एसआईआर पर अपने ही मुद्दों को कर रहे ध्वस्त, बड़े मतदाता वर्ग को खुद से काटा।
प्रदीप सिंह।
उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की राजनीति को समझना बहुत मुश्किल है और उनकी राजनीतिक समझ को समझना तो और ज्यादा मुश्किल है। यूपी में एसआईआर की प्रक्रिया 26 दिसंबर को पूरी हो गई। इसबीच प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का एक बयान आया,जिसमें उन्होंने अपनी पार्टी के लोगों से कहा कि 4 करोड़ फॉर्म लौटे नहीं हैं, उनमें ज्यादातर आपके वोटर हैं। लोगों का वोट बनवाइए। जिन लोगों के फॉर्म लौटे नहीं थे,उनमें ज्यादातर शहरी इलाके के थे और माना जाता है कि वहां भाजपा के वोटर ज्यादा रहते हैं। योगी का यह बयान आते ही शुरू से एसआईआर का विरोध करने वाले अखिलेश यादव ने एसआईआर की प्रक्रिया का समर्थन कर दिया। उन्होंने गणित निकाल लिया कि हर विधानसभा क्षेत्र से भाजपा के 60 से 65000 वोट कम हो गए और कहा कि बीजेपी 2027 के विधानसभा चुनाव में दहाई का आंकड़ा भी पार नहीं कर पाएगी। जब एसआईआर की घोषणा हुई थी तो अखिलेश यादव का आरोप था कि प्रदेश में मुस्लिम और दलित वोटों को कटवाने के लिए एसआईआर हो रहा है और चुनाव आयोग एवं भाजपा मिले हुए हैं। योगी जी के बयान पर रिएक्शन देते हुए अखिलेश ने खुद ही अपने इन दोनों मुद्दों को ध्वस्त कर दिया। उन्होंने मान लिया कि बहुत पारदर्शी तरीके से काम हो रहा है और वे इस बात से खुश हैं कि भाजपा के वोटर कट रहे हैं। हमारे वोटर नहीं कट रहे हैं।

अब सवाल यह है कि अखिलेश यादव भाजपा के खिलाफ हैं या भाजपा के साथ हैं। वे जिस तरह का वातावरण बनाने की कोशिश कर रहे हैं वह सब भाजपा के पक्ष में जा रहा है। राहुल गांधी से लेकर अखिलेश यादव और ममता बनर्जी तक एसआईआर को जिस तरह से मुद्दा बना रहे थे और आंदोलन की धमकी दे रहे थे अब तो आपने उस प्रक्रिया को 100 में 100 नंबर दे दिए। एक तरह से आपने उड़ता हुआ तीर ले लिया। भाजपा और चुनाव आयोग की मिलीभगत साबित करने के बजाय आपने चुनाव आयोग को क्लीनचिट दे दी और एसआईआर को सही बता दिया।
इसी तरह उनका एक अन्य मुद्दा पीडीए का है। कोई राजनीतिक दल जो चुनाव में उतरता है, वह कभी समाज के किसी वर्ग को यह संदेश नहीं देता कि हमें आपका वोट नहीं चाहिए। लेकिन अखिलेश यादव ने पीडीए के जरिए संदेश क्या दिया कि हमें सवर्णों का खासतौर से ब्राह्मणों और ठाकुरों का वोट नहीं चाहिए। वह हर बात में पीडीए मतलब पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक का जिक्र करते हैं। तो उन्होंने अपने को एक बड़े मतदाता वर्ग से एक तरह से काट लिया है। उत्तर प्रदेश में सवर्ण मतदाता लगभग 20 से 22% हैं।
अखिलेश यादव के जिस तरह के बयान आते हैं, उनको पढ़कर या सुनकर लगता है कि उनमें जो राजनीतिक समझ विकसित हो जानी चाहिए थी,अब तक नहीं हो पाई है। 38 साल की उम्र में वह उत्तर प्रदेश जैसे राज्य के मुख्यमंत्री बन गए थे और पूरे 5 साल मुख्यमंत्री रहे। सवाल यह है कि समाजवादी पार्टी का प्रभाव क्षेत्र क्या है? केवल उत्तर प्रदेश। उत्तर प्रदेश से बाहर उसका कोई जनाधार, कोई आधार नहीं है। अखिलेश यादव की सारी राजनीति उत्तर प्रदेश पर टिकी हुई है। वहां उनको कितनी सफलता मिलती है या नहीं मिलती है, इससे ही उनका राजनीतिक भविष्य तय होगा। 2022 में उनकी पार्टी को अच्छी सफलता मिली। उनकी पार्टी व सहयोगी दलों के करीब सवा सौ विधायक जीत कर आए। अब किसी भी समझदार राजनेता का अगला कदम यह होना चाहिए था कि उत्तर प्रदेश में खूंटा गाड़ कर बैठ जाए और 2027 की तैयारी करे। लेकिन अखिलेश ने किया इसका उल्टा। वे 2024 के लोकसभा चुनाव में उतर गए। वे खुद तो जीते ही पार्टी को भी 37 सीटों के साथ अच्छी सफलता मिली। यह सब तो ठीक है, लेकिन सवाल यह है कि जब लोकसभा चुनाव का नतीजा आ गया और स्पष्ट हो गया कि भाजपा गठबंधन की ही सरकार बनने जा रही है फिर भी उन्होंने लोकसभा की सदस्यता से इस्तीफा नहीं दिया। उन्होंने विधानसभा की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया। नेतृत्व के स्तर पर कहें तो उनकी लड़ाई उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से है। अखिलेश अगर विधानसभा में उनके सामने बैठते और उनके आरोपों का जवाब देते तो उसका दूसरा असर होता। सपा के दूसरे नेता माता प्रसाद जवाब देते हैं तो लगता है कि वे बड़ी मजबूरी में योगी जी का विरोध कर रहे हैं। तो यूपी विधानसभा में अपोजिशन का जो स्पेस था, उसको आपने पूरी तरह से छोड़ दिया। विधानसभा में आपके हस्तक्षेप से पार्टी को जो फायदा हो सकता था,उसे आपने गंवा दिया। उत्तर प्रदेश विधानसभा में आपका प्रभाव ज्यादा हो सकता था। पार्टी के लिए अच्छा हो सकता था। हमेशा योगी जी के चैलेंजर के रूप में आप सामने बैठे होते। वह मौका आपने हाथ से जाने दिया।

