दंगे और आतंक के आरोपियों के लिए देश में विशेष न्यायिक व्यवस्था है।

#pradepsinghप्रदीप सिंह।
एक समय था जब देश पर मुगलों का राज था। उस समय के जो शासक थे, उनकी इच्छा और उनका आदेश ही देश का कानून हुआ करता था। किसी की मजाल नहीं थी कि इसके खिलाफ आवाज उठा सके। फिर आए अंग्रेज। अंग्रेजों ने कानून बनाए। बहुत से लोगों को लगा कि वे देश को सुधारना चाहते हैं। लेकिन अंग्रेजों ने कानून इसलिए नहीं बनाए कि भारत के लोगों को उनके अधिकार मिल सकें। उन्होंने कानून बनाया ताकि अपने साम्राज्य का विस्तार कर सकें और भारतीय लोगों पर कानून का सहारा लेकर अत्याचार कर सकें। इसी के अनुसार उन्होंने न्याय प्रणाली बनाई। फिर 1947 में देश आजाद हुआ, लेकिन देश में अंग्रेजों की बनाई न्याय प्रणाली ही बनी रही क्योंकि आजाद भारत के हुक्मरानों को लगा कि अगर शासन चलाना है तो इसी न्याय प्रणाली के जरिए चलाया जा सकता है। लगभग 78-79 साल बाद अंग्रेजों की बनाई हुई सीआरपीसी और आईपीसी खत्म की गई है। भारतीय न्याय संहिता बनी है,लेकिन केवल कानून बन जाने से न्याय नहीं मिल जाता। न्याय अदालतें देती हैं और जब तक वहां बैठने वाले न्यायाधीशों की मानसिकता नहीं बदलती तब तक आप कानून में कोई भी परिवर्तन कर लीजिए, उससे कोई लाभ नहीं होता।

इस देश में कानून चाहे अंग्रेजों का बनाया हुआ हो और चाहे भारत के लोगों का बनाया हुआ हो। यह कानून या तो रसूख और पैसे वाले लोगों के लिए है या उनके लिए जो रसूख वाले तो नहीं हैं,लेकिन महंगे और प्रभावशाली वकीलों को हायर कर सकते हैं। वकील तय करते हैं कि न्याय किस तरह से और किसको मिलेगा। वरना क्या कारण है कि रात के 2:00 बजे देश की सर्वोच्च अदालत का दरवाजा एक आतंकवादी की फांसी की सजा रुकवाने के लिए खुल जाता है। एक एनजीओ की प्रमुख की गिरफ्तारी पर रोक फोन काल पर लग जाती है,वह भी छुट्टी के दिन जब अदालत नहीं बैठी होती है। ये कोई सामान्य घटनाएं नहीं हैं। अभी सोमवार को ही दिल्ली की कड़कड़डूमा कोर्ट ने शरजील इमाम को 10 दिन की अंतरिम जमानत दे दी है। जिनको 2020 का दिल्ली दंगा याद है, वे शरजील इमाम का भी नाम जानते होंगे। जिन्होंने चिकन नेक का नाम सुना है, वे भी शरजील इमाम का नाम जानते होंगे। जिन्होंने भारत तेरे टुकड़े होंगे इंशा अल्लाह का नारा सुना है, वे भी शरजील इमाम को जानते होंगे। यही शरजील इमाम कह रहा था कि चिकन नेक को काट दो, भारत को तोड़ दो कोई समस्या नहीं होगी। 2020 में दिल्ली में जो हिंदू विरोधी दंगा हुआ,उसमें दायर चार्जशीट के मुताबिक शरजील इमाम इन दंगों का मास्टर माइंड है। जिस शरजील इमाम को हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट ने जमानत देने से मना कर दिया, उसको कड़कड़डूमा कोर्ट ने अंतरिम जमानत दे दी है।


सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि बेल नियम है और जेल अपवाद है। अब आप सोचिए जब सुप्रीम कोर्ट यह कहेगा तो उसके नीचे की जो अदालतें हैं उनका रवैया क्या होगा? तो इसलिए शरजील इमाम को जमानत मिल गई,लेकिन उसे जमानत किस आधार पर मिली? उसने एप्लीकेशन क्या दी थी? उसने मांग क्या की थी? शरजील इमाम का कहना है कि उसके भाई की शादी तय होने वाली है, ऐसे में उसका मौजूद रहना बहुत जरूरी है। इसके अलावा उसकी मां की तबीयत ठीक नहीं है। उनकी देखभाल करने वाला कोई नहीं है। इस आधार पर उसको अंतरिम जमानत दी जाए। तो भाई की शादी तय होने वाली है और लेकिन मां की देखभाल करने वाला कोई नहीं है। अब यह तर्क मेरे जैसे कम समझ वाले व्यक्ति को थोड़ा अटपटा लगता है। भाई तुम जेल में हो। तुम्हारा भाई बाहर है, जो शादी करने जा रहा है, लेकिन मां की देखभाल नहीं कर सकता। यह उस कौम के लोग बोल रहे हैं जो कहते हैं कि हमारा अब नया नारा है- हम दो हमारे 24 और दंगा करने के लिए लोगों को जुटाने में इन्हें कोई दिक्कत नहीं होती। और 10 दिन में शरजील इमाम अपनी मां की ऐसी क्या देखभाल कर लेंगे,जो आगे उनकी देखभाल की जरूरत नहीं रहेगी। शरजील इमाम तो जेल से निकलने के लिए इस तरह के हथकंडे अपनाएगा ही, लेकिन आप अदालत का फैसला देखिए। इस देश में अदालतें दंगे और आतंकवाद के आरोपियों के ज्यादातर मामलों में बड़ी मानवता दिखाती हैं। उनके मानवाधिकार की उन्हें बहुत चिंता रहती है। लेकिन उन्हें यह नहीं दिखता कि इस देश में ऐसे करोड़ों लोग जेलों में हैं, जो इतनी सजा काट चुके हैं,जितनी उन्हें किए गए अपराध के लिए भी नहीं मिलती। उनके लिए बेल नियम नहीं है। उनके लिए तो जेल ही नियम है। तो इस देश में दो तरह की न्याय प्रणाली चल रही है। एक महंगे वकील अफोर्ड करने वालों के लिए,उनके लिए बेल नियम है और जेल अपवाद है। दूसरी गरीबों के लिए,जिनके लिए जेल नियम है और बेल अपवाद है। हालांकि चंद मामले अपवाद जरूर हो सकते हैं।

Karkardooma Court in Karkardooma,Delhi - Judicial Courts near me in Delhi - Justdial

संविधान भले कहता हो कि उसकी नजर में, कानून की नजर में सब बराबर हैं,लेकिन इससे बड़ा झूठ पिछले 75 सालों में नहीं बोला गया है। सभी बराबर न मुगलों के समय थे,न अंग्रेजों के समय और न इन देशी अंग्रेजों के समय हैं। मानसिकता तीनों शासन काल की देखें तो एक ही है कि गरीब आदमी को अपराध सिद्ध होने से पहले दोषी मान लो और अमीर आदमी को अपराध सिद्ध हो जाए, तब भी उसमें ऐसे लूप होल खोजो जिससे उनको राहत दी जा सके। तो शरजील इमाम को 20 मार्च से 30 मार्च तक 10 दिन की बेल इसलिए मिलेगी कि वह अपने भाई की शादी तय करा सके और मां की देखभाल कर सके क्योंकि इस देश में अस्पताल तो हैं नहीं और शरजील इमाम का कोई परिवार भी नहीं है। अंतरिम बेल देते समय जज महोदय यही पता कर लेते कि उन्हीं की अदालत में कितने ऐसे केस हैं, जिनमें लोग जेलों में बंद हैं और उनकी मां, परिवार एवं छोटे बच्चों की देखभाल करने वाला कोई नहीं है। लेकिन वे लोग शरजील इमाम नहीं हैं। यह सुविधा केवल शरजील इमाम जैसे लोगों को मिलती है। तो जिन लोगों को इस देश में यह गलतफहमी है कि कानून और संविधान की नजर में सब बराबर हैं, वे अपनी गलतफहमी दूर कर लें। इस बात का अहसास हमारी अदालतें समय-समय पर कराती रहती हैं।

इस देश के गरीब आदमी का न्याय की तलाश में घर-जमीन सब बिक जाता है, दो-दो, तीन-तीन पीढ़ियां खप जाती हैं,लेकिन न्याय नहीं मिलता। न्याय किसको मिलता है? आधी रात को सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा किसके लिए खुलता है,जो पहुंच,रसूख और पैसे वाले हैं। तो देश की न्याय प्रणाली जब तक नहीं बदलेगी, इस देश के आम आदमी की स्थिति नहीं बदलेगी। उसका विश्वास देश की न्याय प्रणाली से उठ गया है। अब सर्वोच्च अदालत की ओर भी वे उम्मीद की नजर से नहीं देखते। वे चाहें  तो भी उस वकील को हायर नहीं कर सकते,जो सुप्रीम कोर्ट में प्रैक्टिस करते हैं।

शरजील इमाम को जमानत मिलना यह संदेश है कि जो दंगों के मास्टरमाइंड होते हैं, उन्हें ज्यादा से ज्यादा कुछ दिन जेल में रहना पड़ेगा,उससे ज्यादा कुछ नहीं। अभी तो भाई की शादी तय होनी है। जब भाई की शादी तय हो जाएगी तो फिर जमानत का आधार बन जाएगा। दंगों का मास्टरमाइंड अपने भाई की शादी में न जाए,यह कैसे हो सकता है? हमारी अदालत तो ऐसा बर्दाश्त ही नहीं कर सकती है। तो इत्मीनान रखिए शरजील इमाम को आगे फिर जमानत मिलेगी। आप बस अपने देश की न्याय व्यवस्था देखिए और इस पर आंसू बहाइए। इससे ज्यादा आपके अधिकार में कुछ नहीं है।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)