प्रदीप सिंह।
लोकसभा चुनाव से पहले देश के खिलाफ एक नई टूलकिट तैयार हो रही है। जाहिर है कि देश के खिलाफ है तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को घेरने के लिए उनके खिलाफ तो होगी ही। देश की बढ़ती ताकत, विश्व व्यवस्था में बढ़ती हैसियत और बढ़ती अर्थव्यवस्था को रोकने के साथ-साथ देश में जो सामाजिक समरसता बनी हुई है उसे तोड़ने के लिए ही यह टूलकिट तैयार हो रही है। इसका मकसद है 2024 का लोकसभा चुनाव। लेफ्ट-लिबरल इकोसिस्टम और इस टूलकिट में शामिल लोगों के लिए 2024 का आम चुनाव करो या मरो की स्थिति है। इनमें देसी और विदेशी दोनों तरह के लोग हैं। इसका स्वरूप आपको जल्दी ही देखने को मिलेगा। मेरा अंदाजा है की संसद के शीतकालीन सत्र और राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा के समापन के बाद आपको इसका स्वरूप दिखाई देने लगेगा।
हालांकि, भारत जोड़ो यात्रा में तो अभी से यह दिखना शुरू हो गया है। राहुल गांधी जिस तरह के लोगों से मिल रहे हैं और जिस तरह के लोग इस यात्रा से जुड़े हैं या जुड़ रहे हैं उससे आपको इस बारे में चौकन्ना होना हो जाना चाहिए। इसकी शुरुआत तो तमिलनाडु से ही हो चुकी है जहां से यह यात्रा शुरू हुई। तमिलनाडु में वह उस ईसाई धर्मगुरु से मिले जो हिंदू धर्म के प्रति घृणा का सार्वजनिक इजहार करने से जरा भी नहीं हिचकिचाता है। राहुल गांधी उसे इस तरह से सुन रहे थे जैसे शिष्य अपने गुरु की बात सुनता है। उसने जो कुछ कहा राहुल गांधी सुनते रहे। उसकी किसी बात का विरोध नहीं किया, किसी बात पर ऐतराज नहीं जताया। यह आज की बात नहीं है, नेहरू के जमाने से ही ऐसा होता आया है। लोग मुझसे कहते हैं कि आप बार-बार नेहरू का नाम क्यों लाते हैं। जवाहरलाल नेहरू के मन में यह भावना थी कि हिंदू धर्म दकियानूसी है, पोंगापंथी है, रूढ़िवादी है और सांप्रदायिकता को बढ़ाने वाला है इसलिए इसका विरोध किया जाना चाहिए। इतिहासकारों को एक तरह से अघोषित और लिखित संदेश था कि सनातन धर्म का महिमामंडन नहीं होना चाहिए। जहां तक हो सके उसको कमतर और नीचा दिखाने की या उसकी उपेक्षा करने की कोशिश की जानी चाहिए। उस समय के इतिहासकारों ने यह बखूबी किया। सरकारी संसाधनों से किया और सरकार के संसाधनों के बिना भी किया। उस समय का यह ट्रेंड था कि जो ऐसा करता था वह बड़ा इतिहासकार, बड़ा लेखक और बड़ा बुद्धिजीवी माना जाता था। उनके बारे में सत्ता में बैठे लोगों में बड़ी अच्छी भावना होती थी। उनको हर तरह की सुविधा दी जाती थी। लुटियंस दिल्ली में मकान चाहिए हो या विदेशी दौरे हों और इसके अलावा फेलोशिप हो, प्रोफेसरशिप हो, इस तरह की तमाम चीजें मुहैया कराई गईं ताकि उनके काम में बाधा न आए।
लेफ्ट-लिबरल में मोदी का खौफ