अब दूसरी बात देखिए कि 2025 में बिहार विधानसभा का चुनाव हुआ। बिहार में समाजवादी पार्टी का कुछ नहीं है, लेकिन अखिलेश वहां चुनाव प्रचार करने चले गए। इस तरह के चुनाव प्रचार में हमेशा एक जोखिम रहता है कि सफलता मिल गई तो वाहवाह और सफलता नहीं मिली तो आपका जो गढ़ है, वहां नुकसान होता है। यादव मुस्लिम कॉम्बिनेशन देश के किसी राज्य में सबसे मजबूत है तो वह बिहार में है। अखिलेश के वहां चुनाव प्रचार करने से कोई असर नहीं पड़ा। तो अगर अखिलेश यादव यह सोच रहे हैं कि बिहार विधानसभा के चुनाव के नतीजे का यूपी की राजनीति पर कोई असर नहीं पड़ेगा और उनके चुनाव प्रचार में इस तरह से असफल हो जाने का भी प्रभाव नहीं पड़ेगा तो आप समझ लीजिए कि वे राजनीतिक रूप से कितने समझदार हैं। बिहार में चुनाव प्रचार में जाना उनकी गलती है। वहां महागठबंधन की इतनी बुरी हार में आपका भी नाम जुड़ गया कि आपने भी कोशिश की तब भी कुछ नहीं कर पाए। अब सोशल मीडिया और इलेक्ट्रानिक मीडिया का जमाना है। सबको सब कुछ पता चल जाता है। तो उत्तर प्रदेश के मतदाताओं को यह पता नहीं चलेगा कि बिहार में क्या हुआ।

लोकसभा चुनाव में सपा को जो सफलता मिली उसको अखिलेश स्थाई मानकर चल रहे हैं। वे यह नहीं देख रहे हैं कि लोकसभा चुनाव की सफलता यूपी विधानसभा के जो उपचुनाव हुए उसी में तिरोहित हो गई थी। 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद से भाजपा ने अपना घर सुधारने,अपनी रणनीति को नए सिरे से बनाने का बहुत बड़ा प्रयास किया। उसका नतीजा महाराष्ट्र,हरियाणा,दिल्ली,बिहा
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक और ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)



