इस सीट का कॉस्मोपॉलिटन कैरेक्टर मुख्यमंत्री के लिए मुफीद नहीं।
प्रदीप सिंह।पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव चल रहा है। इसमें कौन जीत रहा है और कौन हार रहा है,इससे थोड़ा अलग विषय पर मैं अपनी बात रख रहा हूं। 2021 का विधानसभा चुनाव ममता बनर्जी नंदीग्राम से लड़ी थीं और उनके खिलाफ भाजपा ने शुभेंदु अधिकारी को खड़ा किया था। तब शुभेंदु अधिकारी ताजाताजा भाजपा में आए थे, इसके बावजूद उन्होंने 10 साल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को हरा दिया था। अब इससे बड़ा झटका किसी भी मुख्यमंत्री के लिए और क्या हो सकता है? उसके बाद ममता ने भवानीपुर सीट से जीते अपनी पार्टी के विधायक को इस्तीफा दिलाया और वहां से उपचुनाव जीतकर विधानसभा पहुंचीं और अपना मुख्यमंत्री पद बचाया। लेकिन ऐसे भाग्यशाली सब लोग नहीं होते।
इस तरह की घटनाओं की शुरुआत उत्तर प्रदेश से होती है। उत्तर प्रदेश में अक्टूबर 1970 में त्रिभुवन नारायण सिंह संयुक्त विधायक दल के मुख्यमंत्री बने। जब उन्होंने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली तब वह किसी सदन के सदस्य नहीं थे। पद पर बने रहने के लिए उन्हें 6 माह के भीतर चुनाव लड़कर जीतना था। तो त्रिभुवन नारायण सिंह के लिए सीट की खोज शुरू हुई। चूंकि उस समय कोई सीट खाली नहीं थी तो महंत अवैद्यनाथ ने अपनी सीट मानीराम से इस्तीफा दे दिया।
त्रिभुवन नारायण सिंह वहां से उपचुनाव लड़े। कांग्रेस ने उनके खिलाफ रामकृष्ण द्विवेदी को उम्मीदवार बनाया। इस चुनाव को कांग्रेस ने ठाकुर बनाम ब्राह्मण का रंग दे दिया। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी खुद उस चुनाव में प्रचार करने आईं। उन्होंने रामकृष्ण द्विवेदी की जीत को अपनी प्रतिष्ठा का सवाल बना लिया। नतीजा यह हुआ कि रामकृष्ण द्विवेदी जीत गए और त्रिभुवन नारायण सिंह चुनाव हार गए। उनको अप्रैल 1971 में इस्तीफा देना पड़ा और इस तरह से वह सरकार गिर गई। त्रिभुवन नारायण सिंह देश के पहले ऐसे मुख्यमंत्री बने जो मुख्यमंत्री रहते हुए अपनी विधानसभा सीट हार गए।
उसके बाद इस तरह के और भी किस्से हुए। 2012 में भाजपा ने भुवनचंद खंडूरी को उत्तराखंड का मुख्यमंत्री बनाया। उसी वर्ष हुए उत्तराखंड विधानसभा के चुनाव में वह राज्य की कोटद्वार सीट से उतरे। हालांकि उनको वहां से लड़ने से मना किया गया था, लेकिन उन्होंने जिद की कि इसी सीट से लड़ेंगे और चुनाव हार गए। उनका केवल मुख्यमंत्री पद ही नहीं गया बल्कि राज्य में पार्टी की सरकार भी नहीं बन पाई। उस चुनाव में कांग्रेस और भाजपा के बीच सिर्फ एक या दो सीट का अंतर था। अगर भुवन चंद्र खंडूरी अपनी सीट जीत जाते तो भाजपा को एक और सीट मिलती और उसकी सरकार बनती लेकिन ऐसा हो नहीं पाया। सरकार कांग्रेस पार्टी की बनी। तो अब आप समझिए कि मुख्यमंत्री का अपनी सीट हार जाना कितना बड़ा जोखिम वाला मामला होता है। आमतौर पर ऐसा होता नहीं, लेकिन ऐसा होगा नहीं इसकी कोई गारंटी नहीं है। इसी तरह उत्तराखंड में 2022 के चुनाव में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी अपनी सीट हार गए, लेकिन पार्टी ने उनका साथ दिया और उनको उपचुनाव लड़वाया। वह उपचुनाव जीत गए और मुख्यमंत्री अब भी बने हुए हैं।
