परिसीमन 2011 की जनगणना के आधार पर ही होगा, महिला आरक्षण संशोधन विधेयक इसी सत्र में ।

#pradepsinghप्रदीप सिंह।
2029 के लोकसभा चुनाव के लिए भाजपा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तैयारी अभी से शुरू कर दी है। सरकार इसी बजट सत्र में महिला आरक्षण संशोधन विधेयक लाने जा रही है। इसके लिए उसने विपक्षी दलों से बातचीत शुरू भी कर दी है। उसे उम्मीद है कि इस पर आम सहमति बन जाएगी।
2023 में नारी शक्ति वंदन विधेयक सर्वसम्मति से पास हुआ था। यह कानून जनगणना और उसके आधार पर परिसीमन की प्रक्रिया पूरी होने के बाद 2029 से लागू किया जाना था,लेकिन अब सरकार की नई योजना के मुताबिक 2011 की जो जनगणना है,उसके आधार पर ही चुनाव क्षेत्रों का परिसीमन किया जाएगा। ऐसा इसलिए क्योंकि नई जनगणना अभी तक शुरू ही नहीं हुई है और उसके आधार पर 2029 तक परिसीमन का काम पूरा नहीं हो सकता था। यानी सरकार नई जनगणना के आधार पर परिसीमन से पीछे हट गई है। उसके लिए 2029 से महिला आरक्षण को लागू करना प्राथमिकता हो गई है। तो सरकार दो विधेयक लाएगी एक संख्या बढ़ाने के लिए और दूसरा डीलिमिटेशन कानून में परिवर्तन के लिए। अभी लोकसभा सदस्यों की संख्या 543 है, जो 2029 में बढ़कर 816 हो जाएगी। परिसीमन को लेकर दक्षिण के राज्यों को ऐतराज था। उनका कहना था कि हमारी आबादी कम है इसलिए हमारी लोकसभा और विधानसभा सीटों की संख्या घट सकती है। उनकी शिकायत को दूर करने के लिए सरकार ने तय किया है कि सीटों में वृद्धि आनुपातिक होगी। उदाहरण के लिए तमिलनाडु में 39 लोकसभा सीटें हैं। पुडुचेरी को मिला दें तो 40 सीटें होती है। जबकि उत्तर प्रदेश में लोकसभा की 80 सीटें हैं। अब नए परिसीमन के बाद उम्मीद की जा रही है कि उत्तर प्रदेश में लोकसभा की सीटों की संख्या 120 हो जाएगी यानी डेढ़ गुना हो जाएगी। इसी तरह से तमिलनाडु में पुडुचेरी को मिलाकर लोकसभा सीटों की संख्या 60 हो जाएगी।
2023 में जब विधेयक पास हुआ था तब जो तय हुआ था, इस बार भी वही स्थिति रहेगी कि आरक्षण के अंदर आरक्षण होगा। जैसे इस समय अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित सीटों की संख्या है 86 है,वह बढ़कर 126 हो जाएगी। इसी तरह से अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित सीटों की संख्या इस समय 47 है,ये संख्या बढ़कर 70 हो जाएगी। इनमें 33% सीटें इसी वर्ग की महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी। कुल मिलाकर 2029 के लोकसभा चुनाव में 273 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी। इससे देश की राजनीति में महिलाओं का योगदान, उनकी भागीदारी, उनकी हिस्सेदारी बहुत बड़े पैमाने पर बढ़ जाएगी। परिसीमन यानी लोकसभा और विधानसभा क्षेत्रों के नए सिरे से निर्धारण में दो बातों का ध्यान रखा जाता है। एक भौगोलिक क्षेत्र कितना होगा और दूसरा आबादी। ऐसा न हो कि किसी लोकसभा क्षेत्र में मतदाताओं की संख्या 15 लाख हो और दूसरे में 35 लाख हो जाए। यह असंतुलन दूर करने की भी कोशिश होगी। दूसरी बात परिसीमन सरकार नहीं कराती है। इसके लिए सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज के नेतृत्व में आयोग बनता है और उसकी रेमेंडेशन को सुप्रीम कोर्ट में भी चुनौती नहीं दी जा सकती। सरकार उसमें कुछ नहीं कर सकती है।
