यूपी साधने के लिए अखिलेश और राहुल की रणनीति
प्रदीप सिंह।
चार राज्यों और एक केंद्र शासित क्षेत्र में अगले महीने विधानसभा चुनाव होने वाला है, लेकिन राजनीति उत्तर प्रदेश में गरमाई हुई है। उत्तर प्रदेश में मार्च 2027 में चुनाव होने हैं। वहां मुख्य मुकाबला भाजपा और समाजवादी पार्टी में माना जा रहा है,लेकिन बहुजन समाज पार्टी चुनाव को त्रिकोणीय बना सकती है।
2012 के विधानसभा चुनाव में जब बसपा सपा से हार गई थी तब भी उसको 25.9% वोट मिले थे। 2017 में ये घटकर 22.3% हुआ, लेकिन 2022 में बसपा 13% पर आ गई। 2024 के लोकसभा चुनाव में तो उसे 12% से भी कम वोट मिले। सवाल उठने लगे कि क्या बसपा पॉलिटिकली सर्वाइव कर पाएगी,तभी पिछले कुछ महीनों से अचानक बसपा सुप्रीमो मायावती सक्रिय हो गईं। हालांकि सक्रियता सभी दलों में बढ़ी हुई है। 15 मार्च को मान्यवर कांशीराम का जन्मदिन होता है और बसपा हमेशा से इस दिन को धूमधाम से मनाती रही है। उसने इस दिन लखनऊ में बड़ी रैली की। लेकिन सबसे आश्चर्यजनक बात यह रही कि वह समाजवादी पार्टी और कांग्रेस, जिनका कभी कांशीराम से कोई मतलब नहीं रहा और उन्हें कभी याद नहीं किया,उन्होंने भी इस दिन को पीडीए दिवस और सामाजिक परिवर्तन दिवस के रूप में मनाया। खासतौर से समाजवादी पार्टी की बात करें तो गेस्ट हाउस कांड के बाद वह बसपा,कांशीराम और मायावती की बात भी कैसे कर सकती है। लेकिन राजनीति में सब कुछ संभव है।

2024 के लोकसभा चुनाव के नतीजे के आधार पर अलग-अलग पार्टियां 2027 के लिए अपनी रणनीति बना रही हैं। तो अब इस समय सबको कांशीराम इसलिए चाहिए क्योंकि सबको दलित वोट चाहिए। कितनी विचित्र बात है कि इस देश में दलितों के जो दो सबसे बड़े नेता हुए डॉ भीमराव अंबेडकर और बाबू जगजीवन राम, उनका कोई नाम लेवा नहीं है। क्यों? क्योंकि कांशीराम की बनाई हुई राजनीतिक पार्टी अभी भी जीवित है और उसकी नेता मायावती अब भी राजनीतिक रूप से सक्रिय हैं। सपा और कांग्रेस को मायावती की सक्रियता से डर लग रहा है कि बसपा का जो वोट बैंक 2024 में कुछ मात्रा में छिटककर उन्हें मिल गया था,वह फिर बसपा की ओर न लौट जाए। कांशीराम के प्रति सपा और कांग्रेस के मन में कोई सम्मान,कोई भावना नहीं है। इन दोनों दलों के कम से कम आज के जो नेता हैं अखिलेश यादव और राहुल गांधी, वे कभी कांशीराम से मिलने भी गए हों, इसमें भी मुझे शक है। लेकिन दावा इस तरह से कर रहे हैं जैसे कि कांशीराम उनकी पार्टी के नायक हों। कांग्रेस पार्टी ने पिछले 40 सालों में जवाहरलाल नेहरू की जयंती भी इस तरह से नहीं मनाई जिस तरह से उसने कांशीराम की जयंती मनाई। इसी तरह सपा जिन राममनोहर लोहिया की विचारधारा पर चलने का दावा करती है,उसने भी उनकी जयंती कभी इस तरह से नहीं मनाई जैसे कांशीराम की मनाई।

