इन उग्रवादी संगठनों के साथ शांति समझौतों पर हस्ताक्षर हुए
आज के ताजा हालातों को लेकर यह कहा जा सकता है कि पूर्वोत्तर को पहले अशांति, बम हमलों, बंद आदि के लिए जाना जाता था, लेकिन पिछले आठ साल में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में यहां शांति स्थापित हुई है। यहां उग्रवादी संगठनों के साथ शांति समझौतों पर हस्ताक्षर किये गये जिनमें 2019 में नेशनल लिबरेशन फ्रंट ऑफ त्रिपुरा के साथ, 2020 में ब्रू समुदाय और बोडोस से जुड़े समूहों के साथ और 2021 में कार्बी समुदाय से जुड़े समूहों के साथ समझौते किये गये। इसी प्रकार से समझौते 2022 में हुए।

विकास की चल रहीं कई हजार करोड़ की योजनाएं
मोदी सरकार की ओर से उग्रवादी समूहों के विरुद्ध कड़े कदम उठाए जाने के बाद पूर्वोत्तर क्षेत्र में सुरक्षा की स्थिति में उल्लेखनीय सुधार हुआ है। इस वित्तीय वर्ष के बजट में पूर्वोत्तर के लिए प्रधानमंत्री की विकास पहल के नाम से एक नई योजना की घोषणा की गई। इसके लिये एक हजार पांच सौ करोड़ रुपए आवंटित किए गए। इसी तरह से अन्य अनेक योजनाएं भी अभी यहां के विकास को पंख लगा रही हैं।
अफ्सपा की हुई कई राज्यों से वापिसी
इस संबंध में केंद्रीय खेल एवं युवा मामलों के मंत्री अनुराग सिंह ठाकुर का स्पष्ट तौर पर कहना है कि केंद्र में भाजपा की सरकार बनने के बाद से पूर्वोत्तर में उग्रवाद की घटनाओं में 89 प्रतिशत की कमी आई है। सशस्त्र हमलों में नागरिकों की हत्याओं में लगभग 90 प्रतिशत की कमी आई है। व्यापक हित में सशस्त्र बल विशेष अधिकार अधिनियम (अफ्सपा) को वापस ले लिया गया और केंद्र सरकार द्वारा सामान्य स्थिति वापस लाई गई है।
त्रिपुरा छू रहा विकास की ऊंचाइयां
वे कहते हैं कि त्रिपुरा में भी शांति और सद्भाव बहाल करने के लिए चरमपंथी समूहों के साथ शांति समझौते पर हस्ताक्षर किए गए हैं। त्रिपुरा में लंबे समय तक कम्युनिस्टों का शासन रहा है और राज्य विकास के सभी मानकों पर पिछड़ता रहा। पहले पांच साल में भाजपा ने त्रिपुरा के विकास की नींव रखी है। दूसरे कार्यकाल के लिए चुने जाने पर यह राज्य अलग उत्साह के साथ विकास की नई ऊंचाइयों को छुएगा।
असम-मेघालय और असम-अरुणाचल प्रदेश सीमा विवाद सुलझा
केन्द्रीय गृह राज्यमंत्री किशन रेड्डी इस बारे में बताते हैं कि असम-मेघालय और असम-अरुणाचल प्रदेश सीमा विवाद लगभग सुलझ गया है और शांति बहाल होने के साथ पूर्वोत्तर क्षेत्र विकास के मार्ग पर बढ़ गया है। क्षेत्र में 2014 से बजटीय आवंटन में काफी बढ़ोतरी देखी गयी है और तब से क्षेत्र के लिए चार लाख करोड़ रुपये से अधिक राशि आवंटित की गयी है। पूर्वोत्तर क्षेत्र विकास मंत्रालय की योजनाओं के तहत पिछले चार साल में वास्तविक व्यय 7,534.46 करोड़ रुपये रहा, वहीं अगले चार साल में 2025-26 तक खर्च के लिए 19,482.20 करोड़ रुपये उपलब्ध हैं।

अब के सभी प्रधानमंत्रियों में मोदी ने की सबसे अधिक पूर्वोत्तर राज्यों की यात्रा
वे जोर देकर कहते हैं कि एक अनुमान के मुताबिक़ देश की आजादी के बाद सभी प्रधानमंत्री पूर्वोत्तर राज्यों के दौरे पर जितनी बार गए हैं, प्रधानमंत्री बनने के बाद मोदी अकेले उससे अधिक बार पूर्वोत्तर के राज्यों का दौरा कर चुके हैं। इसके अलावा उनकी ‘एक्ट ईस्ट’ विदेश नीति का लाभ पूर्वोत्तर के राज्यों को ही मिलना है। भारत-म्यांमार-थाइलैंड सुपर हाईवे इसी का नतीजा है। साथ ही, पूर्वोत्तर के लिए अलग टाइम जोन की मांग पर भी अब विचार किया जा रहा है।
पिछली सरकारों की तुलना में पहली बार सबसे अधिक दिया गया पूर्वोत्तर भारत पर ध्यान
पूर्वोत्तर को लेकर एक बात बिना किसी हिचक के हमें स्वीकारनी होगी कि देश के इस हिस्से के प्रति शेष देश में सहज अपनत्व की भावना कम ही रही है। दुर्भाग्यवश आजाद भारत की कांग्रेसी सरकारों द्वारा न तो पूर्वोत्तर राज्यों के आर्थिक विकास के लिए ठोस जमीनी प्रयास किये गए और न ही उनके सामरिक महत्व की पहचान करने पर ही ध्यान दिया गया। हालांकि नरेंद्र मोदी की सरकार बनने के बाद पूर्वोत्तर की तरफ धीरे-धीरे ध्यान दिया जाने लगा है। कुल मिलाकर आज पूर्वोत्तर को लेकर दिल्ली की सोच में परिवर्तन आ रहा है। अब दिल्ली के लिए पूर्वोत्तर और उसके मुद्दे महत्वपूर्ण होते जा रहे हैं। अच्छी बात यह भी है कि वहाँ उग्रवाद में कमी भी देखने को मिल रही, जिस कारण वर्ष २०१५ में त्रिपुरा से तो इस वर्ष मेघालय से अफस्पा पूरी तरह से हटा दिया गया है। उम्मीद करते हैं कि पूर्वोत्तर में बदलाव की ये बयार और तेज होगी तथा उसके शेष राज्य भी शीघ्र ही उग्रवाद तथा अफस्पा से मुक्त होकर एक स्वस्थ वातावरण में देश के विकास के साथ कदमताल कर सकेंगे।(एएमएपी)



