आपका अखबार ब्यूरो ।
“यह एक गलत धारणा है कि भारत का नाम राजा दुष्यंत और शकुंतला के पुत्र भरत के नाम पर पड़ा। भारत नाम इससे भी ज्यादा प्राचीन है। एक सभ्यतागत राष्ट्र के रूप में भारत की पहचान बहुत पुरानी है।” यह बात प्रसिद्ध लेखक और प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद् के सदस्य डॉ. संजीव सान्याल ने इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र द्वारा 27 दिसंबर, मंगलवार को आयोजित पद्मविभूषण डॉ. कपिला वात्स्यायन स्मारक व्याख्यान में कही। व्याख्यान का विषय था- “भारतवर्ष: हमारी सभ्यता की पहचान का इतिहास”। गौरतलब है कि डॉ. कपिला वात्स्यायन इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र की संस्थापक सदस्य सचिव थीं।
कार्यक्रम के प्रारम्भ में आईजीएनसीए के कलानिधि विभाग के विभागाध्यक्ष एवं नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा के निदेशक प्रोफेसर रमेश चन्द्र गौड़ ने विषय की प्रस्तावना रखी और मुख्य वक्ता डॉ. संजीव सान्याल का परिचय दिया। कार्यक्रम की अध्यक्षता इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के सदस्य सचिव डॉ. सच्चिदानंद जोशी जी ने की। अपने विद्वतापूर्ण व्याख्यान में डॉ. संजीव सान्याल ने भारत के नामकरण और इस सभ्यता के विकास की कहानी वैदिक एवं पौराणिक ग्रंथों में मौजूद तथ्यों के आधार पर बताई। डॉ. सान्याल ने कहा कि भारत और सरस्वती नदी का सम्बंध बहुत महत्त्वपूर्ण है। सरस्वती नदी को अक्सर भारती भी कहा जाता है। ऋग्वेद के पैंतालीस सूक्तों में सरस्वती नदी की प्रशंसा की गई है और ऋग्वेद में 72 बार सरस्वती नदी का नाम आया है। भारत के नामकरण का आधार एक वैदिक जनजाति भरत-तृत्सु थी, जो सरस्वती नदी के तट पर निवास करती थी। इस जनजाति का उल्लेख ऋग्वेद में किया गया है।

डॉ. संजीव सान्याल ने कहा कि एक सभ्यतागत राष्ट्र के रूप में भारत का विचार स्पष्ट रूप से बहुत प्राचीन है, लेकिन यह जड़ या कठोर नहीं है, बल्कि विकासशील है। यह व्यापार, प्रवासन (माइग्रेशन), विदेशी आक्रमणों और विचारों के आदान-प्रदान के जरिये आए विदेशी प्रभावों सहित कई नए विचारों को शामिल कर हजारों वर्षों में विकसित हुआ है। उन्होंने कहा कि भारत गणराज्य के संस्थापक इस बात से अच्छी तरह परिचित थे कि यह एक प्राचीन सभ्यतागत राष्ट्र की आधुनिक अभिव्यक्ति है। डॉ. सान्याल के भाषण के दौरान मंच पर उपस्थित संस्कृत के तीन विद्वानों ने उन श्लोकों का पाठ भी किया, जिनके आधार पर वह अपनी बात कह रहे थे।
कार्यक्रम के अंत में डॉ. सच्चिदानंद जोशी ने कहा कि भारत की पहचान केवल एक भौगोलिक इकाई के तौर पर नहीं है, बल्कि इसकी पहचान सभ्यतागत और सांस्कृतिक भी है। इस बात के समर्थन में उन्होंने कई प्रामाणिक पुस्तकों का उल्लेख भी किया। डॉ. जोशी ने विद्वतापूर्ण व्याख्यान के लिए डॉ. संजीव सान्याल को धन्यवाद दिया और इस व्याख्यान को सुनने आए श्रोताओं को भी धन्यवाद दिया।



