बालेन्दु शर्मा दाधीच।

अफसोस की बात है कि दिल्ली में संपन्न इंडिया एआई इम्पैक्ट समिट की कामयाबियाँ व नतीजे गलतियों व नकारात्मक पब्लिसिटी के गुबार में खो से गए। आयोजन की अव्यवस्थाओं, अराजकता, हद से ज्यादा प्रचार पाने की महत्वाकांक्षा, गलगोटिया विश्वविद्यालय जैसे चंद भागीदारों के मूर्खतापूर्ण दावों और आयोजन स्थल पर हुए भद्दे राजनैतिक विरोध प्रदर्शन ने हर उस भारतीय को दुखी किया जो इस समिट को कामयाब होते हुए और भारत को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के वैश्विक तंत्र की तीसरी बड़ी ताकत के रूप में स्थापित होते हुए देखने की हसरत रखता था।

सवाल उठा कि जो देश बदलती दुनिया में अपनी अहम भूमिका की बात कर रहा हो, क्या वह अपने खुद के आयोजन की बुनियादी व्यवस्था नहीं संभाल सकता और उसे त्रुटिहीन नहीं बना सकता? यह केवल पीआर डिजास्टर और प्रशासनिक नाकामी नहीं थी, यह उस भरोसे पर चोट थी जो भारत वैश्विक मंच पर पैदा करने की कोशिश कर रहा है। चीन की तरफ से टिप्पणी आई कि भारत एआई में कोई बड़ी उपलब्धि अर्जित करने के लिए नहीं बल्कि अपनी उपस्थिति को दिखाने (विजिबिलिटी) मात्र के लिए यह समिट कर रहा है।

बहरहाल, पाँच लाख से अधिक लोगों की भागीदारी वाली समिट के रूप में, इस आयोजन ने बहुत कुछ दिया है- भारत को भी और एआई के वैश्विक इको-सिस्टम को भी।

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की होड़ में अमेरिका और चीन सबसे आगे हैं। लेकिन इस समिट ने संदेश दिया है कि भारत इस दौड़ में तीसरे खंभे के रूप में उभर रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस अवसर पर ‘मानव एआई’ की अवधारणा पेश की-  ऐसी तकनीक जो इंसानों की हो, इंसानों द्वारा बनाई गई हो, और इंसानों के भले के लिए काम करे। यह सोच अमेरिका और चीन के तकनीकी वर्चस्व के मुकाबले एक नैतिक और मानवीय विकल्प पेश करती है। आपको याद होगा कि भारत लंबे अरसे से सामाजिक रूप से जिम्मेदार एआई की बात करता रहा है और कुछ साल पहले इसी थीम पर हमारे यहाँ एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन (रेज 2020) भी हो चुका है।

मौजूदा समिट अपनी श्रेणी के चुनिंदा, बड़े, वैश्विक शिखर सम्मेलनों में से एक है। इस तरह के सम्मेलन पिछले कुछ वर्षों में ब्लेचली पार्क (ब्रिटेन), फ्रांस, कोरिया आदि में भी हुए हैं और इसी तरह का अगला शिखर सम्मेलन 2027 में स्विटजरलैंड में होगा। दिल्ली शिखर में राजनीति, कारोबार और तकनीक की दुनिया के वैश्विक दिग्गजों की मौजूदगी महत्वपूर्ण थी। इसमें 20 से अधिक देशों के राष्ट्राध्यक्ष शामिल हुए जिनमें फ्रांस के राष्ट्रपति एमानुएल मैक्रों और ब्राजील के राष्ट्रपति लुला डि सिल्वा शामिल थे। दिग्गज कंपनियों के सीईओ मसलन गूगल के सुंदर पिचाई, ओपनएआई के सैम ऑल्टमैन और एंथ्रोपिक के दारियो अमोदेई भी नई दिल्ली पहुंचे। इतने बड़े व्यक्तित्वों की मौजूदगी वैश्विक राजनीति, कारोबार और टेक्नॉलॉजी में भारत की बढ़ती अहमियत का सबूत है। दुनिया की बड़ी तकनीकी कंपनियों के लिए भारत का मतलब है डेढ़ अरब लोगों का बाजार, करोड़ों युवा इंजीनियर, और अथाह डेटा का खजाना। एआई के लिहाज से ये सभी बहुत कीमती हैं और कोई भी आईटी दिग्गज इन्हें अनदेखा करना नहीं चाहेगा।

समिट में कई आर्थिक उपलब्धियां दर्ज हुईं। दुनियाभर के निवेशकों ने इन्फ्रास्ट्रक्चर में 250 अरब डॉलर से अधिक के निवेश के वादे किए। डीप टेक यानी अत्याधुनिक तकनीक के लिए 20 अरब डॉलर की वेंचर कैपिटल का वादा भी किया गया। वैश्विक एआई कंपनियों, जैसे ओपनएआई, एंथ्रोपिक, एनवीडिया, एएमडी, आईबीएम, गूगल, माइक्रोसॉफ्ट आदि के इन्फोसिस, टीसीएस, लार्सन एंड टूब्रो आदि प्रमुख भारतीय कंपनियों और राज्य सरकारों के साथ भागीदारी के समझौते भी हुए हैं। सबसे बड़ी रणनीतिक उपलब्धि रही भारत का पैक्स सिलिका गठबंधन में शामिल होना। यह अमेरिका की अगुवाई में बना एक महत्वपूर्ण मंच है जो एआई चिप्स और तकनीकी आपूर्ति श्रृंखला की सुरक्षा के लिए बनाया गया है। ब्रिटेन, जापान, ऑस्ट्रेलिया और ताइवान जैसे देश पहले से ही इसमें शामिल हैं। भारत को इसमें शामिल किए जाने का अर्थ है कि अमेरिका प्रौद्योगिकी और एआई में भारत को एक भरोसेमंद साझेदार मानता है।