2029 से महिला आरक्षण को लागू कराना ऐसा मुद्दा है जिसका विरोध विपक्षी दल भी नहीं कर सकते। हालांकि उसको लगता है कि 2029 में अगर यह लागू हो गया तो उसका फायदा बीजेपी को मिल सकता है। अब मिलेगा कि नहीं कोई नहीं जानता है। लेकिन जो कानून बनाता है, जो परिवर्तन लाता है उसको उसका कुछ लाभ मिलता है। विपक्ष सरकार की इस बात के लिए आलोचना जरूर करेगा कि उसने जनगणना क्यों देर कराई? नई जनगणना का इंतजार क्यों नहीं किया? लेकिन अगर नई जनगणना का इंतजार किया जाता तो महिला आरक्षण लोकसभा और विधानसभाओं में 2034 के लोकसभा चुनाव से पहले लागू नहीं हो पाता। वैसे नया संसद भवन बनाकर सरकार ने सांसदों के बैठने को लेकर समस्या दूर कर दी है। पुराने संसद भवन में 816 सांसदों के बैठने की जगह नहीं थी। अब जो नया संसद भवन बना है, उसमें 880 सांसदों के बैठने की जगह है। सरकार को उम्मीद है कि नई जनगणना के आधार पर परिसीमन कराने की बजाय 2011 की जनगणना के आधार पर ही परिसीमन कराने के लिए लाया जाने वाला संशोधन विधेयक और दूसरा विधेयक बिना किसी दिक्कत के पास हो जाएंगे। संविधान संशोधन विधेयक पास कराने के लिए सरकार को दो तिहाई बहुमत चाहिए। जो राज्यसभा में एनडीए के पास नहीं है। उसमें विपक्ष के सहयोग के बिना काम नहीं होगा, लेकिन लोकसभा में उसको ऐसी कोई बड़ी दिक्कत नहीं आने वाली है। इसके बावजूद सरकार की कोशिश होगी कि इस मुद्दे पर सभी दलों के बीच आम राय बने।
तो महिला आरक्षण कानून लागू होने के बाद भारत की राजनीति का पूरा परिदृश्य बदल जाएगा। भारतीय राजनीति में महिलाओं की बहुत बड़ी भागीदारी हो जाएगी और महिलाओं की भागीदारी जिस क्षेत्र में बढ़ती है,वहां नए तरह के परिवर्तन आते हैं और वे ज्यादातर सकारात्मक होते हैं। मेरा मानना है कि यह भारत के संविधान में सबसे बड़ा क्रांतिकारी परिवर्तन होगा। महिला आरक्षण संशोधन विधेयक के विरोध का कोई कारण विपक्ष के पास नहीं है। हालांकि वह इसे आरक्षण के जाल में फिर से फंसाने की कोशिश कर सकता है। कुछ नई मांगें हो सकती हैं। याद कीजिए जब पहले महिला आरक्षण विधेयक आ रहा था तो शरद यादव और उनके साथियों ने उस विधेयक की कॉपियां सदन में फाड़ कर फेंक दी थीं। उनका आरोप था कि आरक्षण का सबसे ज्यादा फायदा सवर्ण वर्ग की महिलाओं को मिलेगा। लेकिन आरक्षण के अंदर आरक्षण की व्यवस्था करके उस आशंका को सरकार ने दूर कर दिया है। तो आप कमी तो किसी भी चीज में निकाल सकते हैं और सुधार की गुंजाइश हमेशा रहती है। अभी तो यह लग रहा है कि 2029 के लोकसभा चुनाव में 273 लोकसभा सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी और यह पूरी दुनिया के लिए उदाहरण होगा।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)