खामेनेई नहीं,इस्लामी राज के खिलाफ है यह प्रदर्शन।

#pradepsinghप्रदीप सिंह।
ईरान में जो कुछ हो रहा है उस पर पूरी दुनिया की नजर है। इसकी शुरुआत 2022 में माशा अमीनी की हत्या के बाद हिजाब और खुले बाल रखने के विरोध में हुए प्रदर्शनों से हुई। उसके बाद ईरान की खामेनेई सरकार ने करीब 500 लोगों की हत्या की। उन प्रदर्शनों में करीब 20,000 लोग घायल भी हुए थे। कुछ समय बाद लगा कि यह आंदोलन दब गया है पर ऐसा हुआ नहीं।कोई भी व्यवस्था हो,जनतांत्रिक या अधिनायकवादी वह विरोध तो झेल सकती है,लेकिन एक बार जब बहुसंख्यक आबादी का विश्वास उठ जाए फिर उसको नियंत्रित करना लगभग असंभव हो जाता है। इस समय ईरान में जो आंदोलन चल रहा है,उसमें आपको क्या दिख रहा है। लड़कियां खामेनेई के पोस्टर से सिगरेट जला रही हैं, यह कुछ साल पहले तक ईरान और इस्लामी देशों में अकल्पनीय था। इसके अलावा लोग ईरान का झंडा जलाते हुए सड़कों पर देखे जा सकते हैं। ईरान की सबसे प्रख्यात अल मसूर मस्जिद को प्रदर्शनकारियों ने आग के हवाले कर दिया। इस्लामी राज में कोई मस्जिद आग के हवाले कर दी जाए,ऐसी कितनी घटनाएं दुनिया में हुई हैं। इससे ईरान में जो हो रहा है, उसकी गंभीरता को समझिए। प्रदर्शनकारी कह रहे हैं कि नागरिकता का मतलब यह नहीं है कि हम एक मजहबी व्यवस्था के आज्ञाकारी बन जाएं। जैसा कहा जाए वैसा ही करें। हमारी मर्जी का कोई अर्थ न रहे। महिलाओं का कहना है कि हमको आप मजहब के आधार पर मैनेज नहीं कर सकते। हम कैसे रहेंगे, कैसा जीवन जिएंगे,क्या करेंगे,यह मजहब नहीं तय कर सकता। सीधा सा मतलब है कि मजहबी व्यवस्था को चुनौती दी जा रही है।