नरेंद्र मोदी ऐसे लोगों को एक तरह से काल नजर आते हैं। उनको लगता है कि मोदी को हटाए बिना कुछ नहीं होगा। उन्हें लगता है कि मोदी अगर 2024 में भी आ गए तो वह जो आधार भूमि तैयार करके जाएंगे उस पर आगे बढ़ना भाजपा के किसी भी नेता के लिए आसान होगा। इसमें भी कोई शक नहीं होना चाहिए कि अगर मोदी चाहेंगे तो 2029 में भी आएंगे। यह मोदी पर निर्भर करेगा कि 2029 में वह चुनाव लड़ते हैं या नहीं लड़ते हैं। मुझे लगता है कि 2029 में भी वह चुनाव लड़ेंगे। बहुत से लोग सवाल उठाते हैं कि बीजेपी ने तो 75 साल पर रिटायरमेंट का नियम बना रखा है जो मोदी पर भी लागू होगा। अभी मोदी 72 वर्ष के हैं। तीन साल बाद उन्हें रिटायर होना पड़ेगा लेकिन ऐसा कुछ नहीं होने वाला है। हर नियम के अपवाद होते हैं। मोदी के लिए अपवाद नहीं होगा तो किसके लिए होगा। बीजेपी पहले भी कई लोगों के लिए अपवाद कर चुकी है। येद्दियुरप्पा और दूसरे कई नेताओं के बारे में अपवाद हो चुका है तो मोदी के लिए क्यों नहीं होगा। इसलिए इस बारे में किसी को कोई गलतफहमी नहीं होनी चाहिए कि 75 साल के होते ही मोदी सब कुछ छोड़कर संन्यास ले लेंगे। वह कहीं नहीं जाने वाले हैं, प्रधानमंत्री रहने वाले हैं। इसलिए इन लोगों की चिंता ज्यादा है। इनको अंदाजा है कि ऐसा होने वाला है।
देश विरोधियों के साथ कांग्रेस
आप देखिए कि राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा में कौन-कौन आया। केरल कांग्रेस का वह कार्यकर्ता जिसने गौ हत्या के विरोध में सड़क पर बछड़ा काटकर पकाया, लोगों को खिलाया और पार्टी की। वह राहुल गांधी के साथ चलता है और उसके बारे में कांग्रेस से कोई कुछ नहीं बोलता है, जबकि उस समय उसके खिलाफ कार्रवाई की बात हो रही थी। उस समय माहौल गर्म था तो बोल दिया गया लेकिन अब असली चरित्र सामने आ रहा है। इसके अलावा जितने भी पुराने समाजवादी हैं जिनकी लालसा इस बात को लेकर है कि किसी तरह से एक बार विधानसभा या लोकसभा में पहुंच जाएं, किसी तरह से उनका राजनीतिक वजूद बन जाए, ऐसे पुराने समाजवादी, बुद्धिजीवी जो खुद को लेफ्ट-लिबरल मानते हैं, एक्टिविस्ट हैं या एनजीओ के लोग जो भारत विरोधी अपने आंदोलनों के लिए जाने जाते हैं वह सब भारत जोड़ो यात्रा में जुड़ रहे हैं। इससे आप अंदाजा लगा सकते हैं कि क्या होने वाला है। भारत जोड़ो यात्रा में आप योगेंद्र यादव का रवैया देखेंगे तो ऐसा लगेगा कि यह उनके घर का आयोजन है और इसका सारा भार उन पर है। योगेंद्र यादव अतृप्त आत्मा हैं जो आज तक विधानसभा या संसद नहीं पहुंच पाए। उन्होंने इसी मकसद से आम आदमी पार्टी ज्वॉइन की और आम आदमी पार्टी से निकाल दिए गए तो अपना स्वराज अभियान चलाया लेकिन उनको कुछ मिला नहीं। अब वह पूरी तरह से कांग्रेसी हो गए हैं। उनको लग रहा है कि अगर उनका कोई उद्धार कर सकता है तो वह कांग्रेस पार्टी कर सकती है। प्रशांत भूषण जिनके नाम पर उनके पास-पड़ोस के भी पांच लोग वोट देने नहीं जाएंगे वह उनसे जुड़े। मेधा पाटकर जिनके खिलाफ दस्तावेजी सबूत हैं और उनके खिलाफ केस चल रहा है कि उन्होंने किस तरह से और किस मकसद से नर्मदा परियोजना का विरोध किया। मेधा पाटकर उस समय राहुल गांधी के साथ चलीं जब गुजरात में चुनाव चल रहा था। इसके जरिये कांग्रेस पार्टी संदेश दे रही है कि हम ऐसे लोगों का खुलकर साथ देने को तैयार हैं जो भारत विरोधी हैं, जो भारत में विकास के विरोधी हैं।
