अजय गोस्वामी।
पहली सूची में 195 और दूसरी सूची में 72 उम्मीदवारों की घोषणा की है। अब तक की घोषणा के मुताबिक भाजपा ने 57 ओबीसी, 28 महिलाएं, 27 अनुसूचित जाति और 18 अनुसूचित जनजाति से ताल्लुक रखने वाले उम्मीदवारों की घोषणा की है। पार्टी ने दिल्ली में सभी 7 सीटों पर उम्मीदवार उतार दिये हैं। उधर, कांग्रेस ने 82 उम्मीदवारों की घोषणा की है। कांग्रेस ने पहली सूची में 39 और दूसरी सूची में 43 उम्मीदवारों का ऐलान किया है। पहली सूची में 15 उम्मीदवार सामान्य वर्ग से और 24 अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग और अल्पसंख्यक समुदायों से हैं। दूसरी सूची में 7 सामान्य वर्ग से, 13 अन्य पिछड़े वर्ग, 10 अनुसूचित जाति, 9 अनुसूचित जनजाति और 1 मुस्लिम उम्मीदवार हैं।
इंडी गठबंधन की बात करें तो उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी ने अब तक 42 सीटों पर उम्मीदवारों की घोषणा कर दी है। कांग्रेस इस राज्य में भी उम्मीदवारों की घोषणा करने में पीछे है। उत्तर प्रदेश में कांग्रेस और समाजवादी पार्टी मिलकर चुनाव लड़ रही है। 80 सीटों में सपा 62 और कांग्रेस 17 सीटों पर चुनाव लड़ रही है। समाजवादी पार्टी ने यहां 1 सीट टीएमसी (तृण मूल कांग्रेस ) को दी है। मायावती की बात करें तो बसपा ने कोई चार उम्मीदवारों की घोषणा की दी है। पश्चिम बंगाल में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने सभी 42 सीटों पर टीएमसी उम्मीदवारों को उतार दिया है। पंजाब में आम आदमी पार्टी 11 में से 8 उम्मीदवार मैदान में उतार चुकी है। हालांकि बिहार समेत कई राज्यों में प्रत्याशियों का ऐलान अभी बाकी है। गुजरात की 26 सीटों में से 24 पर आम आदमी पार्टी और दो सीटों पर कांग्रेस चुनाव लड़ेगी। इसी तरह दिल्ली की 7 में से कांग्रेस 4 और आम आदमी पार्टी 3 सीटों पर चुनाव लड़ेगी। अन्य राज्यों की तस्वीर धुंधली है।

देश में 200 लोकसभा सीटें ऐसी हैं, जहां कांग्रेस और भाजपा का सीधा मुकाबला है। इनमें कर्नाटक, छत्तीसगढ़, हरियाणा, गुजरात, मध्य प्रदेश, असम, राजस्थान, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश प्रमुख हैं। दक्षिण भारत को छोड़ दें तो उत्तर भारत और पूर्वोत्तर में कांग्रेस काफी कमजोर है। यहां कांग्रेस का संगठन और ढांचा पूरी तरह से चरमराया हुआ है। दक्षिण में कांग्रेस कुछ हद तक मजबूत है। कर्नाटक और तेलंगाना में उसकी सरकार है, जबकि केरल में वह प्रमुख विपक्षी दल है। इसी तरह से तमिलनाडु में वह डीएमके के साथ सत्तारूढ़ गठबंधन में शामिल है। जबकि उत्तर में कांग्रेस ज्यादातर राज्यों में क्षेत्रीय दलों के भरोसे है। बिहार, महाराष्ट्र, झारखंड, तमिलनाडु, दिल्ली और उत्तर प्रदेश में कांग्रेस क्षेत्रीय दलों के सहारे राजनीति कर रही है। लोकसभा चुनाव से पहले हुए पांच राज्यों की विधानसभा चुनावों में मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में कांग्रेस की हार का ही नतीजा है कि आज इंडी गठबंधन में कांग्रेस को क्षेत्रीय दलों के साथ तालमेल बैठाने में न सिर्फ दिक्कत आ रही है, बल्कि क्षेत्रीय दल लगातार कांग्रेस को आंखें दिखा रहे हैं।

विपक्षी दलों के इंडी गठबंधन (इंडियन नेशनल डिवेलपमेंटल इन्क्लूसिव अलायंस) ने कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे को गठबंधन का चेयरपर्सन चुना था। इंडिया ब्लॉक की इस मीटिंग में 10 पार्टियों के नेता शामिल हुए थे। एक मीटिंग में अरविंद केजरीवाल और ममता बनर्जी ने खड़गे को गठबंधन की तरफ से पीएम पद का उम्मीदवार बनाए जाने का सुझाव भी दिया था। उनका कहना था कि दलित समुदाय से आने वाले खड़गे को पीएम फेस बनाने से चुनाव में विपक्ष को फायदा होगा। पर यह सारी बातें हवा हवाई होकर रह गईं। ममता बनर्जी ने इंडी गठबंधन से पूरी तरह पल्ला झाड़ लिया। लेकिन केजरीवाल ने जरूर गुजरात और दिल्ली में कांग्रेस से हाथ मिलाया है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार है।) (एएमएपी)


