भारत शामिल हुआ तो करना होगा स्ट्रेटेजिक ऑटोनॉमी से समझौता।

#pradepsinghप्रदीप सिंह।
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक पीस बोर्ड बनाया है। इसमें जो देश स्थाई सदस्यता चाहते हैं उनको एक बिलियन डॉलर देना पड़ेगा। अब जो देश सदस्यता के लिए यह धनराशि देंगे,उस इकट्ठा पैसे का क्या होगा,यह किसी को मालूम नहीं। इस बोर्ड का स्वरूप क्या होगा,यह तक किसी को मालूम नहीं है। अभी तक जो बातें सामने आई है उससे लगता है कि इस बोर्ड में डोनाल्ड ट्रंप के पास वीटो पावर होगी। ट्रंप आजीवन इसके चेयरमैन रहेंगे। अमेरिका के राष्ट्रपति पद से हटने के बाद भी। अब सवाल यह है कि अमेरिका में जो नया राष्ट्रपति आएगा, वह इस बोर्ड में रहना चाहेगा कि नहीं? इस बोर्ड को चलाना चाहेगा कि नहीं?जिन देशों को सदस्य बनने के लिए ट्रंप ने आमंत्रित किया है,उनमें भारत का भी नाम है। भारत ने अभी कोई जवाब नहीं दिया है। भारत के अलावा चीन और रूस ने भी अभी तक कोई फैसला नहीं किया है, जबकि फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुअल मैक्रो ने साफ-साफ इसमें शामिल होने से मना कर दिया है। इसके अलावा नॉर्वे,स्वीडन और स्लोवानिया ने भी कहा है कि वे सदस्य नहीं बनेंगे। नाटो के भी ज्यादातर देशों ने अभी चुप्पी साध रखी है,लेकिन जो मुस्लिम देश हैं सऊदी अरब,कतर,बहरीन आदि वे सब इसके सदस्य बन गए हैं। पाकिस्तान और तुर्की भी इसमें शामिल होने को तैयार हो गए हैं। इस बोर्ड में होने के कारण पाकिस्तान अपनी फौज भी तैनात करने को तैयार हो गया है। हालांकि अपने घर में उसे इसका नुकसान उठाना पड़ेगा। कंगाल पाकिस्तान एक बिलियन डॉलर कहां से देगा,यह भी बड़ा सवाल है। हो सकता है उसका दोस्त सऊदी अरब दे दे या फिर ट्रंप उसे माफ कर दें। यह भी हो सकता है। लेकिन सवाल इस सब का नहीं है। ट्रंप आजकल जिस तरह के काम कर रहे हैं उससे संदेश दे रहे हैं कि वह इस दुनिया के सम्राट हैं। दुनिया के किसी भी देश में वे जो चाहेंगे वह होगा। जिस देश पर चाहेंगे कब्जा कर लेंगे। जिस देश को झुकाना चाहेंगे झुका लेंगे। चंद दिन पहले न्यूयॉर्क टाइम्स को दिए एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा था कि मुझे मेरी मोरलिटी और मेरा दिमाग ही रोक सकता है। उसके अलावा कोई नहीं रोक सकता। यह है उनकी सोच। जिस फिलिस्तीन के लिए यह सब किया जा रहा है,वहां सब बर्बाद हो चुका है। साथ ही फिलिस्तीन की संप्रभुता का क्या? इस बोर्ड को बनाने का मतलब है एक नए उपनिवेशवाद का जन्म। भारत अच्छी तरह से जानता है कि उपनिवेशवाद क्या होता है। औपनिवेशिक ताकतें बताती हैं कि देश किस तरह से चलना चाहिए। यही फिलिस्तीन को बताने की कोशिश हो रही है। फिलिस्तीन इसे कब तक बर्दाश्त करेगा। इजराइल को इस बोर्ड में पाकिस्तान,अज़र बैजान और तुर्की के शामिल पर ऐतराज था। उसका मानना है कि ये तीनों देश हमास के समर्थक हैं। तो अभी बोर्ड बना नहीं है लेकिन मतभेद के मुद्दे इतने ज्यादा हैं कि समझना मुश्किल है कि यह बोर्ड बनेगा तो कैसे बनेगा और बन भी गया तो चलेगा कैसे?

