तारिक रहमान को करनी होगी संबंधों में सुधार की पहल।
प्रदीप सिंह।
बांग्लादेश में आम चुनाव हो गए। बहुत से लोगों को उम्मीद नहीं थी कि चुनाव हो पाएगा। उन्हें लगता था कि मोहम्मद यूनुस चुनाव टालने की कोशिश करेंगे, लेकिन लगता है कि अमेरिका ने ऐसा होने नहीं दिया। पहले तो हम लोगों को यह बात बिल्कुल स्पष्ट रूप से समझ लेनी चाहिए कि मोहम्मद यूनुस को बिठाना हो, शेख हसीना को सत्ता से हटाना हो या यह चुनाव, ये तीनों अमेरिका के डीप स्टेट करवाया। उसको बांग्लादेश में एक ऐसी सरकार चाहिए थी, जो उसके स्ट्रेटेजिक हितों का ध्यान रखे। शेख हसीना नहीं रख रही थीं इसलिए उनको सत्ता से बाहर जाना पड़ा। मोहम्मद यूनुस कर रहा था, लेकिन वह बिल्कुल चरणों में बिछा हुआ था। तो अमेरिका को एक लेजिटिमेसी चाहिए थी कि एक चुनी हुई सरकार हो, जिसके बारे में कोई यह न कहे कि दबाव डालकर काम करवा रहे हैं,इसीलिए बांग्लादेश में चुनाव हो गए।
अब वहां चुनाव तो कराए गए लेकिन बांग्लादेश की सबसे बड़ी पार्टी आवामी लीग के चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध लगा दिया गया। उसका नतीजा यह हुआ कि नंबर दो की पार्टी बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) 212 सीटें जीतकर यानी दो तिहाई बहुमत के साथ सत्ता में आ गई। 68 सीटें जीतकर दूसरे नंबर पर जमात-ए- इस्लामी रही। जमात-ए- इस्लामी को ज्यादातर सीटें, उन इलाकों से मिली हैं, जो भारत की सीमा से लगे हुए हैं। इन चुनावों में सबसे बड़ा धक्का नेशनल सिटीजंस पार्टी को लगा है,जो छात्र आंदोलन से पैदा हुई थी और जिसने तख्ता पलट में अग्रणी भूमिका निभाई। उसने जमात-ए- इस्लामी के साथ मिलकर चुनाव लड़ा था और उसे केवल छह सीटें मिली हैं।

बांग्लादेश की कमान अब बेगम खालिदा जिया के बेटे तारिक रहमान के हाथों में है। शपथ ग्रहण समारोह में तारिक रहमान ने भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को न्योता दिया था,लेकिन मोदी ने खुद न जाकर अपने प्रतिनिधि के तौर पर लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को भेजने का फैसला किया। तो भारत ने बता दिया कि बांग्लादेश में हिंदुओं के साथ जो हो रहा है, उसके बाद प्रधानमंत्री का वहां जाना अभी संभव नहीं है। अभी भारत देखेगा कि तारिक रहमान किस तरह से सरकार चलाते हैं और किस तरह से भारत से संबंध स्थापित करते हैं। भारत-बांग्लादेश के संबंध पूरी तरह से तारिक रहमान के एटीट्यूड पर निर्भर करेंगे। हालांकि चुनाव में बीएनपी का जीतना हमारे लिए कोई बहुत खुशी की बात नहीं है क्योंकि बीएनपी पहले जब भी सत्ता में रही उसने नॉर्थ ईस्ट के आतंकवादियों को संरक्षण, हथियार और पैसा दिया। आतंकी भारत से भागकर बांग्लादेश में शरण लेते थे। शेख हसीना के सत्ता में आने के बाद यह धीरे-धीरे बंद हुआ। शेख हसीना ने कभी भारत के स्ट्रेटेजिक इंटरेस्ट की अनदेखी नहीं की। वह चाहतीं तो बड़े आराम से अमेरिका जो चाहता था, वह सब कर देतीं और सत्ता में बनी रहतीं, लेकिन उन्होंने भारत से संबंधों को तरजीह दी। उनको सत्ता से हटाए जाने के बाद बांग्लादेश