सरकार के खिलाफ बड़े आंदोलन की तैयारी
रही-सही कसर राहुल गांधी ने महाराष्ट्र से गुजरते समय सावरकर को गाली देकर कर दी। वीर सावरकर को गाली देकर राहुल गांधी दरअसल बीजेपी की मदद ही कर रहे हैं। वह बता रहे हैं कि उनकी मानसिकता क्या है, उनकी पार्टी की अब नीति क्या है। कांग्रेस पार्टी की बस में अब वो सारे तत्व सवार हैं जिसको आप समाज विरोधी, देश विरोधी, विकास विरोधी, राष्ट्रीय सुरक्षा और भारतीय संस्कृति के विरोधी कह सकते हैं। आप इससे अंदाजा लगा सकते हैं कि क्या होने वाला है। एक हल्का सा संदेश गलती से या जानबूझकर दिया है पूर्व राज्यपाल सत्यपाल मलिक ने। उन्होंने कहा कि एक बड़े आंदोलन की तैयारी चल रही है जो जल्दी ही शुरू होगा। हालांकि उन्होंने इसका नाम नहीं बताया लेकिन यह आंदोलन किसानों और बेरोजगारी के नाम पर शुरू होने वाला है। जैसे-जैसे लोकसभा चुनाव की तारीख नजदीक आएगी वैसे-वैसे यह आंदोलन तेज किया जाएगा जिस तरह से तथाकथित किसान आंदोलन था। उस समय कहा जा रहा था कि इसका मकसद राजनीतिक है तो आंदोलनकारियों ने कहा कि यह हमें बदनाम करने की कोशिश है। यह सरकार, आरएसएस और बीजेपी का षडयंत्र है। बाद में खुद योगेंद्र यादव ने सार्वजनिक रूप से यह स्वीकार किया कि वह यह आंदोलन अखिलेश यादव की मदद के लिए चला रहे थे ताकि उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी की सरकार बने। समाजवादी पार्टी की अगर सरकार बन गई होती तो शायद योगेंद्र यादव अभी राज्यसभा में होते। इन लोगों के छोटे-छोटे मकसद और बहुत छोटी चाहत है। उसके लिए ये किसी भी हद तक जाने को तैयार हैं। ये देश और समाज के विरोध में जो काम करते हैं उस पर मोदी विरोध का मुलम्मा चढ़ाते हैं। ये कहते हैं कि हम मोदी के विरोधी हैं इसलिए हमें राष्ट्रद्रोही मत कहिए। हमारी देशभक्ति किसी से कम नहीं है। मगर आप काम क्या करते हैं। आप क्या बोलते हैं हमें इससे मतलब नहीं है, आप काम क्या करते हैं इससे मतलब है।
हो रही अंतरराष्ट्रीय साजिश
मेधा पाटकर, प्रशांत भूषण, स्वरा भास्कर जैसों को लेकर राहुल गांधी चल रहे हैं। आप मान कर चलिए कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसके बाद की तैयारी चल रही है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसके लिए पैसा देने वाले खड़े हैं, एनजीओ तैयार हैं। एनजीओ में यह भी एक बड़ी शिकायत है कि मोदी ने उनका सारा धंधा बंद करा दिया। इस तरह के जितने एनजीओ थे जो समाज सेवा के नाम पर भारत विरोधी गतिविधियां चलाते थे पिछले आठ साल में उन सबका डिब्बा गोल हो चुका है। एक समाजशास्त्री प्रोफेसर और लेखक हैं राजीव मल्होत्रा जिनकी एक किताब आई है स्नेक्स द गंगा। उस किताब