डॉ. मयंक चतुर्वेदी।
भारत की सामरिक शक्ति और वैज्ञानिक आत्मनिर्भरता के इतिहास में एक और गौरवपूर्ण अध्याय छह फरवरी के दिन जुड़ गया है। ओडिशा के चांदीपुर स्थित एकीकृत परीक्षण रेंज (आईटीआर) से मध्यम दूरी की बैलिस्टिक मिसाइल ‘अग्नि-3’ का सफल परीक्षण किया गया। सामरिक बल कमान (एसएफसी) के तत्वावधान में हुए इस परीक्षण ने एक बार फिर यह सिद्ध कर दिया कि भारत आज तकनीकी क्षमता के मामले में भी दुनिया के अग्रणी देशों में अपनी जगह बना चुका है।
भरोसे और शक्ति का प्रतीक
अग्नि-3 को मध्यम दूरी की बैलिस्टिक मिसाइलों का एक शक्तिशाली स्तंभ माना जाता है। लगभग 3,500 किलोमीटर की दूरी तय कर लक्ष्य को सटीकता से भेदने वाली इस मिसाइल ने सभी परिचालन और तकनीकी मापदंडों पर खरा उतरकर देश के वैज्ञानिकों और सैनिकों के आत्मविश्वास को और मजबूत किया है। लगभग 50 टन वजनी यह मिसाइल 2.5 टन तक का पेलोड ले जाने में सक्षम है और इसे आधुनिक नेविगेशन प्रणालियों से लैस किया गया है।
अग्नि-3 एक न्यूक्लियर क्षमता वाली इंटरमीडिएट-रेंज बैलिस्टिक मिसाइल है। इससे भारत दुश्मन देश के अंदरूनी इलाकों में रणनीतिक ठिकानों को निशाना बना सकता है। हालिया परीक्षण में इसका प्रदर्शन पूरी तरह सफल रहा। कैनिस्टर आधारित लॉन्च प्रणाली के कारण यह मिसाइल अधिक सुरक्षित, मोबाइल और त्वरित तैनाती के लिए उपयुक्त मानी जाती है। सामरिक बल कमान के लिए यह एक भरोसेमंद हथियार के रूप में स्थापित हो चुकी है। यह लॉन्च स्ट्रैटेजिक फोर्सेज कमांड की निगरानी में हुआ, जो भारत की महत्वपूर्ण सैन्य ताकत का जिम्मा संभालती है। शुक्रवार को किए गए इस परीक्षण से साफ है कि भारत की स्ट्रैटेजिक डिटरेंस क्षमता पूरी तरह मजबूत और भरोसेमंद है।

इससे पहले भारत ने ‘अग्नि-5’ बैलिस्टिक मिसाइल का सफल परीक्षण किया था। भारत ने बीते वर्ष अपनी अत्याधुनिक मध्यम दूरी की बैलिस्टिक मिसाइल ‘अग्नि-5’ का सफल परीक्षण किया था। यह परीक्षण देश की मिसाइल क्षमता में एक बड़ी कामयाबी थी। ‘अग्नि-5’ मिसाइल की मार्गदर्शन प्रणाली, प्रणोदन, चरण विभाजन (स्टेज सेपरेशन), और अंतिम सटीकता (टर्मिनल एक्युरेसी) जैसे सभी पहलुओं को परखा और प्रमाणित किया गया था। ‘अग्नि-5’ की प्रमुख विशेषताओं की बात करें तो यह मध्यम दूरी की बैलिस्टिक मिसाइल है। इसकी मारक क्षमता 5,000 किलोमीटर से भी अधिक है। यानी यह मिसाइल इतनी दूरी तक के लक्ष्य भेदने में सक्षम है।
स्वदेशी संकल्प और मिसाइल क्रांति
दरअसल, इस परीक्षण ने उस लंबी और प्रेरणादायक यात्रा की पुनः पुष्टि थी, जिसकी शुरुआत 1980 के दशक में हुई थी। जब भारत ने स्वदेशी तकनीक के सहारे अपनी मिसाइल क्षमता विकसित करने का संकल्प लिया, तब शायद ही किसी ने कल्पना की होगी कि एक दिन “अग्नि श्रृंखला” भारत की सामरिक शक्ति का प्रतीक बन जाएगी।
भारत की मिसाइल शक्ति की नींव 1980 के दशक में एकीकृत निर्देशित मिसाइल विकास कार्यक्रम (आईजीएमडीपी) से हुई। इस ऐतिहासिक कार्यक्रम के सूत्रधार डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम रहे, जिन्हें पूरे देश में ‘मिसाइल मैन ऑफ इंडिया’ के नाम से जाना जाता है। उनका सपना था कि भारत तकनीक के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बने और अपनी सुरक्षा के लिए किसी पर निर्भर न रहे। इसी कार्यक्रम के तहत ‘अग्नि’ श्रृंखला का जन्म हुआ। 22 मई, 1989 को अग्नि मिसाइल की पहली परीक्षण उड़ान ने भारत के वैज्ञानिक इतिहास में एक नया युग शुरू किया। उस दिन से लेकर आज तक, अग्नि परिवार ने लगातार अपनी क्षमता और विश्वसनीयता का परिचय दिया है।

