प्रदीप सिंह।
देश में इस समय एक मामला चर्चा के केंद्र में है। मामला है सीबीएसई छात्रों के लिए पाठ्यक्रम तैयार करने वाली एनसीईआरटी की एक किताब का। सुप्रीम कोर्ट ने इसका स्वतः संज्ञान लिया है। आठवीं कक्षा के छात्रों की सोशल साइंसेज की किताब में एक चैप्टर शामिल किया गया है, जिसमें जिक्र है कि न्यायपालिका के सामने चुनौतियां क्या हैं? उसमें दो चुनौतियां बताई गई हैं,एक न्यायपालिका में भ्रष्टाचार और दूसरा पेंडिंग मामले। अब ये दोनों बातें कोई नया रहस्योद्घाटन तो हैं नहीं। लेकिन हुआ क्या? इसका जब सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लिया तो पूरी व्यवस्था यहां तक कि सरकार भी हिल गई। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि न्यायपालिका की छवि खराब करने का यह सुनियोजित षड्यंत्र है।
सुप्रीम कोर्ट के आदेश से किताब विड्रॉ कर ली गई और उसका डिजिटल फुटप्रिंट भी मिटा दिया गया है। सॉलीसिटर जनरल ने सुप्रीम कोर्ट में बिना शर्त माफी पेश की और कहा कि जिन दो लोगों ने यह करिकुलम बनाया और पाठ्यक्रम में शामिल किया,उन्हें एनसीईआरटी से हटा दिया गया है। उनको किसी सरकारी विभाग में काम नहीं मिलेगा। इस पर मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत का कहना था, इससे तो वह बड़ी आसानी से बचकर निकल जाएंगे। उन्होंने गोली चलाई है। न्यायपालिका खून से लथपथ है। इस संस्था का मुखिया होने के नाते मेरी जिम्मेदारी है कि मैं इसकी जवाबदेही तय करूं और जो जिम्मेदार हैं, उनका पता लगाऊं। तो उनके इस आदेश के बाद शिक्षा सचिव से लेकर एनसीईआरटी के चेयरमैन और तमाम लोगों को नोटिस जारी हो गए। उनको एफिडेविट देकर बताना है कि कौन लोग हैं। इस मामले में प्रधानमंत्री तक को कहना पड़ा कि इसकी जवाबदेही तय होनी चाहिए।
इस मामले में चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया और उनकी बेंच की जो टिप्पणियां हैं, उससे एक बात समझ में आती है कि इस देश में न्यायपालिका संविधान से भी ऊपर है। आप किसी संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति की आलोचना कर सकते हैं लेकिन न्यायपालिका की आलोचना अपराध माना जाएगा क्योंकि न्यायपालिका ही एकमात्र ऐसा संस्थान है, जिसके पास क्रिमिनल कंटेंप्ट की पावर है। भारत के चुने हुए प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति के पास तक यह ताकत नहीं है। मुझे इस मामले को लेकर एक कहानी याद आ रही है। एक राजा जब अपने शहर का जायजा लेने के लिए निकलता तो निर्वस्त्र होता था। लेकिन उसका आतंक इतना था कि कोई बोलता नहीं था कि राजा निर्वस्त्र है। एक दिन एक छोटे से बच्चे ने देखा और कहा कि राजा तो नंगा है। यह सुनते ही राजा महल में लौटा और सलाहकारों व मंत्रियों को बुलाकर पूछा कि किसी ने मुझे बताया क्यों नहीं। इस पर सबने कहा कि आपका डर इतना है कि किसी की यह बोलने की हिम्मत ही नहीं थी। मेरी नजर में एनसीईआरटी के जिन दोनों विशेषज्ञों ने यह करिकुलम बनाया, उनको सम्मानित किया जाना चाहिए। उन्होंने यह कहने का साहस दिखाया कि राजा निर्वस्त्र है। यह साहस सरकार और किसी सरकारी या संवैधानिक संस्था में नहीं है। भ्रष्टाचार और पेंडिंग मामलों पर जस्टिस सूर्यकांत को अपने ही साथियों की टिप्पणियां सुन लेनी चाहिए थीं। सबसे लेटेस्ट तो चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया रहे बीआर गवई की ही टिप्पणी है।

उनके पहले बेंच फिक्सिंग को लेकर चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया रहे चंद्रचूड़ ने टिप्पणी की थी। उन्होंने तो कपिल सिब्बल का उदाहरण भी दिया था। भ्रष्टाचार पर सबसे लेटेस्ट केस तो जस्टिस यशवंत वर्मा का है। मार्च 2025 में उनके घर से जले हुए करेंसी नोट बोरो में बरामद हुए थे। आज तक उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज नहीं हुई है। सुप्रीम कोर्ट ने बस इंटरनल इंक्वायरी कमेटी बना दी। भ्रष्टाचार के मामले में जहां इतने नोट पकड़े जा रहे हैं,वहां इंटरनल इंक्वायरी का कोई मतलब नहीं। सीधे एफआईआर और उसके बाद पुलिस की जांच होनी चाहिए थी। इंटरनल इंक्वायरी कमेटी ने जस्टिस