2024 के लोकसभा चुनाव में सपा और कांग्रेस के पास जो थोड़ा बहुत दलित वोट आया था, वह टिका रह जाए इसकी उम्मीद दिन पर दिन धूमिल होती जा रही है। लेकिन ये दोनों पार्टियां इस बात को मानने को तैयार नहीं हैं। उत्तर प्रदेश देश का सबसे बड़ा राज्य तो है ही,यहां दलित आबादी भी सबसे ज्यादा है। 2011 की जनगणना के मुताबिक 4 करोड़ से ज्यादा दलित उत्तर प्रदेश में रहते हैं और 3 करोड़ के लगभग मतदाता हैं। इस समय यह आंकड़ा कहीं ज्यादा बढ़ गया होगा। दलित राजनीति को जिस मुकाम पर कांशीराम ले गए और मायावती को नेता के रूप में स्थापित किया, वह काम डॉ.अंबेडकर भी नहीं कर पाए। कांशीराम पंजाब से आते थे, वहां भी दलित आबादी लगभग 33 फीसदी है,लेकिन वे वहां कोई राजनीतिक प्रभाव पैदा नहीं कर पाए। लेकिन उत्तर प्रदेश की जमीन दलित राजनीति के लिए बड़ी उर्वरा है, यह साबित हुआ जब बसपा यहां तेजी से बढ़ी और गठबंधन के जरिए सत्ता तक पहुंच गई। मायावती अब तक चार बार उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री रह चुकी हैं। तीन बार भारतीय जनता पार्टी के समर्थन से और एक बार अपने दम पर यानी पूर्ण बहुमत के साथ। मायावती कभी समाजवादी पार्टी के समर्थन से मुख्यमंत्री नहीं रहीं। इस बार मायावती ने स्पष्ट घोषणा कर दी है कि वह किसी से चुनाव पूर्व गठबंधन नहीं करेंगी। अखिलेश यादव के कमान संभालने के बाद समाजवादी पार्टी तीन लोकसभा और दो विधानसभा चुनाव लड़ चुकी है और चार में हार चुकी है। 2024 के लोकसभा चुनाव में उसे कुछ सफलता जरूर मिली और उस सफलता को सपा अपनी असली ताकत मान बैठी है। अब उसे लगता है कि अगर वह कांशीराम के नाम पर दलित वोटों को खींच सके तो सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभर सकती है। हालांकि दलित वोटों का ज्यादातर हिस्सा बसपा के साथ गठबंधन होने पर भी सपा को कभी नहीं मिला।

यूपी में 2024 की सफलता से उत्साहित होकर सपा और कांग्रेस पार्टी को लग रहा है वे कांशीराम की जयंती मनाएंगे तो इससे खुश होकर दलित उनके पास आ जाएगा। 2024 में दलित उनके पास क्यों गया,इसके दो कारण थे। एक संविधान बदल देंगे और आरक्षण खत्म कर देंगे का झूठा नैरेटिव। इस मुद्दे का मुकाबला भाजपा नहीं कर पाई। दूसरा बहुजन समाज पार्टी हाशिए पर थी। इसलिए उसका जो कोर वोट था, उसमें से भी कुछ छिटका। अब परिस्थिति बदल गई है। दलित वोटों में भी खासतौर से जाटव वोट, जो लगभग सवा ग्यारह प्रतिशत है, 2027 के चुनाव में बसपा को छोड़कर कहीं और जाएगा, इसकी संभावना बहुत ही कम लगती है। उसके अलावा गैर जाटव दलित का बड़ा हिस्सा भाजपा के पास 2014,2017,2019 और 2022 में आया। 2024 में उसमें कमी आ गई इसलिए बीजेपी की सीटों की संख्या भी कम हो गई। तो दरअसल समाजवादी पार्टी इतनी परेशान क्यों है? क्योंकि 2022 के विधानसभा चुनाव में उसके साथ दो दल थे। पश्चिम में जयंत चौधरी की पार्टी राष्ट्रीय लोकदल और पूर्व में ओम प्रकाश राजभर की पार्टी सुभासपा। इन दोनों पार्टियों ने समाजवादी पार्टी का वोट शेयर और सीटें बढ़ाने का काम किया। 27 के चुनाव में ये दोनों पार्टियां बीजेपी के साथ हैं। तो कुछ जोड़ने की बात तो छोड़िए, अभी समाजवादी पार्टी जो चला गया उसकी भरपाई करने की भी स्थिति में नहीं है। तो अखिलेश को एक ही बात नजर आती है कि दलित वोट बसपा को छोड़कर हमारे साथ आ जाए। इसलिए उन्हें अचानक कांशीराम याद आने लगे। लेकिन कांशीराम के राजनीतिक वारिस तो चुनाव मैदान में हैं। ऐसे में बसपा को छोड़कर कांग्रेस या सपा के साथ दलित क्यों जाएगा? इस सवाल का जवाब न तो कांग्रेस के पास है और न सपा के पास है। लेकिन उम्मीद पर दुनिया कायम है। सिर्फ जयंती मना लेने से कोई समाज आपके साथ जुड़ता नहीं है। वह देखता है कि आपने अतीत में उसके साथ क्या किया है।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)