क्या भारत को इसमें शामिल होना चाहिए? इस पर विशेषज्ञों के दो मत हैं। एक वर्ग है जिसका कहना है कि भारत को शामिल होना चाहिए क्योंकि भारत अगर इस बोर्ड में शामिल होता है तो उसे अपना पक्ष रखने का मौका मिलेगा। ज्यादातर मल्टीलटरल फोरम जी-20,ब्रिक्स,क्वाड आदि में भारत की मौजूदगी है। दूसरा वर्ग जो भारत के इसमें शामिल होने का विरोध कर रहा है,उसका कहना है कि इस बोर्ड में जो फैसला होगा,उस पर भारत का कोई नियंत्रण नहीं होगा। साथ ही लिए गए फैसले से भारत को बंध जाना पड़ेगा। भारत के इस बोर्ड में जाने का मतलब है कि स्ट्रेटेजिक ऑटोनॉमी से समझौता। अभी भारत खुद यह तय करता है कि किस मुद्दे पर हम किसके साथ होंगे,किसके विरोध में होंगे, किस मुद्दे पर न्यूट्रल होंगे। इस बोर्ड में शामिल होने के बाद हमारा वह अधिकार एक तरह से चला जाएगा और अमेरिका तो यही चाहता है। वैसे भी जहां तुर्की और पाकिस्तान हैं वहां भारत के जाने का क्या मतलब? दूसरा यह पीस बोर्ड दुनिया में जहां भी कॉन्फ्लिक्ट होगा, वहां शांति की स्थापना करने के लिए है। कल को अगर ऑपरेशन सिंदूर का पार्ट टू शुरू होता है और यह बोर्ड उसमें दखल देता है तो भारत क्या इसको स्वीकार करेगा? आप मानकर चलिए कि जब भारत और पाकिस्तान का मामला आएगा तो अमेरिका के दबाव में ज्यादातर सदस्य देश पाकिस्तान और अमेरिका के साथ खड़े होंगे। तो हमें इस बोर्ड में रहने से कुछ मिलना नहीं है।

जो अमेरिका हमारे ऊपर दुनिया में सबसे ज्यादा टैरिफ लगा रहा है वह हमको इस बोर्ड का सदस्य बनाना चाहता है। इस विरोधाभास के बारे में क्या कहा जाए? मुझे लगता है कि यूएन को पूरी तरह से मृत बनाने के लिए ट्रंप यह बोर्ड बना रहे हैं। पिछले कई दशकों में यूएन कोई भी युद्ध रुकवाने में सफल नहीं रहा है। ट्रंप की मुश्किलें लगातार बढ़ती जा रही है। उन्होंने अपने चुनाव अभियान के दौरान कहा था कि 24 घंटे में रूस यूक्रेन का युद्ध रुकवा देंगे। आज उनको पद ग्रहण किए हुए एक साल पूरा हो चुका है, लेकिन युद्ध रुकने की बजाय और तेज हो गया है। ट्रंप एक समझदार व्यक्ति की तरह नहीं बुली की तरह व्यवहार करते हैं। बुली का एक खास गुण होता है, जो डर जाए उसको डराता है और जो ताकतवर हो उससे डर जाता है।

इस एक साल में आपने ट्रंप का एक भी बयान देखा जो पुतिन या शी जिनपिन या फिर मोदी के खिलाफ हो। जहां भी सवाल पूछा जाता है ट्रंप का पहला रिएक्शन होता है कि मोदी इज ए ग्रेट लीडर। लेकिन टैरिफ भी सबसे ज्यादा भारत पर लगाते हैं। इसका एक ही मतलब है कि भारत सरेंडर करे, जो भारत करने को तैयार नहीं है। अब भारत की यूरोपियन यूनियन के साथ बहुत बड़ी ट्रेड डील ट्रंप के लिए बहुत बड़ा झटका है। ट्रंप देख चुके हैं कि 50% टैरिफ लगने पर भी भारत ने अपना एक्सपोर्ट बढ़ा लिया। अमेरिका के ही ज्यादातर विशेषज्ञ मान रहे हैं कि ट्रंप की नीतियां भारत को अमेरिका से दूर कर रही हैं और यह अमेरिका के लिए आत्मघाती साबित होगा। भारत के पास डेमोग्राफी का डिविडेंड है। भारत के पास बढ़ती हुई अर्थव्यवस्था का डिविडेंड है। भारत के पास बढ़ती हुई सैन्य शक्ति का डिविडेंड है। ऐसे में भारत ट्रंप के बनाए हुए किसी बोर्ड में क्यों शामिल होकर वहां पर मूकदर्शक बना रहे? इसलिए भारत सरकार ने कहा कि हम अभी विचार कर रहे हैं। डिप्लोमेसी में यही भाषा बोली जाती है।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक और ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)