दिल्ली में संजीव खिरवार की फिर से पोस्टिंग से उठ रहे कई सवाल।
प्रदीप सिंह।
यूं तो एक छोटी सी खबर है,लेकिन कभी-कभी व्यक्ति किसी खबर को विशेष बना देते हैं। खबर है कि एमसीडी यानी दिल्ली म्युनिसिपल कॉरपोरेशन को नया कमिश्नर मिल गया है। नए कमिश्नर का नाम है संजीव खिरवार। वह 1994 बैच के आईएएस अधिकारी हैं। अभी तक वह लद्दाख में तैनात थे। अब यह तो बड़ी सामान्य सी खबर है। आईएएस या सरकारी अधिकारियों का तबादला होता रहता है। इसमें आश्चर्य या चर्चा की क्या बात है? चर्चा की बात है एक घटना, जो 2022 की है।
2022 में संजीव खिरवार दिल्ली सरकार में प्रिंसिपल सेक्रेटरी रेवेन्यू थे। दिल्ली में त्यागराज स्टेडियम है, जहां पर एथलीट्स प्रैक्टिस करते हैं और खेल प्रतियोगिताएं भी होती हैं। वहां एथलीट्स रात 8:30 बजे तक लाइट में प्रैक्टिस करते थे। अब संजीव खिरवार साहब को अपना कुत्ता घुमाने के लिए जगह चाहिए थी तो वे स्टेडियम पहुंच जाते थे। उन्होंने आदेश करा दिया कि 7:00 बजे तक स्टेडियम खाली हो जाना चाहिए। उसके बाद साहब के साथ उनका कुत्ता टहलेगा। अब इस कहानी मैं अगर आपको यह न बताता कि वह आईएएस अधिकारी हैं तो आपको लगता कि यह अंग्रेजों के जमाने की बात हो रही है। अंग्रेज बहादुर जब यहां राज करते थे या मुगलों का राज था, तब इस तरह की घटना बड़ी सामान्य मानी जाती। अंग्रेज बहादुर चले गए लेकिन आजादी के 79 साल बाद भी यहां सिविल सर्विसेज के कुछ लोग हैं, जो समझते हैं कि हम इस देश के राजा हैं। यह बात मैं सबके लिए नहीं कह रहा हूं। सिविल सर्विसेज में बहुत से प्रतिभाशाली लोग हैं, देश के लिए,अपने प्रदेश के लिए और समाज के लिए काम करने वाले लोग हैं। लेकिन संजीव खिरवार जैसे लोग भी हैं। मैं व्यक्तिगत रूप से संजीव खिरवार के खिलाफ कुछ नहीं कह रहा हूं, मैं प्रवृत्ति की बात कर रहा हूं। वह प्रवृत्ति जो आज भी बनी हुई है कि हम इस देश के राजा हैं, हमारे लिए हर दरवाजा खुला है, आम आदमी के लिए हम जो चाहे वह दरवाजा बंद कर सकते हैं।

स्टेडिएम में एथलीटों को हुई परेशानी की खबर अखबारों में छप गई। इससे खूब हंगामा हुआ। उस समय मुख्यमंत्री थे अरविंद केजरीवाल। उन्होंने नियम बना दिया कि रात में 10 बजे तक सारी स्पोर्ट्स फैसिलिटीज और स्टेडियम वगैरह एथलीटों की प्रैक्टिस के लिए खुले रहेंगे। खबर से दबाव केंद्र सरकार पर भी पड़ा तो संजीव खिरवार का ट्रांसफर लद्दाख कर दिया गया। अब सिविल सर्विस या किसी भी सरकार नौकरी में तबादला किसी कर्मचारी या अधिकारी के लिए पनिशमेंट नहीं है, लेकिन कुछ अधिकारी उसको पनिशमेंट मानते हैं क्योंकि सबकी अपनी पसंद की जगह होती है। मुझे अपने विश्वविद्यालय के दिनों का समय याद है। उस समय उत्तर प्रदेश में बेईमान आईएएस, आईपीएस अफसरों की गिनती आप अपनी उंगलियों पर कर सकते थे। वही गिनती आप आज भी कर सकते हैं, लेकिन ईमानदार अफसरों की। यह 60-70 साल में हमारी यात्रा है। भ्रष्टाचार दिनोंदिन बढ़ता गया लेकिन इसको रोकने के लिए किसी सरकार ने कुछ नहीं किया। एक नियम