तीसरी पीढ़ी का नेतृत्व हो रहा तैयार,उनकी नियुक्ति पार्टी में बड़े परिवर्तनों का संकेत।
प्रदीप सिंह।
भारतीय जनता पार्टी ने आखिरकार नया राष्ट्रीय अध्यक्ष चुन लिया है। नितिन नवीन को अभी कार्यकारी अध्यक्ष की जिम्मेदारी सौंपी गई है। उम्मीद है कि जनवरी में वह पूर्णकालिक अध्यक्ष बन जाएंगे। नितिन नवीन का सिर्फ 45 साल की उम्र में भाजपा जैसी देश की सबसे बड़ी और सत्तारूढ़ पार्टी का अध्यक्ष बन जाना कोई छोटी उपलब्धि नहीं है। लेकिन यह उपलब्धि केवल व्यक्तिगत रूप से नितिन नवीन की नहीं है, यह उपलब्धि भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मिलजुल कर काम करने के तरीके की है।

मेरा मानना है कि नितिन नवीन की नियुक्ति में आप प्रोसेस को देखिए। जो फैसला लिया गया है उसकी नीति को देखिए। व्यक्ति तो राजनीति में आते जाते रहेंगे, लेकिन प्रोसेस का कैडर बेस संगठनों में ज्यादा महत्व होता है कि हमको भविष्य की पार्टी तैयार करनी है। भाजपा में तीसरी पीढ़ी के नेतृत्व की तैयारी तभी शुरू हो गई है जब दूसरी पीढ़ी अभी पूरी तरह से सशक्त,प्रभावी और सक्रिय है। पहली पीढ़ी तो है ही। उसके हाथ में देश का नेतृत्व है । इसके बावजूद तीसरी पीढ़ी का नेतृत्व तैयार करने को ही लॉन्ग टर्म प्लानिंग कहते हैं। मैं प्रोसेस पर ध्यान देने की बात इसलिए भी कह रहा हूं क्योंकि भारतीय राजनीति जातियों में जकड़ी हुई है। भाजपा भी इससे अछूती नहीं है। एक लंबे समय तक भाजपा को ब्राह्मणों और बनियों की पार्टी माना जाता था, लेकिन उसके बाद भाजपा की छवि लगातार बदलती गई है और पिछले 11 साल में तो बहुत तेजी से बदली है। तो नितिन नवीन का भाजपा का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनना क्या बताता है? पार्टी में सवर्ण वर्ग की चार जातियों ब्राह्मण,क्षत्रिय,वैश्य और भूमिहार का दबदबा माना जाता था। इनमें से एक जाति का व्यक्ति अगर बड़े पद पर चला गया तो बाकी नाराज हो जाते थे। उससे पार्टी को बाहर निकाल दिया है। नितिन कायस्थ हैं और कायस्थ भी सवर्ण वर्ग में ही आते हैं, लेकिन उनकी संख्या इतनी छोटी है कि उनके बनने से किसी अन्य जाति को यह नहीं लगेगा कि हमारी जाति पीछे रह गई। जो ईर्ष्या,प्रतिद्वंदिता या विरोध का भाव रहता था,सबको एक साथ खत्म कर दिया। दूसरा नितिन नवीन को अध्यक्ष बनाकर यह संदेश दिया गया है कि पार्टी को नई ऊर्जा की और ज्यादा जरूरत है। यह भाजपा के ऑपरेशन ईस्ट का भी हिस्सा है।
नितिन नवीन छत्तीसगढ़ के प्रभारी रहे और छत्तीसगढ़ में पार्टी जीती। उसका श्रेय भी पार्टी ने उनको दिया। इसके अलावा वे संगठन में काफी समय से सक्रिय हैं। उनके पिता भी विधायक थे। 2006 में अपने पिता के निधन के बाद हुए उपचुनाव में जीत हासिल कर नवीन पहली बार विधायक बने और तब से लगातार जीत रहे हैं। अभी बिहार सरकार में पीडब्ल्यूडी मिनिस्टर हैं। लेकिन उनकी इतनी ही पहचान नहीं है। उनके काम पर पिछले काफी समय से शीर्ष नेतृत्व की नजर थी। उनका परिवार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़ा रहा है तो एक वैचारिक प्रतिबद्धता का भी ध्यान रखा गया है।

