Govind Singh, Journalistगोविंद सिंह.

उत्तराखंड में पुष्कर सिंह धामी सरकार के मौजूदा कार्यकाल के चार साल पूरे करने पर हल्द्वानी में आयोजित रैली में जब केंद्रीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि 2022 के चुनाव के दौरान उन्होंने धामी को “धाकड़” कहा था. उस समय धामी नए-नए मुख्यमंत्री बने थे और उन पर बड़ी जिम्मेदारी थी. लेकिन अब चार साल के काम को देखते हुए उन्होंने कहा कि धामी ने खुद को एक मजबूत और अनुभवी नेता के रूप में साबित कर दिया है. इसी वजह से अब वह उन्हें “धुरंधर” कह रहे हैं.

पार्टी के एक वरिष्ठ और सम्मानित नेता के मुख से ये शब्द यों ही नहीं निकले। हाल के वर्षों में किसी नेता के लिए इस तरह के विशेषण कम ही निकले हैं। उत्तराखंड की राजनीति में नारायण दत्त तिवारी को उनकी जीवन भर की संचित राजनीतिक पूंजी के चलते उन्हें ‘विकास पुरुष’ कहा गया तो नीतीश कुमार को भी लंबी राजनीतिक साधना के बाद ही ‘सुशासन बाबू’ नाम दिया गया। इनकी तुलना में पहली बार मुख्यमंत्री बने पुष्कर सिंह धामी को सिर्फ छह महीने सत्ता में देखने के बाद ही उन्हें धाकड़ उपनाम दिया गया तो यह मामूली बात नहीं है। जब वे समान नागरिक संहिता ले आए, सख्त धर्म परिवर्तन विरोधी कानून ले आए या उन्होने धार्मिक आधार पर चलने वाले तरह-तरह के जिहादों के विरुद्ध अभियान चलाये और ये संकल्प लिया कि वे देवभूमि के मूल स्वरूप को बिगड़ने नहीं देंगे तो उन्हें ‘धर्म रक्षक धामी’ की उपाधि दी गई। और अब दूसरे कार्यकाल के चार साल पूर्ण होने पर उन्हें ‘धुरंधर’ कहा जा रहा है तो सिर्फ इसलिए कि उन्होने बार-बार खुद को साबित किया है।   उन्होंने पिछले चार वर्षों में अपने अनथक परिश्रम, दूरगामी फैसलों और जनता के हितों के प्रति अटूट प्रतिबद्धता के जरिए लोगों का भरोसा बार-बार जीता है.

दरअसल पिछले 25 साल के जीवन में उत्तराखंड को सिर्फ नारायण दत्त तिवारी ही एकमात्र मुख्यमंत्री मिले, जिन्हें पूरा कार्यकाल मिला। राजनीतिक तौर पर भी उन्हें न पार्टी के भीतर से और न बाहर से कोई खास चुनौती मिली। इसलिए वे नव-जन्मे राज्य के लिए कुछ स्थायी फैसले भी ले पाये। हालांकि यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि उनकी विकास दृष्टि में मुख्यतः मैदान ही थे। फिर भी उन्होने प्रदेश की मजबूत औद्योगिक नींव रखी और आज उन्हीं की बदौलत पंत नगर, सितारगंज और हरिद्वार में औद्योगिक क्षेत्र आगे बढ़ रहे हैं। उसके बाद भी हुआ तो बहुत कुछ लेकिन स्थायी रफ्तार नहीं पकड़ पाया। इसलिए प्रदेश से बाहर एक प्रगतिशील प्रांत के रूप में उत्तराखंड की छवि नहीं बन पाई।

इसलिए चार जुलाई, 2021 को जब अचानक से पुष्कर सिंह धामी के माथे पर उत्तराखंड का मुकुट जड़ दिया गया तो अनेक प्रकार की आशंकाएँ राजनीतिक पंडितों ने व्यक्त कीं। लेकिन जो लोग उन्हें करीब से जानते थे, उनकी संगठन शक्ति से परिचित थे, वे जानते थे कि यह व्यक्ति आगे चल कर कुछ न कुछ करेगा। खैर, अपनी अदम्य जिजीविषा और अनथक मेहनत के बल पर वे अपनी पार्टी को जब पुनः सत्ता में ले आए तो ठीक आठ महीने बाद पुनः मुख्यमंत्री बन गए। चूंकि वे अपनी खटीमा सीट हार गए थे, इसलिए एक बार तो लग रहा था कि शायद ही उन्हें मुख्यमंत्री पद मिल पाए। लेकिन पार्टी आला कमान ने उनकी कर्मठता और धाकडपने पर भरोसा किया। इसलिए पिछले चार वर्षों में उन्होने हर पल अपने को साबित करने में जान लगा दी। एक के बाद एक ताबड़तोड़ फैसलों से उन्होने यह साबित किया कि वे निर्भीक होकर फैसले लेने से डरते नहीं। निश्चय ही उन्हें हर कदम पर प्रधान मंत्री मोदी और अन्य बड़े नेताओं का समर्थन और सहयोग मिला। इसलिए वे बहुत थोड़े समय में नकल विरोधी कानून, सशक्त भू-कानून, समान नागरिक संहिता, धर्मांतरण विरोधी कानून, अल्पसंख्यक शिक्षा कानून लाये और यह संदेश दिया कि वे देवभूमि के मूल स्वरूप में किसी तरह की छेदछाड़ बर्दाश्त नहीं करेंगे।

लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि वे अपनी छवि सिर्फ धर्म रक्षक के रूप में बनने से ही संतुष्ट हो गए। प्रदेश के आर्थिक विकास को लेकर भी वे निरंतर चिंताशील रहे। वे कहते हैं, ‘हमारा संकल्प केवल विकास नहीं, बल्कि समग्र और संतुलित विकास है। प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी के मार्गदर्शन में उत्तराखण्ड को श्रेष्ठ राज्य बनाने की दिशा में हम निरंतर कार्य कर रहे हैं। विकसित भारत @2047 के लक्ष्य में उत्तराखण्ड अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा’। वे बार-बार प्रधान मंत्री मोदी द्वारा केदारनाथ में कहे गए शब्दों को दोहराते हैं कि ‘तीसरा दशक उत्तराखंड का होगा’। इसलिए उन्हें लगता है कि समय बहुत कम है और अभी बहुत काम करना बाकी है। वे सुबह से शाम तक अकेले ही पूरे प्रदेश में दौड़ते रहते हैं। ताकि कहीं कोई कमी न रह जाये।

निश्चय ही पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में बीते चार वर्षों ने राज्य की विकास यात्रा को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया है। यह दौर केवल योजनाओं की घोषणा का नहीं, बल्कि जमीनी क्रियान्वयन और परिणामों का रहा है। एक तरफ राज्य में बहुत तेजी के साथ औद्योगिक निवेश बढ़ा है तो दूसरी प्राकृतिक विरासत को बचाए रखते हुए सतत विकास लक्ष में भी यह राज्य सबसे आगे रहा है। स्टार्टअप इकोसिस्टम में उत्तराखण्ड को “लीडर” का दर्जा मिला है, वहीं एमएसएमई की संख्या बढ़कर लगभग 80 हजार तक पहुँच गई है। इससे लाखों लोगों को रोजगार के अवसर मिले हैं। नकल विरोधी कानून के बाद भर्ती प्रक्रियाओं में विश्वास बढ़ा और चार वर्षों में 32 हजार से अधिक युवाओं को सरकारी नौकरी मिलना इसका प्रमाण है। आर्थिक मोर्चे पर भी राज्य ने उल्लेखनीय प्रगति की है। वर्ष 2024-25 में राज्य का जीएसडीपी ₹3.81 लाख करोड़ तक पहुँच गया, जो 2021-22 की तुलना में डेढ़ गुना वृद्धि दर्शाता है। प्रति व्यक्ति आय बढ़कर ₹2.73 लाख हो गई है, जबकि मल्टी डायमेंशनल पॉवर्टी इंडेक्स घटकर 6.92 प्रतिशत पर आ गया है। राज्य का ग्रोथ रेट 7.23 प्रतिशत रहा, जो मजबूत आर्थिक आधार को दर्शाता है।

शिक्षा, स्वास्थ्य और समाज के क्षेत्र में भी प्रदेश ने उल्लेखनीय तरक्की की है। सामाजिक सुरक्षा के क्षेत्र में अटल आयुष्मान योजना के तहत 61 लाख कार्ड बनाए गए और 17 लाख से अधिक मरीजों को ₹3400 करोड़ से अधिक का मुफ्त इलाज मिला। अन्य प्रदेशों के लोग यह सुन कर हैरान रह जाते हैं कि उत्तराखंड में सेहत के लिए क्या-क्या सुविधाएं मौजूद हैं। महिलाओं के लिए 30 प्रतिशत आरक्षण, सहकारी समितियों में 33 प्रतिशत भागीदारी और “लखपति दीदी” योजना के माध्यम से 2.5 लाख से अधिक महिलाओं का सशक्तिकरण, राज्य की सामाजिक समावेशन नीति को दर्शाता है। साथ ही खेलों की दुनिया में भी इस राज्य ने अभूतपूर्व प्रगति की है। इस प्रकार यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि धामी सरकार ने पिछले चार साल में उत्तराखंड को उस पायदान पर लाकर खड़ा कर दिया है, जहां से भविष्य की तस्वीर को साफ साफ देखा जा सकता है। उसके द्वारा खींची गई लकीर की लंबाई को  पछाड़ना मुश्किल होगा।

(लेखक मीडिया सलहकार समिति, उत्तराखंड सरकार के अध्यक्ष हैं)