्यक्ष डॉ. सुनीता रेड्डी भी उपस्थित रहीं।

कलानिधि प्रतिष्ठा दिवस समारोह के अंतर्गत आईजीएनसीए द्वारा कई महत्वपूर्ण प्रकाशनों का लोकार्पण किया गया, जिनमें ‘ग्रीन विज़डम : मणिपुर’, ‘रूट्स ऑफ विज़डम : सिक्किम’ तथा ‘व्हिस्पर्स ऑफ़ द फ़ॉरेस्ट : अरुणाचल प्रदेश’ शामिल हैं, जिनके लेखक डॉ. सुनीता रेड्डी, प्रो. (डॉ.) रमेश चंद्र गौड़ सहित अन्य विद्वान हैं। इसके साथ ही, प्रो. (डॉ.) रमेश चंद्र गौड़ एवं उनकी टीम द्वारा सम्पादित डिजिटाइज़्ड पांडुलिपियों का सचित्र सूची-पत्र, खंड 8 से 13 (भाग 1–12) तथा आईजीएनसीए के अर्धवार्षिक जर्नल ‘कलाकल्प’ के वसंत पंचमी अंक, 2026 का भी विमोचन किया गया। इस अवसर पर “क्राउनिंग ज्वेल्स: द इलस्ट्रेटेड रेयर बुक्स” प्रदर्शनी का उद्घाटन भी किया गया। कार्यक्रम का समापन वसंत उत्सव पर आधारित सांस्कृतिक प्रस्तुति के साथ हुआ, जो आईजीएनसीए के शोध और जीवंत परम्पराओं के समन्वित दृष्टिकोण को दर्शाता है।

मुख्य अतिथि श्री जे. नंदकुमार ने कलानिधि प्रभाग के प्रतिष्ठा दिवस पर आईजीएनसीए को बधाई देते हुए कहा कि कला निधि प्रभाग लंबे समय से संस्थान की बौद्धिक रीढ़ रहा है, जो भारत की सभ्यतागत ज्ञान परम्परा का संरक्षण, व्याख्या और प्रसार करता आ रहा है। उन्होंने कहा कि आईजीएनसीए देश के विद्वानों और साधकों के संवाद का केंद्र है। दस्तावेज़ीकरण और शोध से परे, यह शोधकर्ताओं, विचारकों और पेशेवरों द्वारा और उनके लिए बनाए गए एक जीवंत विद्वत् इकोसिस्टम को पोषित करता है, जबकि आईजीएनसीए खुद देश के विद्वानों और पेशेवरों के लिए एक चर्चा मंच के रूप में काम करता है। केंद्र का कार्य भारत-केंद्रित राष्ट्रीय शिक्षा नीति की भावना के अनुरूप है, जिसके तहत भारत की बौद्धिक धुरी को पुनः भारत की ओर स्थापित करने की आवश्यकता है। पांडुलिपियों, सांस्कृतिक धरोहरों और मौखिक परंपराओं – जिनमें असम, मेघालय और नागालैंड की पारम्परिक औषधीय पद्धतियां भी शामिल हैं – का संरक्षण और उपलब्धता सुनिश्चित की जा रही है। उत्तर-पूर्व की पारम्परिक चिकित्सा पद्धतियों पर हाल में प्रकाशित तीन खंड इस बात का उदाहरण हैं कि समुदायों के सम्मान के साथ किया गया ज्ञान-लेखन भावी पीढ़ियों को प्रेरित करता है।

अध्यक्षीय वक्तव्य में श्री राम बहादुर राय ने कहा कि कलानिधि प्रभाग का प्रतिष्ठा दिवस उस समय आरम्भ हुआ था, जब सरस्वती पूजा की परम्परा सीमित थी। उन्होंने कहा कि भक्ति, ज्ञान और कर्म का समन्वय समाज को दिशा देता है। दूरस्थ क्षेत्रों में कार्यरत पारम्परिक चिकित्सक और देशज ज्ञानधारक हमारी परम्परागत विद्या के संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ऐसे ज्ञान को सुरक्षा, मान्यता और वैज्ञानिक ढांचे के अंतर्गत संरक्षित किया जाना आवश्यक है। उन्होंने भाषाओं में नए शब्दों और नए रूपों के सृजन पर भी बल दिया तथा देवी सरस्वती से ज्ञान की रक्षा और नवसृजन की प्रेरणा की कामना की।