में ब्योरेवार बताया गया है कि भारत के कौन-कौन से उद्योगपति यूरोपीय और खासतौर से अमेरिकी शिक्षण संस्थानों को आर्थिक मदद देते हैं जहां भारत विरोधी अभियान की रणनीति बनाई जाती है। टूल किट बनाया जाता है, दुनिया भर में उसको फैलाया जाता है, अंतरराष्ट्रीय मीडिया में उसको जगह दिलाई जाती है। उनको यह मंजूर नहीं है कि एक पिछड़ा हुआ देश जिनका नेता दुनिया का सर्वमान्य नेता बन गया है, उसकी हैसियत किसी भी बड़े देश के नेता से बड़ी हो गई है। आज अमेरिका हो या इंग्लैंड, फ्रांस हो या जर्मनी, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उनके प्रधानमंत्री-राष्ट्रपति से ज्यादा बड़ी हैसियत नरेंद्र मोदी की बन गई है। अंतरराष्ट्रीय मंच पर उनकी बात का जो वजन है वह और किसी नेता का नहीं रह गया है। भारत की अर्थव्यवस्था आज दुनिया में सबसे तेजी से बढ़ती हुई अर्थव्यवस्था है। भारत की करेंसी रुपया जिसका रोना आज विपक्ष के लोग रोते हैं कि डॉलर के मुकाबले यह 80-82 रुपये पर पहुंच गया है वह यह नहीं बताते हैं कि भारत की करेंसी दुनिया की एकमात्र ऐसी करेंसी है जो डॉलर के मुकाबले सबसे कम गिरावट की शिकार हुई है। इसके अलावा पाउंड स्टर्लिंग की तुलना में रुपया 20 प्रतिशत और यूरो व येन की तुलना में 15 प्रतिशत मजबूत हुआ है। यह सब बातें दबाने छुपाने की कोशिश होती है।
भारत को कमतर दिखाने की कोशिश
आपको याद होगा कि हाल ही में एक आंकड़ा आया कि जीडीपी ग्रोथ के आधार पर भारत दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया है। इसे लेकर कहा गया कि यह तो ठीक है लेकिन प्रति व्यक्ति जीडीपी में भारत कितना नीचे है इसे देखिए। कोई भी देश जिसकी आबादी ज्यादा होगी वह प्रति व्यक्ति जीडीपी में नीचे होगा ही। मैं शर्त लगाकर कह सकता हूं इनमें से कोई कभी यह बात चीन के संदर्भ में नहीं उठाएगा कि दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था होने के बावजूद चीन की प्रति व्यक्ति जीडीपी किस नंबर पर है। ग्रोथ के तीन पैमाने होते हैं। एक हुआ जीडीपी, दूसरा प्रति व्यक्ति जीडीपी और तीसरा है परचेजिंग पावर पैरिटी यानी आपकी करेंसी की खरीद क्षमता कितनी है, आपकी करेंसी कितनी मजबूत है। परचेजिंग पावर पैरिटी में भारत की करेंसी सबसे ऊपर नंबर एक पर है। इससे आप अंदाजा लगाइए कि भारत को कमतर, नीचा और घटिया दिखाने की किस तरह से कोशिश होती है। भारत को जी-20 की अध्यक्षता मिली है तो कहा जा रहा है कि यह तो रोटेशनल है, यह सही बात है। फिर कहा जा रहा है कि 2021 में मिलना था, उस समय इसलिए नहीं लिया कि 2024 में चुनाव है तो 2022 में लेंगे और चुनाव में इसका फायदा उठाएंगे। सवाल यह है कि 2022 में अध्यक्षता लेने से अगर चुनाव में फायदा हो रहा है तो 2021 में क्यों नहीं होता। 2021 में कोरोना का प्रकोप था। अगर भारत उस समय अध्यक्षता लेता तो यह होता कि कोरोना काल में भी इनको अपनी इमेज चमकाने की चिंता है।
