1 नवंबर: बाबा खाटू श्याम जी के जन्मोत्सव पर विशेष।

Dr Rakesh Tailangडा. राकेश तैलंग।
आज मन की अतिशय प्रसन्नता और सकारात्मक उत्साह के साथ रींगस स्थित श्री खाटू श्याम जी के दर्शन कर परम संतुष्टि का अनुभव हुआ। लोक देवों की अत्यधिक श्रृद्धेय और माननीय परंपरा के प्रति अनुरक्त वर्तमान पीढ़ी पौराणिक इतिहास की उन चरित्र आत्माओं के प्रति विनय तो रही लेकिन शीर्ष और स्पॉट लाइट में समस्त सनातन जगत् के रहे स्थापित आराध्यों के आभा मंडल में ये दिशादर्शी उपेक्षित रहे। फिर सांस्कृतिक चेतना के नये प्रकाश में हमने ऐसे चरित्रों के अलौकिक प्रेरणादायी रूप को आत्मसात् किया और हारे को सहारा श्री श्याम के महाभारत युगीन पौराणिक इतिहास को जानने, समझने की मानसिकता में अपने आपको पाया। परिणाम? उस पौराणिक आराध्य के प्रति आस्था का नया बोध हुआ।

पांडव वंशोद्भव आप श्री भीम के पुत्र बर्बरीक नामधारी थे। बचपन से ही “जो कमजोर होगा उसके वे सहारा बनेंगे” की भावना रखने वाले बर्बरीक ने महाभारत में श्रीकृष्ण की आज्ञा पर अपना शीश दान कर दिया जिसे कालांतर में वर्तमान स्थान पर स्थापित किया गया।

सर्वाधिक संतोष यह अनुभव कर हुआ कि श्री श्याम भक्तों के लिये वे सहज उपलब्ध थे, बिना किसी अवरोध के  प्रभु परस्पर आमने सामने थे। आंखों के तोष भर छवि पान करने में सर्वथा अबाधित।

Courtesy: The CSR Journal

जितना ही महान् धारणाओं से भरा सीधा सच्चा ऋजु व्यक्तित्व रहा श्री श्याम का उतना ही उनके रींगस के खाटू गांव में स्थापित मंदिर की व्यवस्थाएं।।प्रायः सन्मुख दर्शनों के लिये पापड़ बेलने के बाद भी निमिष मात्र दर्शनों की अतृप्ति मिलती है। उस पर सेवादारों की व्यवस्था के नाम पर पीछे से ठेल ठेलकर बाहर करने की अहंतुष्टि, सबके बीच आज के दर्शनों में पुलिसकर्मियों का आदर युक्त व्यवहार, दर्शनों के लिये इच्छित समय को प्राप्त करना और सीनियर सिटीजन के लिये आदर,स्नेह भरी व्यवस्थाओं ने गद्गगद् कर दिया। भक्त और भगवान् के बीच कोई नहीं। मैं समझता हूं, व्यवस्थापन की गुणवत्ता के लिये मन्दिरों के बीच परस्पर संवाद होना चाहिये।

आज श्री खाटूश्याम मन्दिर ने आज के सही, सच्चे आनन्द को परिभाषित कर दिया। क्या सभी मन्दिरों के बीच व्यवस्थाओं के परिमार्जन के लिये परस्पर प्रत्यक्ष संवाद नहीं होना चाहिये?

मन्दिर जैसे श्रृद्धा निवेश के पवित्र केन्द्र जिन्हें हम भावनात्मक संबंध विस्तार के केंद्र के रूप में विकसित होते देखना चाहते हैं- का व्यवहार समाज विज्ञान (Behavioural sociometry) कुछ ऐसा हो जो जहां दूर दराज से मात्र भगवत्दर्शन करने आये भक्तों को सम्मान, स्नेह, समर्थन, सहानुभूति, स्वीकृति, पोषण और धैर्य की प्राप्ति हो- ऐसा लगा… इन पैरामीटर्स पर यह मन्दिर बहुत अच्छा है।
(लेखक जाने माने शिक्षाविद और साहित्यकार हैं)