हितेश शंकर।
कोरोना काल की एक ठंडी-धुंधली शाम पत्रिका का काम पूरा होने के बाद पत्नी के साथ अपने आवासीय परिसर में टहल रहा था। अचानक कौवों के एक बड़े झुंड को किसी पक्षी पर हमला करते देखा… पास पहुंचे तो  जमीन पर एक बाज़ गिरा पड़ा था।

घायल, मृतप्राय..पंखों की चिंदियां उधड़ी हुईं और बाँया डैना तो लगभग टूट ही गया था। शानदार पक्षी का ऐसा हाल देखकर दिल भर आया। थोड़े गुस्साए, ज्यादा घबराए और बेतरह लहूलुहान बाज को इस हाल में छोड़ना उसकी जान की आफत बने कौवों को फिर न्यौतना था।

फड़फड़ाने और गिर जाने की हर कोशिश से बढ़ती जाने वाली उसकी चोटों  लिए सावधानी बरतते हुए साथ ही पक्षिराज के नुकीले पंजों और मांस उधेड़ने वाली मजबूत मुड़ी हुई चौंच से खुद को बचाते हुए एक मोटे-नरम तौलिये में किसी तरह लपेटकर उसे घर ले आए।

थोड़ी देर में ही समझ आ गया कि काम बहुत टेढ़ा है। मुसीबत के मारे गौरैया-गिलहरी या कबूतर जैसे छोटे-दुलारे जीवों की संभाल एक बड़े आकार के दृढ़जीवी गरुड़ के मुकाबले कहीं आसान है यह बात घर में  कदम रखते ही समझ आ गई। ( कबूतर की भी एक दिलचस्प कहानी है, वो फिर कभी )

टिन के बक्से, जूते के डिब्बे से चिड़िया-या गिलहरी का काम चलाऊ आवास या ICU बनाया जा सकता है, मगर दो फीट के बाज का क्या? इसके लिए तो जूते का डिब्बा भी ‘खली’ से मांगना पड़ेगा… खैर! तौलिये पर खून के धब्बे उभर आए और लगातार जूझने से शिथिल पड़ते बाज़ की आंखें मुंदने लगीं।

कपड़े में लपेटकर ही उसे किसी तरह चौंच में चम्मच फंसाकर ORS का घोल पिलाया गया। चेतना लौटी तो दुःख घटा लेकिन चिंता बढ़ गई। इसे रखेंगे कहां? अंत में फैसला हुआ अहाते से जुड़ते जालीदार दरवाजे के गलियारे को दो तरफ से बंद कर छोटे कमरे का रूप दिया जा सकता है।

लगा, यह समस्या सुलझाकर बड़ा तीर मार लिया। लेकिन इससे बड़ी समस्या आगे खड़ी थी- ‘ये खाएगा क्या?’ ORS से बेहोशी भले टूटे, बाज़ नहीं पलते… मांस… अरे नहीं! शाकाहारी विकल्प है ना! सो, भिगो के नरम किये न्यूट्रीला नगेट्स (सोयाबीन बड़ियां) और पनीर के दांव आजमाए गए। मगर बाज़ महाराज टस से मस न हुए। प्लकर (चिमटी) से चौंच खोलकर कुछ निवाले उसके हलक में उतारे जरूर पर डर लगा रहा कि और चोट न लगे या जबरदस्ती में कोई दाना सांस की नली में न अटक जाए।

जिस घर में प्याज-लहसुन भी तामसिक गिना जाता हो वहां तिलतिल मरने की हालत में भी कुछ न खाने का संकल्प लिए गरुड़राज बड़ी परीक्षा ले रहे थे! पहली बात यह कि पनीर-सोयाबीन यह भला क्यों खाएगा? दूसरी यह कि इसे अभी कोई और भला क्यों रखेगा? हारकर सुबह पड़ौसी सज्जन के घर जाना ही पड़ा।

-कुछ बोटियाँ मिलेंगी?

-मगर आप तो अंडा भी नहीं खाते!

पूरी कहानी सुनाई तो संवेदना के साथ सहयोग का हाथ बढ़ आया। घर में बाज़ की सुंदर किन्तु त्याज्य थाली निकाल दी गई। अब थाली से ज्यादा चमक बाज़ की आंखों में थी… बोटियाँ दिखते ही मानो उसमें नई जान पड़ गई। पहले धीरे से एक टुकड़ा और फिर जल्दी-जल्दी सब साफ… बढ़िया!

दिन पर दिन समय से मिलने वाली पर्याप्त खुराक से हालत संभलती दिखी। अब दरवाजा खोलने पर बाज़ न बौखलाता था न उत्तेजित होता था। मुझे देखकर कुछ झुक जाता था।

टूटे डैने में कौवों ने गम्भीर चोट दी थी। गहरा घाव रिस रहा था। होम्योपैथी की कैलेंडुला ऐसे में अच्छा काम करती है। सो यह उपचार भी शुरू हो गया। चिन्दियों की तरह उठे, मुड़े, उड़े पंख फिर तरतीब से जमने लगे। लगा हफ्तेभर में डैना जुड़ जाएगा, और गैलरी की छोटी फड़फड़ाहट आसमान की बड़ी उड़ान बन जाएगी, लेकिन नहीं।