निरंतर प्रगति
अग्नि श्रृंखला प्रणाली ने समय के साथ अपने कई उन्नत संस्करण विकसित किए हैं। अग्नि-1, अग्नि-2, अग्नि-3, अग्नि-4 और अग्नि-5, प्रत्येक संस्करण भारत की बढ़ती तकनीकी क्षमता और रणनीतिक दूरदर्शिता का प्रतीक है। अग्नि-1, जिसकी मारक क्षमता लगभग 700 से 1,200 किलोमीटर तक है, भारतीय सेना की सामरिक शक्ति का आधार स्तंभ बन चुका है। इसका पहला परीक्षण 1989 के बाद के शुरुआती वर्षों में हुआ और 2002 से 2021 के बीच इसके 10 से अधिक सफल परीक्षण किए जा चुके हैं।
अग्नि-2, जिसकी रेंज 2,000 से 3,000 किलोमीटर तक है, का पहला परीक्षण 1999 में हुआ था। इसके बाद से अब तक 15 से अधिक बार इसका सफल परीक्षण हो चुका है। 2022 में हुए नाइट ट्रायल ने इसकी रात में संचालन की क्षमता को भी सिद्ध कर दिया। अग्नि-3, जो आज फिर चर्चा में है, पहली बार नौ जुलाई, 2006 को परीक्षण के लिए उड़ाई गई थी। तब से लेकर अब तक इसके लगभग 10 से अधिक प्रमुख परीक्षण हो चुके हैं। शुरुआती दौर में कुछ तकनीकी चुनौतियाँ भी सामने आईं, लेकिन डीआरडीओ के वैज्ञानिकों ने हर असफलता से सीखकर इसे और बेहतर बनाया।
अग्नि-4, जिसकी मारक क्षमता लगभग 4,000 किलोमीटर है, के भी 6 से अधिक सफल परीक्षण किए जा चुके हैं। वहीं, अग्नि-5 ने 5,000 से 8,000 किलोमीटर तक की दूरी तय करने की क्षमता दिखाकर भारत को अंतरमहाद्वीपीय मिसाइल क्षमता वाले देशों की श्रेणी में ला खड़ा किया है। इस तरह से अग्नि परिवार के विभिन्न संस्करणों के अब तक 50 से अधिक परीक्षण हो चुके हैं।
तकनीक और आत्मनिर्भरता का संगम
अग्नि श्रृंखला की सफलता के पीछे केवल शक्ति ही नहीं, बल्कि अत्याधुनिक तकनीक का योगदान भी है। रिंग लेजर जायरो नेविगेशन, फाइबर ऑप्टिक जायरो सिस्टम और मल्टी-स्टेज रॉकेट इंजन जैसी उन्नत प्रणालियों ने इसे अत्यंत सटीक और विश्वसनीय बनाया है। ठोस ईंधन से संचालित यह मिसाइल कम समय में लक्ष्य तक पहुंचने की क्षमता रखती है। सबसे गर्व की बात यह है कि इन मिसाइलों में लगभग 90 प्रतिशत तकनीक स्वदेशी है। यह ‘आत्मनिर्भर भारत’ के उस सपने को साकार करता है, जिसकी नींव दशकों पहले रखी गई थी।
राष्ट्रीय सुरक्षा का मजबूत कवच
अग्नि श्रृंखला भारत के न्यूक्लियर ट्रायड का महत्वपूर्ण हिस्सा है, जिसमें भूमि, समुद्र और वायु, तीनों माध्यमों से सुरक्षा सुनिश्चित की जाती है। यह केवल शक्ति का प्रदर्शन नहीं, बल्कि संतुलन और शांति बनाए रखने का एक माध्यम भी है। भारत की नीति हमेशा से ‘नो फर्स्ट यूज’ की रही है। इसका मतलब है कि भारत किसी पर पहले हमला करने में विश्वास नहीं रखता, लेकिन अपनी सुरक्षा के लिए पूरी तरह तैयार है। अग्नि श्रृंखला इसी नीति को मजबूती देती है।
भविष्य की ओर बढ़ता भारत
भारत अब अग्नि-प्राइम और अग्नि-6 जैसी अगली पीढ़ी की मिसाइलों की दिशा में भी आगे बढ़ रहा है। यह सामरिक शक्ति का विस्तार होने के साथ ही भारत के लिए तकनीकी उत्कृष्टता की ओर एक कदम है। हर नया परीक्षण यह संदेश देता है कि भारत शांति का समर्थक है, लेकिन अपनी सुरक्षा के लिए पूरी तरह सक्षम और तैयार भी है। अंततः अग्नि की यह अजेय उड़ान यात्रा अभी जारी है, और हर नई उड़ान भारत को एक नई ऊंचाई तक ले जा रही है।
(लेखक ‘हिन्दुस्थान समाचार’ के मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, गुजरात और राजस्थान के क्षेत्रीय संपादक हैं)