किसी विकासशील देश में एआई को केंद्र में रखते हुए पहली बार इतना बड़ा आयोजन हुआ है। भारत ने इस मंच का उपयोग ‘ग्लोबल साउथ’ यानी एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के विकासशील देशों की प्रतिनिधि शक्ति के रूप में किया। सत्तर से ज्यादा देशों ने ‘नई दिल्ली एआई घोषणापत्र’ पर हस्ताक्षर किए जिसका मकसद यह सुनिश्चित करना है कि एआई के नियम-कायदे केवल अमेरिका और यूरोप न तय करें बल्कि उसे सही अर्थों में समावेशी और लोकतांत्रिक बनाया जाए। भारत ने इतने देशों को सामने ला खड़ा किया जो उसकी अपनी राजनैतिक महत्ता के साथ-साथ एआई जैसी रूपांतरकारी तकनीक पर उसके नजरिए की स्वीकार्यता का प्रतीक भी है।

समिट ने भारतीय प्रतिभा को दुनिया के सामने रखने का मौका दिया। भारतीय स्टार्टअप कंपनी सर्वम एआई ने 105 अरब पैरामीटर वाला एक ऐसा भाषाई मॉडल पेश किया जो लोकप्रिय वैश्विक मॉडलों को टक्कर दे सकता है। खास बात यह है कि इसे उनकी तुलना में बहुत ही कम संसाधनों के साथ बनाया गया है और यह भारतीय भाषाओं का बेहतरीन समर्थन करता है। ‘भारत जेन’ जैसे अन्य स्वदेशी मॉडलों ने भी ध्यान खींचा। आईआईटी गुवाहाटी के एक छात्र शालिग्राम देवांगन ने मात्र ₹1.1 लाख की लागत में बने दस भारतीय भाषाओं में काम करने वाले एआई मॉडल को दिखाया। यह कम खर्च में बड़ा काम करने की भारतीय क्षमता का जीता-जागता उदाहरण है। भारत ने टीबी की जांच के लिए एआई आधारित एक्स-रे स्कैनिंग, सरकारी सेवाओं के लिए बहुभाषी वॉयस बॉट्स और किसानों के लिए मौसम पूर्वानुमान जैसे उपयोगी प्रयोगों को दुनिया के सामने रखा। इन उदाहरणों ने साबित किया कि भारत की तकनीक आम आदमी के काम आ सकती है। एल एंड टी टेक्नोलॉजी सर्विसेज के 250 से अधिक एआई पेटेंट ने यह भी दिखाया कि भारत की एआई क्षमताएँ केवल इन्फ्रास्ट्रक्चर, सॉफ्टवेयर और सेवाओं तक सीमित नहीं है।

समिट के बाद अब नजरें ‘इंडिया एआई मिशन 2.0’ पर हैं। इसके तहत 20 लाख नागरिकों को एआई का प्रशिक्षण देने, एआई विकास और शोध के लिए 20,000 अतिरिक्त जीपीयू उपलब्ध कराने और स्वदेशी फाउंडेशनल मॉडल लॉन्च करने की योजना है। हालाँकि आज की हकीकत यह है कि भारत अभी भी 90% जीपीयू बाहर से आयात करता है। जीडीपी का सिर्फ.7% ही अनुसंधान एवं विकास पर खर्च होता है, डेटा सुरक्षा के कड़े कानूनों का अभाव है और एआई के कारण 2030 तक 30 करोड़ नौकरियों के प्रभावित होने का अनुमान है। इन सब पर कोई ठोस बात फिलहाल सामने नहीं आई है। लगभग 140 करोड़ लोगों के देश में  बीस लाख नागरिकों को एआई प्रशिक्षण देने का आंकड़ा ऊंट के मुँह में जीरे जैसा है।

भारत एआई इम्पैक्ट समिट 2026 एक ऐसा आईना है जिसमें भारत की दोनों तस्वीरें एक साथ दिखती हैं। हमारी क्षमताएँ, कामयाबियाँ और महत्वाकांक्षाएँ एक तरफ हैं। सर्वम एआई जैसे स्टार्टअप्स की सफलता, आईआईटी के होनहार छात्रों का नवाचार और 70 देशों को साथ लाने की कूटनीतिक सफलता महत्वपूर्ण है। दूसरी तरफ रोबोट डॉग का झूठ, सड़कों पर पैदल चलते प्रतिनिधि और अव्यवस्थाओं से जुड़े वे अनेक सवाल हैं जिनके जवाब नहीं मिले। इंडिया एआई समिट से यकीनन भारत में एआई का फलक विस्तार लेगा- शोध, इन्फ्रास्ट्रक्चर, नवाचार, विकास, अर्थव्यवस्था, रोजगार, कौशल आदि पर ठोस प्रभाव पड़ेगा। एआई विश्व में हमारी मजबूत उपस्थिति भी रेखांकित होगी। किंतु खुद को अमेरिका और चीन की श्रेणी में लाने के लिए हमें अभी भी कई बड़ी बाधाएं पार करनी हैं।

(लेखक एल्गो टेक्नॉलॉजीज, दुबई, के सीईओ हैं)