अब जरा ईरान के बारे में जान लीजिए। ईरान में इस्लाम सातवीं शताब्दी में आया। अरब से निकलकर इस्लाम सबसे पहले ईरान पहुंचा। ईरान को उस समय फारस कहा जाता था। यहां के रहने वाले लोग अग्नि पूजक थे और पर्शियन कहे जाते थे। वहां पारसी मजहब के मानने वालों को चुन-चुन कर मारा गया। आज ईरान में कोई पारसी नहीं बचा है। जो जान बचा पाए वे नाव से भागकर भारत आए। भारत में उन्हें गुजरात में शरण मिली और उनको फलने फूलने का पूरा मौका दिया गया। हालांकि गुजरात में हिंदुओं के एक वर्ग ने उनका विरोध किया लेकिन पारसियों ने कहा कि आप बिल्कुल निश्चिंत रहिए। हम दूध में शक्कर की तरह रहेंगे। आपके समाज में घुलमिल जाएंगे। कहीं कोई विरोध का स्वर नहीं होगा। उसका नतीजा यह हुआ कि होमी जहांगीर भाभा से लेकर जेआरडी टाटा और रतन टाटा तक एक के बाद एक नाम लेते जाइए भारत में जितने बड़े वैज्ञानिक और उद्योगपति हुए हैं, उनमें पारसी सबसे आगे मिलेंगे। उन्होंने भारत के विकास में बहुत बड़ा योगदान दिया है। लेकिन अपने देश में वे नहीं जा सकते। अपने देश से उनका सफाया हो गया। इस्लाम के कब्जे से पहले ईरान भी भारत की तरह एक मल्टीकल्चरल सोसाइटी थी,लेकिन इस्लाम के मानने वालों ने धीरे-धीरे इस पर कब्जा कर लिया। ईरान में इस्लाम के प्रसार में सूफियों ने सबसे बड़ी और महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। जिनके बारे में भारत में बड़ी गलतफहमी है कि ये लोग बड़े नरमपंथी होते हैं। मोइनुद्दीन चिश्ती सूफी संत माने जाते हैं। राजस्थान के अजमेर में उनकी दरगाह है। उनकी हिंदुओं के धर्म परिवर्तन में बहुत बड़ी भूमिका रही है। सूफी संत एक तरह से अरब में मुस्लिम शासकों के लिए जासूस का काम करते थे। यहां व्यापार के बहाने आते थे। राजाओं के बारे में कहां सेना है,कितनी सेना है,कौन कमजोर है,कौन मजबूत है,कहां से आक्रमण हो सकता है आदि सूचनाएं देते थे। मोइनुद्दीन चिश्ती के बारे में कहा जाता है कि उन्होंने एक साथ 90 लाख हिंदुओं का धर्मांतरण कराया था। तो 11वीं शताब्दी तक ईरान पर पूरी तरह से इस्लाम का कब्जा हो गया और 1979 में शाह को सत्ता से हटाकर इस्लामी क्रांति हुई और इस्लामी शासन स्थापित हुआ। तब से ईरान में इस्लामी शासन कायम है। लेकिन आज जो हो रहा है वह खामेनेई के खिलाफ विद्रोह नहीं है। यह दरअसल इस्लामिक राज के खिलाफ विद्रोह है। ईरान में आज न केवल इस्लामी मजहब का झंडा जलाया जा रहा है बल्कि पुरानी सभ्यता संस्कृति जो अग्नि देवता की पूजा करती थी, उसके प्रतीक वाले झंडे फहराए जा रहे हैं। इन प्रदर्शनों में 20 से 25 हजार तक लोगों के मारे जाने की बात कही जा रही है। यह मामला अब केवल ईरान तक सीमित नहीं है। मुसलमान इस्लाम से ऊब रहा है,इसके संकेत दुनिया के कई देशों से मिल रहे हैं। लंबे समय से लोग कह रहे हैं कि इस्लाम में रिफॉर्म की जरूरत है। ये जिस कालखंड का मजहब था,आज उसकी ज्यादा रेलेवेंस नहीं रह गई है। आज इस्लाम का विरोध इस्लाम के मानने वालों के बीच से हो रहा है। सऊदी अरब के प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान इस समय दुनिया में सबसे बड़े इस्लामिक रिफॉर्मर के तौर पर सामने आए हैं। आज सऊदी अरब में लड़कियों को ड्राइविंग लाइसेंस मिल रहा है। वे क्लब जाती हैं, नौकरी करती हैं। सऊदी अरब में एक्स मुस्लिम आंदोलन चल रहा है। एक अनुमान है कि 5 से 10 फीसदी मुस्लिम इस्लाम छोड़ चुके हैं। उधर,यूनाइटेड अरब एमिरेट्स सरकार ने यह घोषणा की है कि वह अपने युवकों को पढ़ाई के लिए लंदन नहीं भेजेगा। आप कारण सुनेंगे तो चौंक जाएंगे। वे कह रहे हैं हमारे जो युवक लंदन जाते हैं, उनको आतंकवादी बनाया जाता है। उनका इनडॉक्ट्रिनेशन होता है। यह बात भारत में कोई बोल सकता है क्या? हाल ही में जो लाल किले पर ब्लास्ट हुआ,उसमें अलफला यूनिवर्सिटी का डाक्टर शामिल था। जिनको भारत सरकार और भारत के लोगों की गाढ़ी कमाई के पैसे से पढ़ाया जाता है। वे इस देश में बम ब्लास्ट कर रहे निर्दोष लोगों को मार रहे हैं। तुर्की जहां खलीफा का राज था,वहां मुस्लिम आबादी 98% से घटकर 95% पर आ गई। 4% ऐसे मुसलमान हैं,जो अपने को नॉन मुस्लिम कहते हैं। एक सर्वे के मुताबिक तुर्की के 73 फीसदी युवा कह रहे हैं कि उनकी मजहब में कोई रुचि नहीं है। इंडोनेशिया में अब फिर से भारतीय संस्कृति के प्रति अनुराग दिखाई दे रहा है। इंडोनेशिया में आज भी रामलीला होती है। उनकी करेंसी रुपैया पर लक्ष्मी जी की मूर्ति है। इंडोनेशिया के बारे में कहा जाता है कि वहां सबसे अधिक लोगों ने इस्लाम को छोड़ा है। एक छोटा सा देश है ट्यूनेशिया। जिसने इस्लाम से पूरी तरह मुक्ति पा ली। अब कहा जाता है कि वहां बड़ी शांति है। पाकिस्तान में 4 लाख एक्स मुस्लिम सोशल मीडिया पर एक्टिव हैं। लेकिन भारत में क्या स्थिति है? भारत में इस्लामी कट्टरता दिन पर दिन बढ़ती जा रही है।

अभी हाल ही में आपने देखा कि तमिलनाडु का कार्तिक दीपम समारोह को नहीं होने दिया गया। मध्य प्रदेश के भोजशाला में भी नमाज और पूजा को लेकर लंबे समय से विवाद चल रहा है। खुद को सेकुलर बताने वाले नेता भारत में इस्लामी कट्टरवाद को संरक्षण दे रहे हैं। एक से एक लैंड जिहाद के केस सामने आ रहे हैं। हजार साल पुराने मंदिरों तक को वक्फ की प्रॉपर्टी घोषित कर दिया जा रहा है। कितनी ही जगहों पर अवैध मजारें बनी हुई हैं। भारत-नेपाल की सीमा से लगे इलाके में अवैध रूप से बनी मस्जिदों की भरमार थी, जिनको योगी सरकार ने अभियान चलाकर गिरवाने का काम किया। तो देखिए कि कानूनी रूप से जो किया जा सकता था, पिछले 79 सालों में वह भी नहीं हो रहा था। 500 साल से ज्यादा की लड़ाई लड़कर हमको अयोध्या में राम जन्म स्थान पर मंदिर बनाने का अवसर मिला, लेकिन आज भी हम काशी और मथुरा के लिए लड़ रहे हैं। देश में कानून बन गया है कि हिंदू अपने धर्मस्थलों के स्थान को पाने के लिए अदालत का भी दरवाजा नहीं खटखटा सकते, लेकिन मुसलमान जुमे की नमाज अदा करने के लिए सुप्रीम कोर्ट जा सकता है। ईरान में जो इस्लाम के मानने वालों को दिख रहा है, वह भारत में सेकुलर हिंदुओं को नहीं दिख रहा है। इससे आप अंदाजा लगा लीजिए कि भारत का भविष्य क्या होने वाला है। इन सब बातों के बावजूद ईरान में जो कुछ हो रहा है वह एक ही बात की ओर इशारा कर रहा है कि ईरान जैसे इस्लामी देश से इस्लाम के जाने की आशंका दिन पर दिन बढ़ती जा रही है।

(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)