(वसंत पंचमी पर विशेष)
ओशो ।
अर्जुन ने पूछा है कि किन भावों में मैं आपको देखूं? कहां आपको खोजूं? कहां आपके दर्शन होंगे?
तब कृष्ण कहते हैं कि अगर तुझे मुझे स्त्रियों में खोजना हो तो कीर्ति में, श्री में, वाक् में, स्मृति में, मेधा में, धृति में और क्षमा में मुझे खोज लेना। तथा मैं गायन करने योग्य श्रुतियों में बृहत्साम, छंदों में गायत्री छंद तथा महीनों में मार्गशीर्ष का महीना, ऋतुओं में वसंत ऋतु हूं। अंतिम, वसंत ऋतु पर दो शब्द हम खयाल में ले लें।
ऋतुओं में खिला हुआ, फूलों से लदा हुआ, उत्सव का क्षण वसंत है।
उत्सव में, वसंत में मैं हूं
परमात्मा को रूखे—सूखे, मृत, मुर्दा घरों में मत खोजना। जहां जीवन उत्सव मनाता हो, जहां जीवन खिलता हो वसंत जैसा, जहां सब बीज अंकुरित होकर फूल बन जाते हों, उत्सव में, वसंत में मैं हूं।
ईश्वर सिर्फ उन्हीं को उपलब्ध होता है, जो जीवन के उत्सव में, जीवन के रस में, जीवन के छंद में, उसके संगीत में, उसे देखने की क्षमता जुटा पाते हैं। उदास, रोते हुए, भागे हुए लोग, मुर्दा हो गए लोग, उसे नहीं देख पाते। पतझड़ में उसे देखना बहुत मुश्किल है। मौजूद तो वह वहां भी है। लेकिन जो वसंत में भी उसे नहीं देख पाते, वे पतझड़ में उसे कैसे देख पाएंगे? वसंत में जो देख पाते हैं, वे तो उसे पतझड़ में भी देख लेंगे। फिर तो पतझड़ पतझड़ नहीं मालूम पड़ेगी, वसंत का ही विश्राम होगा। फिर तो पतझड़ वसंत के विपरीत भी नहीं मालूम पड़ेगी; वसंत का आगमन या वसंत का जाना होगा। लेकिन देखना हो पहले, तो वसंत में ही देखना उचित है।
शायद पृथ्वी पर हिंदुओं ने, अकेला ही एक ऐसा धर्म है, जिसने उत्सव में प्रभु को देखने की चेष्टा की है। एक उत्सवपूर्ण, एक, फेस्टिव, नाचता हुआ; छंद में, और गीत में, और संगीत में, और फूल में!
(गीता दर्शन, भाग-5, अध्याय-10, तेरहवें प्रवचन के सम्पादित अंश)
क्या सोवै तू बावरी, चाला जात बसंत
यह जीवन तो बसंत ऋतु है। देखते हो, जीवन की कोई निंदा नहीं है। यह तो अहोभाग्य है। …बसंत आ गया, फूल खिल गए, पक्षी गीत गा रहे हैं, मोर नाच रहे हैं। सारा जगत् उल्लास से भरा है। और तुम सोए-सोए बिता दोगे? मूर्च्छित ही बने रहोगे?
भक्ति की आधार-शिलाएं पलटू के इस पद में हैं- ‘क्या सोवै तू बावरी, चाला जात बसंत। चाला जात बसंत, कंत ना घर में आए।’
कब जागोगे
“क्या सोवै तू बावरी’ … तुम कैसे पागल हो! जागने की घड़ी आ गई, बसंत द्वार थपथपा रहा है। सब तरफ राग-रंग है। सब तरफ प्रभु की वर्षा है। सूरज निकल आया, किरणों का जाल फैल गया। तुम कैसे पागल हो कि अभी भी सोए हो! फिर कब जागोगे?
कह रहे हैं पलटू : “चाला जात बसंत, कंत ना घर में आए।’
प्यारे को तूने खोजा ही नहीं, घर भी न बुलाया, पाती भी न लिखी, निमंत्रण भी नहीं भेजा और ये बसंत के जाने के क्षण करीब आने लगे। जीवन अभी है, अभी खो जाएगा, क्षणभंगुर है!