बाज़ की गैलरी में जाना मुश्किल होने लगा। बार-बार सफाई की जरूरत। ढेर गन्दगी और बुरी तरह बदबू। चिड़ियाघर में शेर के बाड़े के पास से उठने वाली गन्ध से भी तीखी और असहनीय गंध घर में भरने लगी। पहले लगा यह बार-बार बोटियों की जूठन से पैदा हुई सड़ांध है जो घर में बैठने लगी है। झुंझलाहट हुई, मगर सोचा दवा-पानी तो करना ही है। कुछ दिन और सही।

लेकिन उस दिन गैलरी में कैलेंडुला लेकर घुसा तो मुझे देखकर आहिस्ता से झुक जाने वाला बाज़ अपना टूटा पर खोलकर फर्श पर औंधे मुंह झूल सा गया। मैंने तौलिये में उसे लपेटा तो बदबू का भभका सा उठा… मांस बोटियों में नहीं, कहीं और सड़ रहा था। डैने का जख्म नासूर में तब्दील हो रहा था। सड़न भी ऐसी कि पिछली रात की बारिश और मौसम की नमी से घाव में कीड़े (maggot) पड़ चुके थे।

हे भगवान, अब क्या करें! तुरंत कैमिस्ट से हाइड्रोजन पैराक्सआइड (जिसका इस्तेमाल डॉक्टर घाव साफ करने और नाई काले बालों का रंग उड़ाकर उन्हें भूरा करने के लिए करते हैं) और बीटाडीन लोशन की बोतलें लाई गईं। सोचा, घाव तो साफ होगा मगर जलन, तिलमिलाहट भी बहुत होगी… सो, बाज़ का चेहरा एक अलग कपड़े से ढका और घायल पंख को तौलिये से बाहर रखते हुए कपड़े में ठीक से लपेटा।

हाइड्रोजन पैराक्सआइड की जलन कितनी तीखी, गर्म और असहनीय है यह अनुभव तब हुआ जब उसका कुछ हिस्सा मेरे ताज़ा कटे नाखून की गहराई में लगा। मैं और बाज़ दोनों बुरी तरह झनझना गए… हाइड्रोजन पैराक्सआइड के उबलते झाग ने जलन कितनी भी दी लेकिन सड़न और कीड़े साफ होने लगे। फिर बीटाडीन लोशन से राहत पहुंची।

अगले कुछ दिनों में यह क्रम बार-बार दोहराया गया। एक, दो, तीन…कुछ और दिन बीते। बाज अब कुछ ठीक हालत में था, घर-गलियारे में सहज और चेहरे पहचाने में सक्षम आंखें चमकने लगीं। हां, बायाँ डैना जरूर झूल रहा था और हाइड्रोजन पैराक्सआइड ने लकड़ी जैसे काले-भूरे पंख का रंग उड़ाकर उसे ताम्बई-सुनहरा कर दिया था। सो अब चिन्ता टूटे पंख के कायदे से जमने-जुड़ने के अलावा उसके अकेलेपन की भी थी।

तभी एक मित्र ने दरियागंज स्थिति जैन पक्षी अस्पताल के विषय में बताया जहाँ वर्षों से पक्षियों की निस्वार्थ भाव से चिकित्सा की जाती है। सलाह थी कि ‘बच्चू बच तो गया ही है, अस्पताल में पक्षियों की संगत मिलने से और चंगा हो जाएगा।’ सुझाव बढ़िया था किंतु दिक्कत सिर्फ इतनी थी जैन अस्पताल में आप घायल पक्षी दे सकते हैं, वापस नहीं ले सकते। पहली बार अनुभव हुआ कि इस टूटे पंख वाले जीव से दिल कितना गहरा जुड़ गया है।

खैर, भारी मन से उसे अस्पताल को सौंपा। पूछा, इसे देखने तो आ सकते हैं ना! उत्तर मिला कि मांसाहारी पक्षियों को उपचार जरूर देते हैं किंतु जैन संस्थान होने के कारण अगले दिन उन्हें संजय वन भेज दिया जाता है… बताते हुए पक्षी पर्यवेक्षक ने बाज की चोंच खोलकर कोई टॉनिक उड़ेला और  तुरंत ‘महाराज’ तनकर बैठ गए। उसकी इस मुद्रा ने सन्तुष्टि दी किन्तु उसे छोड़कर गहरी उदासी के साथ घर लौट आया। कुछ दिन याद कचोटती रही, हम दोनों उसकी बात करते रहे.. फिर धीरे-धीरे अपने-अपने काम में डूब गए।

…… डेढ़ेक माह बाद……

रातभर काम करने के बाद सर्दी की एक सुबह देर से आंख खुली तो एक तीखी आवाज ने चौंका दिया… दरवाजे के बाहर जाली में से झांकते उस ऊंचे तार पर जहां धूप सबसे पहले पहुंचती है, एक शानदार बाज बैठा था। बायाँ डैना थोड़ा झुका-तिरछा, ताम्बई-सुनहरा…!

मुड़ी हुई तीखी चोंच खुली, उत्साही चीख जैसी किलकारी फिर गूंजी… मैं हैरानी से सोच रहा था, दुनिया क्या इतनी छोटी है और क्या सब इसी तरह एक-दूसरे से जुड़े हैं!
(लेखक पाञ्चजन्य पत्रिका के संपादक हैं)