वर्मा को प्रथमदृष्ट्या दोषी पाया है। लेकिन फिर भी जस्टिस वर्मा ने इस्तीफा नहीं दिया है। वे अब भी पद पर बने हुए हैं और सारी सुविधाओं का भोग कर रहे हैं। सरकारी आवास मिला हुआ है, पूरी सैलरी मिल रही है। पिछले 75-76 सालों में ऐसी कितनी ही घटनाओं के बाद भी कभी सुप्रीम कोर्ट को लगा कि उस पर गोली चली है और न्यायपालिका लहूलुहान हो गई। क्यों नहीं लगा? न्यायपालिका का भ्रष्टाचार आखिर हमारे सुप्रीम कोर्ट को क्यों नहीं दिखाई देता है? जो न्यायालयों में भ्रष्टाचार होने की बात करे,वह अपराधी नजर आता है। तो बच्चे ने अगर कहा है कि राजा नंगा है तो वह उस बच्चे का अपराध है और अपराधी को तो सजा मिलनी ही चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने इस बात पर कोई चिंता जाहिर नहीं की कि जिन दो विशेषज्ञों को जिम्मेदार ठहराया जा रहा है, उनकी बात सुने बिना सरकार ने उनको हटा दिया। जिस पर आरोप है, उसका पक्ष सुना जाए यह तो प्राकृतिक न्याय का सिद्धांत है। सुप्रीम कोर्ट तो उनको हटाने के एक्शन से भी संतुष्ट नहीं है। इससे आगे जाना चाहता है। जवाबदेही तय करना चाहता है। सवाल यह है कि क्या सुप्रीम कोर्ट को यह नहीं सोचना चाहिए था कि यह मुद्दा कितना गंभीर है? इस बेसिक मुद्दे पर चर्चा होनी चाहिए। आज करोड़ों की संख्या में गरीब लोगों के केस पेंडिंग हैं। फैसला नहीं हो रहा है। स्टे आर्डर दिया जाता है,जो बरसों बरसों तक वेकेट नहीं होता है। बेंच फिक्सिंग की बात पूर्व मुख्य न्यायाधीश बोल रहे हैं। न्यायपालिका में भ्रष्टाचार की बात सुप्रीम कोर्ट के तमाम जजेस रिटायरमेंट के बाद बोल चुके हैं।
पूरे देश में सरकारी कर्मचारियों को अपनी आय का ब्यौरा सार्वजनिक करना अनिवार्य है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट के जजेस को छूट है। वे चाहें तो लोगों को अपनी संपत्ति के बारे में बताएं और चाहे तो न बताएं। आखिर यह दोहरा व्यवहार क्यों? अगर कानून है तो सबके लिए समान होना चाहिए। न्यायपालिका में भ्रष्टाचार के बारे में किसी आम व्यक्ति से बात कर लीजिए,वह 10 मामले गिना देगा। तो जो बात पूरे देश को मालूम है, वह हमारे सुप्रीम कोर्ट के जजेस को नहीं मालूम है। अगर यह कहा जाता है कि न्याय पैसे और पहुंच वालों को मिलता है, तो सबसे बड़ी भूमिका तो न्यायालय की है। गरीब आदमी सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच ही नहीं सकता। सुप्रीम कोर्ट में जो वकील बहस के लिए खड़े होते हैं,वे एक घंटे का लाखों रुपया लेते हैं। इस देश के कितने लोग हैं, जो लाखों रुपया एक सुनवाई के लिए दे सकते हैं।

तो सुप्रीम कोर्ट के माननीय न्यायाधीशों और मुख्य न्यायाधीश महोदय से मेरी अपील है कि वे मैसेंजर को न मारें। मैसेज पर ध्यान दें। किताब के चैप्टर में किसी जज या अदालत के बारे में नहीं कहा गया कि वह भ्रष्ट है। उसमें कहा गया है कि न्यायपालिका में भ्रष्टाचार और जो पेंडिंग केसेस हैं, उनसे कैसे निपटें यह न्यायपालिका के सामने चुनौती है।
होना तो यह चाहिए था कि उन दोनों लोगों को साधुवाद दिया जाता। जब कोई बोलने की हिम्मत नहीं कर रहा है तब उन्होंने यह हिम्मत दिखाई। उन्होंने देश को,समाज को, न्याय व्यवस्था को सुधारने की पहल की है। लेकिन हो क्या रहा है, जो सच बोल रहा है उसको सजा मिलेगी। यानी संदेश है कि सच बोलना मना है। और अगर यह सच न्यायपालिका के बारे में है तब तो बिल्कुल मना है।
तो एनसीईआरटी की किताब में यह चैप्टर लिखने वाले लोगों को आप सजा दे सकते हैं। वह इस पूरे सिस्टम में बहुत छोटे से लोग हैं। वे कुछ कर नहीं सकते। जिस सरकार ने उनको अपॉइंट किया,जिस सरकार ने उस पाठ्यक्रम को स्वीकार किया,उसी सरकार ने उनको न्यायपालिका के रहमोकरम पर खुला छोड़ दिया है। जब प्रधानमंत्री ही बोल दें कि जवाबदेही तय होनी चाहिए तो फिर उन दो लोगों को कौन बचाएगा। लेकिन ऐसे लोगों को बचाया जाना चाहिए। उन्हें सम्मानित किया जाना चाहिए। यह काम सरकार नहीं करेगी। यह न्यायपालिका नहीं करेगी। आम लोगों को करना चाहिए। आम लोगों को उनके समर्थन में खड़ा होना चाहिए।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)