तो मुख्यमंत्री रहते हुए 2021 में चुनाव हार जाने वाली ममता बनर्जी पहली मुख्यमंत्री नहीं थीं। लेकिन मैं यह सब इसलिए बता रहा हूं इस बार जब पश्चिम बंगाल में चुनाव हो रहा है तो नंदीग्राम जाने की हिम्मत ममता बनर्जी नहीं जुटा पाईं। शुभेंदु अधिकारी नंदीग्राम से फिर चुनाव लड़ रहे हैं। ममता बनर्जी भवानीपुर सीट से चुनाव मैदान में उतरी हैं और भाजपा ने यहां से भी उनके खिलाफ शुभेंदु को खड़ा कर दिया है। 2021 में शुभेंदु अधिकारी भाजपा के पश्चिम बंगाल में सबसे बड़े नेता नहीं थे और उनके मुख्यमंत्री बनने की भी संभावना नहीं थी। इस बार शुभेंदु पश्चिम बंगाल में भाजपा के सबसे बड़े नेता हैं और भाजपा अगर सत्ता में आती है तो उनका मुख्यमंत्री बनना लगभग तय माना जा रहा है। यानी इस बार भवानीपुर में उनकी मुख्यमंत्री को सीधी चुनौती है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी जब 2021 में शुभेंदु से हारी थीं तब उनके खिलाफ 10 साल की एंटी इनकंबेंसी थी। अब 15 साल की है। तो इससे आप समझ सकते हैं कि ममता के लिए इसबार भवानीपुर से जीतना इतना आसान नहीं होगा। पश्चिम बंगाल के इस चुनाव को भाजपा ने सीधे-सीधे ममता बनर्जी बनाम शुभेंदु अधिकारी बना दिया है। भवानीपुर में भाजपा 5 साल से काम कर रही है। भवानीपुर निर्वाचन क्षेत्र का कैरेक्टर कॉस्मोपॉलिटन है। वह बंगाली बहुल इलाका नहीं है। वहां गुजराती, पंजाबी, उत्तर प्रदेश-बिहार वाले और दूसरे लोग भी हैं। वहां मुस्लिम पापुलेशन उतनी ज्यादा नहीं है और उसके अलावा एसआईआर में बड़ी संख्या में वोट कटे हैं। यह सब मिलाकर बताता है कि भवानीपुर में ममता बनर्जी की राह बहुत आसान नहीं है। तो इसलिए मैं कह रहा हूं कि क्या ममता बनर्जी इतिहास बनाकर सत्ता से बाहर जाएंगी। मुख्यमंत्री रहते हुए लगातार दो बार विधानसभा चुनाव हारने वाली वह भारत की पहली नेता बन जाएंगी और चुनाव हारकर सत्ता से बाहर जाने वाली तीसरी नेता बन जाएंगी।
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ममता बनर्जी अगर भवानीपुर से हार जाती हैं तो यह मामला केवल एक विधानसभा क्षेत्र का नहीं होगा। यह तृणमूल कांग्रेस की राजनीति के लिए सबसे बड़ा झटका होगा। आप मान कर चलिए अगर ममता बनर्जी भवानीपुर सीट हार रही हैं तो वह सत्ता में नहीं आ रही है। भवानीपुर अगर भाजपा जीतती है तो यह पश्चिम बंगाल की राजनीति में उसके प्रभुत्व की घोषणा होगी। यहीं कालीघाट इलाके में ममता बनर्जी का पैतृक आवास है। वहीं आज भी वह रहती हैं। वहां से ममता बनर्जी का हारना तृणमूल कांग्रेस के लिए बहुत बड़ा झटका होगा। मुझे लगता है कि ममता बनर्जी लगातार दूसरी बार विधानसभा चुनाव हारकर सत्ता से बाहर हो जाएं तो कोई आश्चर्य नहीं है। लेकिन उसके लिए 4 मई का तो इंतजार करना ही पड़ेगा।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)
ममता बनर्जी अगर भवानीपुर से हार जाती हैं तो यह मामला केवल एक विधानसभा क्षेत्र का नहीं होगा। यह तृणमूल कांग्रेस की राजनीति के लिए सबसे बड़ा झटका होगा। आप मान कर चलिए अगर ममता बनर्जी भवानीपुर सीट हार रही हैं तो वह सत्ता में नहीं आ रही है। भवानीपुर अगर भाजपा जीतती है तो यह पश्चिम बंगाल की राजनीति में उसके प्रभुत्व की घोषणा होगी। यहीं कालीघाट इलाके में ममता बनर्जी का पैतृक आवास है। वहीं आज भी वह रहती हैं। वहां से ममता बनर्जी का हारना तृणमूल कांग्रेस के लिए बहुत बड़ा झटका होगा। मुझे लगता है कि ममता बनर्जी लगातार दूसरी बार विधानसभा चुनाव हारकर सत्ता से बाहर हो जाएं तो कोई आश्चर्य नहीं है। लेकिन उसके लिए 4 मई का तो इंतजार करना ही पड़ेगा।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)



