अब भूमि संबंधी कानून में संशोधन पर टिकी उम्‍मीद।

वर्ष 2011 में पश्चिम बंगाल की सत्ता पर ममता बनर्जी के आरूढ़ होने के बाद अब तक राज्य में कोई भी बड़ा औद्योगिक निवेश नहीं आया है। पेट्रोलियम और खनन क्षेत्रों में नए उद्योगों की स्थापना जरूर हुई है लेकिन वह केंद्र सरकार के सहयोग से। इसके अलावा उत्तर प्रदेश में अवैध बूचड़खाने और मवेशियों की हत्या के कारोबार पर प्रशासनिक लगाम लगने के बाद बड़े पैमाने पर चमड़े के कारोबारी बंगाल आ गए जिसकी वजह से लेदर कांप्लेक्स इलाके में चर्म उद्योग को बढ़ावा मिला है।इसके अलावा अदानी, अंबानी, टाटा, बिरला समेत अन्य औद्योगिक घरानों ने बंगाल में पिछले कई दशक से निवेश नहीं किया है। राज्य में औद्योगिक विकास के मद्देनजर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी हर साल औद्योगिक शिखर सम्मेलन करती हैं। इसके लिए देश-विदेश का सफर भी करती रही हैं। शिखर सम्मेलनों में शामिल होने वाले औद्योगिक घरानों को कम कीमत पर लीज पर जमीन भी उपलब्ध कराई गई लेकिन निवेश नहीं हुए। अब राज्य सरकार भूमि संबंधी कानून में संशोधन के भरोसे उद्योग को बढ़ावा देने में जुट गई है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि राज्य में हर तरह के औद्योगिक निवेश से पहले रंगदारी वसूली और प्रशासनिक विफलता राज्य में औद्योगिक निवेश की राह में सबसे बड़ा रोड़ा है। इसलिए राज्य सरकार अब भूमि संशोधन कानून पर जोर दे रही है।

क्या है इस कानून की खासियत

राज्य विधानसभा से जुड़े एक अधिकारी ने बताया कि आगामी आठ फरवरी से शुरू होने वाले राज्य विधानसभा के बजट सत्र में ही इस संशोधित अधिनियम को पेश कर पारित कराया जाएगा। इसमें जिन उद्योगपतियों को जमीन दी गई है और उन्होंने निवेश किया है, उन्हें स्थाई तौर पर जमीन देने की प्रक्रिया शुरू की जाएगी। जबकि, जिन्हें जमीन दी गई और उन्होंने निवेश नहीं किया, उनकी जमीन वापस लेने की प्रक्रिया शुरू की जाएगी। इससे उन औद्योगिक समूहों पर दबाव बढ़ेगा, जिन्होंने जमीन तो राज्य सरकार से ली है लेकिन निवेश नहीं किया है। कहीं भी औद्योगिक निवेश के लिए सबसे महंगा सौदा जमीन का होता है जो राज्य सरकार की ओर से कमोबेश मुफ्त में ही उपलब्ध करवाया जाता है। ऐसे में अधिकतर औद्योगिक समूह जमीन लौटाने के बजाय निवेश पर बल देंगे और इससे राज्य में उद्योग और रोजगार दोनों बढ़ेगा। इससे आने वाले दिनों में ममता बनर्जी की सरकार को आर्थिक और राजनीतिक दोनों तरह से लाभ देने वाला होगा।

उक्त अधिकारी ने बताया कि आठ फरवरी से राज्यपाल डॉ सीवी आनंद बोस के अभिभाषण के साथ बजट सत्र की शुरुआत होगी। 10 फरवरी को बजट पेश किया जाएगा। उसके बाद के दिनों में इस पर चर्चा होगी लेकिन इसी बीच भूमि सुधार संशोधित अधिनियम को विधानसभा में पेश कर पारित किया जाएगा।

1955 का ही कानून अभी तक लागू

खास बात यह है कि राज्य में मौजूदा भूमि सुधार कानून 1955 में ही बना था., जो अभी तक चल रहा है। राज्य मंत्रिमंडल ने इस बारे में पहले ही सहमति दे दी है। अब इसे कानून का रूप देने के लिए विधानसभा से पारित करवाना जरूरी है। 1965 में भी इस कानून को बदलने की कोशिश हुई थी, लेकिन उसे विधानसभा में पेश कर पारित नहीं कराया गया था। अब इसे पारित करने पर एक तरफ औद्योगिक घरानों को लाभ होगा तो दूसरी ओर राज्य सरकार को।

एक अन्य अधिकारी ने बताया कि कोई भी उद्योग स्थापित करने में जो अनुमानित खर्च होता है उसमें से 30 फीसदी राशि केवल जमीन में खर्च हो जाती है। ऐसे में राज्य सरकार अगर औद्योगिक घरानों को जमीन का मालिकाना हक देती है तो इससे उद्योगपतियों को बड़ा लाभ होगा। साथ ही जो औद्योगिक समूह जमीन लेने के बावजूद निवेश नहीं करेंगे, उनसे जमीन लेकर राज्य सरकार उन औद्योगिक घरानों को सुपुर्द कर सकेगी जो राज्य में उद्योग को स्थापित करेंगे। इसलिए राज्य सरकार को दोहरा लाभ होने वाला है।

वाममोर्चा सरकार ने भी की थी कोशिश

वर्ष 2002 में जमीन आवंटन और लीज संबंधी एक नई नीति तत्कालीन वाममोर्चा सरकार ने बनाई थी। इसका नाम दिया गया था भूमि प्रदान नीति। तत्कालीन मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य की सरकार ने इससे संबंधित एक निर्देशिका भी जारी की थी लेकिन विधानसभा में इसे पारित नहीं किया गया था।

2016 में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की सरकार ने इस नीति में कुछ बदलाव किया था, लेकिन उसका भी बहुत अधिक लाभ नहीं हुआ था। इसलिए अब आखिरकार भूमि सुधार कानून में संशोधन कर इसका क्रियान्वयन किया जाएगा। विधानसभा सूत्रों ने बताया है कि राज्य भूमि सुधार विभाग की ओर से इस बिल को विधानसभा में पेश किया जाएगा, जिसे आसानी से पारित करवाया जाएगा। (एएमएपी)