में हिंदुओं के साथ जो हो रहा है, उससे ज्यादा शर्मनाक और निंदनीय कुछ हो नहीं सकता। अब सवाल यह है कि क्या तारिक रहमान के प्रधानमंत्री बनने के बाद यह सिलसिला रुकेगा? भारत की नजर इस पर सबसे ज्यादा होगी। भारत की नजर इस पर भी होगी कि चीन और बांग्लादेश के संबंध कैसे होते हैं। हमारे लिए जो स्ट्रेटेजिक महत्व के स्थान हैं, उन पर बीएनपी का क्या रुख होता है। हमारे नॉर्थ ईस्ट के बिल्कुल पास स्थित लालमोनिरहाट एयरपोर्ट को बांग्लादेश ने चीन को दे रखा है। वह वहां पुनर्निर्माण करा रहा है। चीन उसे भारत के खिलाफ इस्तेमाल करना चाहता है। भारत इसकी काट के लिए बहुत सारे कदम उठा रहा है। अगर बांग्लादेश में ऐसी सरकार होगी जो पाकिस्तान और चीन की गोद में खेलेगी तो हमारा इंफ्रास्ट्रक्चर का जो बजट है, वह और बढ़ेगा। हमें ज्यादा सुरक्षा बलों की तैनाती करनी पड़ेगी। तारिक रहमान सरकार अगर भारत के हितों के खिलाफ चीन और पाकिस्तान से हाथ मिलाएगी तो फिर संबंध आगे नहीं बढ़ सकते। साथ ही भारत के लिए एक नया फ्रंट खुल जाएगा।

तारिक रहमान 17 साल बाद विदेश से लौटकर बांग्लादेश आए हैं और अपनी मां खालिदा जिया के निधन के बाद पार्टी के अध्यक्ष बन गए। यह वंशवाद की राजनीति का ही नतीजा है कि 17 साल जो व्यक्ति अपने देश में ही नहीं रहा, वह एक दिन आता है और पार्टी का अध्यक्ष बन जाता है और फिर चुनाव जीतकर प्रधानमंत्री। लेकिन एक सवाल अभी भी अनुत्तरित रहेगा कि यह जो छात्र आंदोलन हुआ था, जिन्होंने तख्तापलट करवाया, अब इनका भविष्य क्या है? चुनाव में तो जनता ने उनकी पार्टी को नकार दिया। बीएनपी और जमात-ए-इस्लामी उन्हें अब पूछेंगी नहीं। यह नेपाल की जेन-जी के लिए भी सबक है। आपके आक्रोश के कारण सत्ता नहीं बदलती। आपको इस्तेमाल किया जाता है। बांग्लादेश में छात्रों की नेशनल सिटीजंस पार्टी का इस्तेमाल लोगों को भड़काने,शेख हसीना को प्रधानमंत्री पद से हटाने के लिए किया गया और जब ये उद्देश्य पूरा हो गया तो उनकी जरूरत खत्म हो गई। तो पूरी दुनिया में जेन-जी को यह समझना चाहिए कि अगर वह सत्ता विरोधी कोई आंदोलन चलाते हैं तो उनसे चलवाया जा रहा है। ऐसी शक्तियां हैं, जो उनका इस्तेमाल कर रही हैं। उनको सोचना पड़ेगा कि क्या वे इस्तेमाल होने के लिए तैयार हैं और इस्तेमाल होने के बाद उनका कोई महत्व नहीं रह जाएगा।
जमात-ए- इस्लामी का बांग्लादेश में नंबर दो की पार्टी बनना भारत के लिए बुरी खबर है। यह शुद्ध रूप से भारत विरोधी और सांप्रदायिक पार्टी है। यह जितने आतंकवादी संगठन हैं, उन सबका समर्थन करेगी और बांग्लादेश की नई सरकार के लिए भी इनसे लड़ना आसान नहीं होगा। चूंकि तारिक रहमान 17 साल विदेश में रहे तो वे पश्चिमी सभ्यता से ज्यादा प्रभावित हैं। सवाल यह है कि क्या वह बांग्लादेश की संस्कृति को समझ पाएंगे? क्या उनको यह दिखाई देगा कि पड़ोसी देश भारत से संबंध बेहतर करना बांग्लादेश के हित में है। अगर यह बात उनको समझ में आएगी तो संबंध बेहतर होंगे, नहीं आएगी तो फिर पता नहीं क्या होगा।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)



