#santoshtiwariडॉ. संतोष कुमार तिवारी।
अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच चल रहा युद्ध हमें सिखाता है कि:
1. निकट भविष्य के सभी युद्धों में जीपीएस प्रणाली का उपयोग होगा।
2. निकट भविष्य के अधिकांश युद्ध ड्रोन और मिसाइल से लड़े जाएंगे।
3. चाहे कैसे भी हो, होर्मुज जलडमरू मार्ग हमारे लिए सदैव खुला रहना चाहिए, क्योंकि हमारी ऊर्जा-जरूरतों की सप्लाई का 50% हिस्सा इसी जल मार्ग से गुजरता है। इसके अतिरिक्त इस जलमार्ग के बंद होने से हमारा अन्य चीजों के एक्सपोर्ट और इंपोर्ट पर भी विपरीत प्रभाव पड़ता है। इस जलमार्ग को निर्बाध खुला रखने में दुनिया के पश्चिमी देशों का भी हित जुड़ा हुआ है, क्योंकि उनकी भी ऊर्जा आवश्यकताओं की सप्लाई लाइन काफी बड़ी मात्रा में इसी जल मार्ग से गुजरती है। अभी कुछ दिन पहले अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप ने होर्मुज जलमार्ग को खुला रखने के लिए अपने मित्र देशों से आगे आने को कहा था, तब तुरंत सबने हाथ खड़े कर दिए थे। लेकिन एक-दो दिन में ही लगभग छह देशों के यह समझ में आ गया कि इस जलमार्ग को खुला रखना बहुत जरूरी है और वे ट्रंप के साथ कंधे से कंधा मिलाकर अपना योगदान करने के लिए तैयार हो गए। ये देश हैं: ब्रिटेन, फ्रांस, इटली, नीदरलैंड्स, जर्मनी और जापान। यह संख्या बढ़ भी सकती है।
जीपीएस की जरूरत क्यों
अभी हाल में भारत ने पाकिस्तान पर जो ऑपरेशन सिंदूर किया, उसमें सही-सही आतंकी ठिकानों पर तेजी से और सफलतापूर्वक हमला इसलिए बोला जा सका, क्योंकि अब हमारी भी अपनी जीपीएस प्रणाली विकसित है।
अब भी हमारी जीपीएस प्रणाली इतनी विकसित नहीं हुई है जितनी कि अमेरिका की है। सन् 1999 में जब अटल बिहारी वाजपेई जी की सरकार थी, तब हमें पाकिस्तान से करगिल युद्ध लड़ना पड़ा था। तब हमारी जीपीएस प्रणाली इतनी विकसित नहीं थी कि पाकिस्तान सेना के सही-सही स्थान का पता लगाया जा सके। तब भारत सरकार ने अमेरिका से यह मदद मांगी थी कि वह इस बारे में जीपीएस डाटा हमसे शेयर करे। लेकिन पाकिस्तान के दोस्त अमेरिका ने यह डाटा हमसे शेयर करने से मना कर दिया था। फिर भी हमने पाकिस्तान से युद्ध जीता था। यह युद्ध थोड़ा लंबा चला था। यदि अमेरिका ने हमसे सम्बंधित जीपीएस डाटा शेयर किया होता, तो युद्ध जल्दी समाप्त हो जाता।
जीपीएस डाटा हमें अपनी उपग्रह प्रणाली से मिलता है। आजकल ईरान पर जो टारगेटेड हमले हो रहे हैं उन सब में अमेरिका द्वारा शेयर किया गया जीपीएस डाटा कार्य कर रहा है।
इसी प्रकार ईरान जो टारगेटेड हमले कर रहा है, उसके लिए रूस जीपीएस डाटा शेयर कर रहा है।

सबसे सस्ता हथियार ड्रोन

ईरान के साथ चल रहे इस युद्ध में जो सबसे सस्ता ड्रोन इस्तेमाल किया जा रहा है उसकी कीमत 32 लख रुपए से ज्यादा है। और एंटी-ड्रोन हथियारों की कीमत तो कई करोड़ रुपए है। मिसाइल की कीमत तो करोड़ों और अरबों रुपए में होती है। लेकिन यह खर्चा युद्ध लड़ने के लिए उठना ही पड़ता है।
इस सब को देखते हुए भारत अपने उपग्रह संचार प्रणाली को तो मजबूत कर ही रहा है, साथ ही ड्रोन निर्माण और दूर तक मार करने वाली मिसाइल प्रणाली को भी विकसित कर रहा है। अभी इसी वर्ष सन् 2026 में भारत ने अग्नि-3 मिसाइल का परीक्षण किया है, जो कि साढ़े तीन हजार किलोमीटर तक की रेंज पर मार कर सकता है।
अनुभव हमें यह सिखाता है कि देश की सीमाओं की रक्षा के लिए हमें हमेशा तैयार रहना है और स्वावलंबी बनना है। सन् 1962 में पंडित नेहरू की सरकार ने देश की सीमा-रक्षा की कोई तैयारी नहीं की थी। इस कारण हम चीन से युद्ध हार गए थे और उसने हमारी जमीन हड़प ली थी।
इस लेख के लेखक ने इस युद्ध के विषय पर कुछ दिन पहले एक वीडियो भी बनाया था जिसका लिंक है: 
(लेखक सेवानिवृत्त प्रोफेसर हैं।)