मोदी राज बर्दाश्त नहीं
भारत को जी-20 देशों के समूह की अध्यक्षता एक साल के लिए मिली है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी देश के हर कोने में इसे ले जाना चाहते हैं। कई मुद्दे हैं जिसमें भारत एक तरह से अग्रणी भूमिका में है। चाहे वह डिजिटल ट्रांजैक्शन का मामला हो, चाहे ग्रीन एनर्जी या पर्यावरण का मामला हो, भारत दुनिया की फार्मेसी बन चुका है। कोरोना के दौरान हमने जिस तरह से अपनी वैक्सीन विकसित की, 2 अरब से ज्यादा वैक्सीन की डोज भारत में दी गई वह दुनिया में कहीं नहीं दी गई। उस समय दुनिया के विकसित और संपन्न देश छोटे और गरीब देशों को वैक्सीन देने को तैयार नहीं थे। उस समय भारत ने दिया। मोदी राज में जो यह सब हो रहा है यह बर्दाश्त नहीं है। इसको रोकना है, इस पर लगाम लगाना है, इसके पहिये को पंचर करना है, इसके लिए टूल किट तैयार हो रही है। उनको लग रहा है कि 2024 सबसे अच्छा मौका है। उस समय अगर मोदी और बीजेपी को रोक लिया तो आगे का रास्ता आसान हो जाएगा। इनके लिए सरवाइवल का सवाल है। ये अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं। मोदी सबसे कठिन दौर में आए हैं। तब भारतीय अर्थव्यवस्था, देश, समाज संकट से गुजर रहे थे। भारतीय संस्कृति का विरोध अपने चरम पर था। जो कुछ भारतीय है उसके प्रति घृणा का भाव, विरोध का भाव अपने चरम पर था। उस समय मोदी आए हैं और भारतीय संस्कृति की पुनर्स्थापना की परियोजना को बहुत तेजी से लागू कर रहे हैं। पूरे देश में माहौल बदला है और यह बदला हुआ माहौल इन लोगों को पसंद नहीं आ रहा है। बदलती हुई फिजाएं इनके लिए कष्ट का कारण हो रही है कि सनातन धर्म की पुनर्स्थापना कैसे हो रही है, भारतीय संस्कृति का गुणगान इस तरह से कैसे हो रहा है। यह सब इनके लिए कुफ्र जैसा है। इनको लगता है कि ये गलत दिशा में ले जा रहे हैं और देश को बर्बाद कर देंगे। ऐसे लोगों के लिए करो या मरो का समय है।
इसलिए आप यह मानकर चलिए कि अगले 13-14 महीने बड़े कठिन होने वाले हैं। उस दौरान मोदी और देश के खिलाफ जबर्दस्त अभियान चलने वाला है। आंदोलन हिंसक हो सकते हैं जिस तरह से कथित किसान आंदोलन में हुआ। हो सकता है कि सरकार को सख्ती करनी पड़े और पुलिस गोली चलाए। उसका फायदा उठाया जा सके और बताया जा सके कि देखिए मोदी ने क्या किया, तो सावधान रहने की जरूरत है। टूल किट का इंप्लीमेंटेशन किसी भी समय करना शुरू कर सकते हैं। इसका संकेत आपको मिलेगा विदेशी मीडिया से। विदेशी मीडिया में जब भारत विरोधी, हिंदू विरोधी खबरें आने लगे तो आप समझ जाइएगा। दो साल पहले भी यह चलाया गया था। तब डिस्मेंटल हिंदुत्व का अभियान चलाया गया था। इन सबसे आप अंदाजा लगाइए कि तकलीफ कितनी ज्यादा है। तकलीफ है तो चिल्लाएंगे भी उतना ज्यादा ही, तो उसके लिए तैयार रहिए।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक और ‘आपका अखबार’ न्यूज पोर्टल एवं यूट्यूब चैनल के संपादक हैं)