बनाया गया था कि सारे आईएएस, आईपीएस अधिकारियों को अपनी संपत्ति का ब्योरा देना होगा। मुझे नहीं लगता कि सारे अधिकारियों ने दिया हो। आईएएस और आईपीएस अधिकारी जो हमारी ब्यूरोक्रेसी का पिरामिड हैं। वहां जो होता है उसका असर नीचे तक आता है। तो एक भ्रष्ट आईएएस या आईपीएस अधिकारी अपने मातहत से कैसे कह सकता है कि तुम भ्रष्टाचार नहीं कर सकते। क्या संजीव खिरवार जिस कैडर के अधिकारी हैं, उसमें और कोई योग्य अधिकारी नहीं था जो एमसीडी का कमिश्नर बनता।
खिरवार के खिलाफ जब यह खबर छपी थी तो उन्होंने उसका खंडन किया था और कहा था कि आरोप सही नहीं हैं,लेकिन उनकी बात केंद्र सरकार ने तो नहीं सुनी। उनका तबादला कर दिया। सवाल है कि क्यों कर दिया, अगर उन्होंने कोई गलती नहीं की थी। अब केंद्र सरकार कह सकती है कि ट्रांसफर कोई पनिशमेंट तो है नहीं,लेकिन अगर वह खबर न छपती क्या तब भी ट्रांसफर होता? तो कहीं न कहीं प्रथम दृष्ट्या केंद्र सरकार ने माना था कि खिरवार ने गलत किया। अब संजीव खिरवार की फिर से दिल्ली में पोस्टिंग से सवाल उठा है कि जब यह खबर छपी थी तो वह दोषी थे या नहीं? दोषी अगर नहीं थे तो उनका ट्रांसफर करके यह परसेप्शन क्यों बनाया गया कि उनको सजा दी गई। दरअसल जिन लोगों ने ट्रांसफर किया उनको लगा कि जनता की याददाश्त बड़ी कमजोर होती है। अभी विवाद से बचना है इसलिए फिलहाल इनको हटा दो। अब सरकार को लगा कि मामला शांत हो चुका है, लोग भूल चुके हैं तो फिर से उनकी पोस्टिंग दिल्ली कर दी और प्रमोट करके एमसीडी का कमिश्नर बना दिया। अब इसका असर क्या होगा? जो दूसरे अधिकारी हैं, उनके मन में भी तो आएगा कि हम भी अगर ऐसा करें तो हमारा क्या होगा? ज्यादा से ज्यादा ट्रांसफर हो जाएगा।
अंग्रेज बहादुर भले चले गए हो,लेकिन उनका जो चरित्र था, उनके कामकाज की जो शैली थी, उनकी जो सोच थी, वही आज भी भारतीय ब्यूरोक्रेसी और पॉलिटिकल लीडरशिप के अंदर है। दोनों ही अपने को इस देश का राजा मानते हैं। उनका मानना है कि बाकी जनता तो उनकी प्रजा है और प्रजा को राजा का आज्ञाकारी होना चाहिए। हम सब तय करेंगे कि आपके भले के लिए क्या है। हम अगर कहते हैं कि स्टेडियम में हम अपने कुत्ते को टहलाएंगे तो यह आपके भले के लिए है। आप अगर इस पर ऐतराज करते हैं तो आप एक तरह से समाज,देश और ब्यूरोक्रेसी के विरोध में काम कर रहे हैं। इस देश में आप अगर पैसे वाले हैं,रसूख वाले हैं, प्रभाव रखते हैं तो आपके लिए कानून अलग है। यह ऐसे ही नहीं है कि आतंकवादी के लिए बड़े-बड़े वकील सुप्रीम कोर्ट पहुंच जाते हैं और आधी रात को सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खुल जाता है जबकि आम आदमी सुप्रीम कोर्ट के दरवाजे के अंदर भी दाखिल नहीं हो सकता। तो इस देश में भले ही अंग्रेज चले गए हों, लेकिन अंग्रेजों की जो संस्कृति थी आज भी मौजूद है। यह राजा और प्रजा का फर्क आज भी मौजूद है।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक और ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)