यहां तो निश्चित ही समय के जगत् में, समय की व्यवस्था में, जो भी पैदा होता है मर जाता है। बसंत भी आया और गया। जन्म हुआ और मृत्यु होने लगी। मिले नहीं कि बिछुड़ने की घड़ी आने लगी। यह बसंत तो थोड़ी देर को है। यह द्वार ज़रा-सी देर को खुलता है। लेकिन एक और भी बसंत है- प्रभु में डूब जाने का। इस द्वार का जो सदुपयोग कर ले तो वह परम बसंत को उपलब्ध हो जाए।
किसकी खोज चल रही है
यहां भी तुम जो खोज रहे हो, खोज तो उसी को रहे हो। पत्नी में खोजते हो, पति में खोजते हो–कभी सोचा है किसे खोजते हो? यह किसकी खोज चल रही है- पति में, पत्नी में; बेटी में, मित्रों में, संबंधों में, परिजनों में, किसकी खोज चल रही है? और तुमने यह भी नहीं सोचा, कभी इसकी जांच-परख भी नहीं की कि हर बार खोज व्यर्थ हो जाती है। हर बार विषाद हाथ लगता है, विफलता लगती है। पत्नी में खोजो, पति में खोजो- तुम जिसे खोज रहे हो वह इतना बड़ा है कि कोई उसे तुम्हें न दे पाएगी। और तब तुम अंततः नाराज होओगे गरीब पत्नी पर। उसका कोई कसूर भी न था। तुम्हारी मांग बड़ी थी। घड़े में सागर खोजने चले थे। घड़े का क्या कसूर ? पति में परमात्मा को खोजने चले थे । नहीं मिला पति में परमात्मा, तो क्या कसूर पति का? फिर नाराजगी पति पर आती है।
तुमने देखा, पति-पत्नी एक-दूसरे पर बड़े क्रुद्ध हो जाते हैं। क्योंकि उनको लगता है धोखा दिया गया है। उनको लगता है : जो प्रलोभन हमें दिया गया था, जो देने का आश्वासन दिया गया था, वह पूरा नहीं किया गया। उन्हें शिकायत होती है। चाहे शिकायत साफ-साफ न हो, लेकिन पति-पत्नी का मन एक-दूसरे के प्रति तिक्तता से भरता जाता है, कड़वाहट से भर जाता है। कारण बड़ा धार्मिक है। कारण यही है कि पत्नी ने जिसे प्रेम किया था, सोचा था उसमें परमात्मा मिलेगा। मिला एक साधारण आदमी- क्षुद्र वासनाओं से भरा, क्षुद्र सीमाओं से घिरा। सोचा था असीम से दोस्ती होगी। सोचा था मंदिर मिल जाएगा। मिला घर, मंदिर नहीं मिला। घरवाली बन गई, घरवाले मिल गए- लेकिन मंदिर नहीं मिला। प्यास तो मन की एक ही है–मंदिर के लिए । शाश्वत को चाहा था, यह क्षणभंगुर मिला।
सांसारिक प्रेम
खयाल रखना, तुम्हारा जो सांसारिक प्रेम है वह परमात्मा के लिए ही तुम्हारा टटोलना है। कभी स्त्री को टटोलते, कभी पुरुष को टटोलते, कभी पति को, कभी पत्नी को, कभी बेटे को, कभी मित्र को, कभी यहां-वहां–लेकिन तुम टटोल परमात्मा के लिए रहे हो। कभी तुम्हारी टटोलती हुई लकड़ी दीवाल से लगती है तो तुम थोड़ी देर बाद हट जाते हो, क्योंकि यहां तो दीवाल है। कभी कुरसी से टकराती है, क्योंकि यहां तो कुरसी है। ऐसे ही धीरे-धीरे सारे संसार में टटोलने के बाद दरवाजा मिलता है।
(अजहू चेत गवांर (पलटू दास), पांचवां प्रवचन- 25 जुलाई 1977- श्री रजनीश आश्रम पूना, के सम्पादित अंश)
प्रेयसी परमात्मा के विपरीत नहीं, प्रेयसी से द्वार जाता है परमात्मा तक