वैद्य राजेश कोटेचा ने कहा कि लंबे अनुभव के कारण हम कई बार ज्ञान को सीमित दृष्टि से देखने लगते हैं, जिससे औपनिवेशिक सोच हावी हो जाती है। उन्होंने भारतीय ज्ञान परम्परा को स्वदेशी दृष्टि से समझने और विशेषकर संस्कृत अध्ययन में बहुविध दृष्टिकोण अपनाने पर जोर दिया। उन्होंने जीवंत ज्ञान परम्पराओं के संरक्षण और समझ के महत्व को रेखांकित किया। श्री कोटेचा ने सभी प्रतिभागियों का आभार व्यक्त किया और भारत की जीवित ज्ञान परम्पराओं को संरक्षित करने, उन्हें व्याख्यायित करने और उन्हें समझने के महत्व को दोहराया।

प्रो. प्रतीक शर्मा ने कहा कि भारतीय परम्परा में गुरु-शिष्य परंपरा के तहत मानसिक, शारीरिक और आध्यात्मिक प्रशिक्षण एकीकृत रूप में दिया जाता था, जो कालांतर में खंडित हो गया। पश्चिमी सोच के उलट, जो बाह्य जगत पर प्रयोग करती है, भारतीय ज्ञान आंतरिक अनुभव के क्षेत्र का अन्वेषण करता है, जो कर्म, मन और चेतना को जोड़ता है। हमारे ऋषियों ने कला, संगीत, नृत्य, वास्तुकला और रीति-रिवाजों को मौखिक रूप से कोडिफाई किया, लेकिन दस्तावेज़ीकरण सीमित था, जिससे समय के साथ कुछ जानकारी लुप्त गई। स्वामी विवेकानंद और रामकृष्ण मिशन ने इस आत्मगौरव को पुनर्जीवित किया। भारतीय ज्ञान बाह्य प्रयोगों के बजाय आंतरिक अनुभव पर आधारित है। कलानिधि प्रभाग तकनीक के माध्यम से इन जटिल प्रणालियों को सुलभ बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति भी ज्ञान के खंडन को समाप्त कर विषयों के आपसी सम्बंध पर बल देती है।

 

डॉ. सच्चिदानंद जोशी ने कहा कि गणतंत्र दिवस की तैयारियों के कारण कलानिधि प्रतिष्ठा दिवस, जो वसंतपंचमी को मनाया जाता है, इस वर्ष 27 जनवरी को मनाया गया। उन्होंने कलानिधि प्रभाग को आईजीएनसीए का हृदय बताते हुए इसके प्रकाशन और विद्वत गतिविधियों की सराहना की। उन्होंने यूनेस्को के ‘मेमोरी ऑफ़ द वर्ल्ड कार्यक्रम’ के अंतर्गत 2025 में श्रीमद्भगवद्गीता और नाट्यशास्त्र को मिली मान्यता उल्लेख करते हुए कलानिधि प्रभाग को बधाई दी।

डॉ. सुनीता रेड्डी ने कहा कि गैर-लिखित परम्पराओं से जुड़े पारम्परिक चिकित्सकों पर शोध अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि उनका ज्ञान औपचारिक अकादमिक और विश्वविद्यालयीन फ्रेमवर्क से इतर मौखिक परम्पराओं से आगे बढ़ता है। उन्होंने गुणात्मक और अनुभवजन्य शोध पद्धतियों की आवश्यकता पर बल दिया तथा पंचायत स्तर पर ‘ज्ञान कुटीर’ स्थापित करने और आयुष फ्रेमवर्क के अंतर्गत ग्राम-स्तरीय नीतियों की आवश्यकता बताई।

प्रो. (डॉ.) रमेश चंद्र गौड़ ने कलानिधि प्रभाग के 37वें प्रतिष्ठा दिवस पर, इसके निरंतर प्रयासों की सराहना की। उन्होंने बताया कि यह प्रभाग आईजीएनसीए का पहला प्रभाग था, जिसे पुस्तकालय नहीं बल्कि संसाधन केंद्र के रूप में स्थापित किया गया। यहीं से पांडुलिपियों के संरक्षण, डिजिटलीकरण और सूचीकरण की शुरुआत हुई, जो आगे चलकर राष्ट्रीय पांडुलिपि मिशन और अब ‘ज्ञान भारतम्’ मिशन का आधार बनी। इस मिशन के अंतर्गत अब तक वर्णनात्मक कैटलॉग में 292,000 पांडुलिपियों को डॉक्यूमेंट किया गया है, जिससे विद्वानों और शोधकर्ताओं को वेद, गणित, खगोल विज्ञान, आयुर्वेद और कई अन्य क्षेत्रों जैसे विषयों तक पहुंच मिलती है। 2018 में, हर विषय के लिए एक अलग डिस्क्रिप्टिव कैटलॉग बनाने का फैसला किया गया था। कार्यक्रम के अंत में, श्वेता सिंह ने धन्यवाद ज्ञापन किया। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में विद्वान, शोधकर्ता और विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े लोग उपस्थित रहे।