भाजपा में हमेशा ऐसे कार्यकर्ताओं पर निगाह रहती है, जिनमें भविष्य का नेता बनने की संभावना हो। 2002 में प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और केंद्रीय गृहमंत्री लालकृष्ण आडवाणी ने फैसला किया था कि राजस्थान में नेतृत्व परिवर्तन होगा और वहां वसुंधरा राजे को अध्यक्ष बनाकर भेजा गया। इसी तरह मध्य प्रदेश में उमा भारती और छत्तीसगढ़ में डॉ. रमन सिंह को अध्यक्ष बनाकर भेजा गया था। ये तीनों बिल्कुल नए थे लेकिन इन्होंने अपनी नेतृत्व की क्षमता को साबित किया। 1984 में जब भाजपा की केवल दो सीटें आईं तो लालकृष्ण आडवाणी अपनी टीम में सुषमा स्वराज, अरुण जेटली, अनंत कुमार, वेंकैया नायडू, प्रमोद महाजन आदि को लेकर आए। चूंकि उस समय भाजपा बहुत छोटी पार्टी थी तो लोगों का ध्यान इस परिवर्तन की ओर नहीं गया। लेकिन यह परिवर्तन भाजपा के राष्ट्रीय पार्टी के रूप में उभरने की नींव बना। 2009 के लोकसभा चुनाव में भाजपा की बुरी हार के बाद लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष सुषमा स्वराज और राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष अरुण जेटली को बनाया गया। उससे पहले कौन थे लोकसभा में लालकृष्ण आडवाणी और राज्यसभा में जसवंत सिंह। दोनों को हटा दिया गया। उसके अलावा संघ ने पार्टी संगठन को लेकर बड़ा हस्तक्षेप किया। नए पार्टी अध्यक्ष के लिए संघ की पहली पसंद थे मनोहर पर्रिकर। लेकिन पर्रिकर गोवा छोड़कर दिल्ली आने को तैयार नहीं हुए। उसके बाद संघ ने नितिन गडकरी को अध्यक्ष बनाना तय किया। वहां बीजेपी से कोई बड़ा सलाह मशवरा नहीं हुआ। उसके बाद क्या हुआ, वह सब इतिहास आपको मालूम है। भाजपा में युवाओं को आगे बढ़ाने पर खास ध्यान है। आज आप भाजपा के मुख्यंत्रियों को देखिए, आपको सभी युवा दिखाई देंगे। लगभग सभी 45-55 आयुवर्ग के हैं। उम्मीद है कि जनवरी में जब नितिन नवीन पूर्णकालिक अध्यक्ष बनेंगे तो संगठन और उसके साथ-साथ सरकार में भी बड़ा परिवर्तन होगा।

नितिन नवीन को अध्यक्ष बनाकर भाजपा ने यथास्थिति को भी तोड़ा है। यथास्थिति बनी रहने से एक तरह का आलस्य और जड़ता आ जाती है। जड़ता को तोड़ने के लिए आपको कोई झटका देना पड़ता है। तो नितिन नवीन भाजपा के संगठन के लिए शॉक ट्रीट मेंट हैं। उन पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह की पहले से नजर थी। बिहार चुनाव में जब टिकटों के बंटवारे की बात चल रही थी तब नितिन नवीन कोर कमेटी के मेंबर नहीं थे। लेकिन उनको कोर कमेटी की बैठकों में बुलाया गया। बिहार के लोग एक अन्य घटना भी बताते हैं कि राज्य में पार्टी के नेताओं की बैठक चल रही थी। उसमें प्रधानमंत्री भी थे। पार्टी के वरिष्ठ नेता दिलीप जैसवाल ने कुछ बोलने की कोशिश की तो प्रधानमंत्री ने कहा कि नहीं, नितिन को बोलने दीजिए। वह कुछ ठीक बात बोल रहा है। तो पदाधिकारी बनने के लिए शीर्ष नेतृत्व का विश्वास पात्र होना भी जरूरी होता है। इससे राह आसान हो जाती है। तो नितिन नवीन के लिए राह आसान बनने में उनकी मेहनत,उनकी ऊर्जा काम आई। पार्टी को इस समय एक बहुत ही ऊर्जावान राष्ट्रीय अध्यक्ष की जरूरत थी। कार्यकर्ताओं के लिए जेपी नड्डा बिल्कुल उपलब्ध नहीं रहते थे लेकिन नितिन नवीन की एक खासियत यह भी मानी गई कि वे कार्यकर्ताओं के लिए हमेशा उपलब्ध रहते हैं। तो कुल मिलाकर भाजपा भविष्य की पार्टी खड़ी कर रही। 2047 में जब हमारी आजादी के जब 100 साल होंगे तब नितिन नवीन की उम्र 67 साल ही होगी। और आप मानकर चलिए कि नितिन नवीन आए हैं तो नए और युवा नेताओं की एक और टोली आने वाली है। यह पार्टी में बहुत सारे परिवर्तनों का संकेत है।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक और ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)



