दो नावों की सवारी पड़ेगी भारी,इतिहास से सबक लेने को तैयार नहीं।
प्रदीप सिंह।
बहुत से लोगों को इतिहास से बड़ी दिक्कत होती है और खासतौर से अगर इतिहास का सच बताया जाए तो और ज्यादा दिक्कत होती है। लेकिन इतिहास में दरअसल भविष्य छिपा होता है। इतिहास आपको बताता है कि भविष्य अगर सुधारना है तो क्या गलती नहीं करें। फिर भी कुछ लोग हैं,जो इतिहास से सीखने को तैयार नहीं होते हैं। पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी कुछ ऐसा ही कर रही हैं।
ममता बनर्जी दो नावों की सवारी करने की कोशिश कर रही हैं। उनकी पार्टी तृणमूल कांग्रेस मुस्लिम तुष्टीकरण के लिए जानी जाती है। इस बार पार्टी को लग रहा है कि यह मूल पहचान उसके लिए नुकसानदायक साबित हो सकती है तो इसमें थोड़े बदलाव की जरूरत है। इसीलिए ममता बनर्जी राज्य में एक भव्य मंदिर भी बनवा रही हैं। वह यह दिखाना चाहती हैं कि उनकी पार्टी हिंदुओं के साथ भी है। उनको लग रहा है कि हिंदू अगर हमारा साथ छोड़ देंगे तो हमारा कोर वोटर मुस्लिम अकेले हमको इसबार नहीं जिता पाएगा। ममता बनर्जी को यह समझ इसलिए आ रहा है क्योंकि भाजपा पश्चिम बंगाल में लगातार अपना जनाधार बढ़ा रही है। 2011 से मुसलमान लगातार ममता बनर्जी का कोर वोटर बना हुआ है। उनको 2011,2016 और 2021 के विधानसभा चुनावों में हिंदू वोट की कोई चिंता नहीं हुई। ममता का हिंदू वोट जब मैं कह रहा हूं तो वे सूडो सेकुलर हिंदू जो दरअसल जन्म से तो हिंदू हैं लेकिन मन से मुसलमान हैं। ऐसे लोग कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस जैसी पार्टियों का वोट बैंक बनते हैं और हिंदू वोट को विभाजित कराते हैं। मुस्लिम वोट एकजुट रहे और हिंदू वोट बंट जाए तो वह तृणमूल कांग्रेस जैसी पार्टियों को जीत दिलाता है। यह थ्योरी अप्रैल में होने जा रहे विधानसभा चुनाव में खतरे में नजर आ रही है।
तो देखिए ममता बनर्जी कर क्या रही हैं? उनकी पार्टी से सस्पेंड हुए एक विधायक हुमायूं कबीर मुर्शिदाबाद में बाबरी मस्जिद बनवा रहे हैं। आज की तारीख में बाबरी मस्जिद बनवाने की बात वही कर सकता है जो इस देश में शरिया लाना चाहता है। वरना भारत के मुसलमानों का बाबर से क्या संबंध? बाबर तो आक्रमणकारी था जिसने इस देश को लूटा। लोगों का जबरन धर्म परिवर्तन कराया। लेकिन ममता बनर्जी और उनकी जैसी सोच वाले नेताओं को इस सब से कोई मतलब नहीं है। उनको मतलब है कि हमको वोट कौन देगा? तो उन्होंने हुमायूं कबीर को बाबरी मस्जिद बनाने की पूरी छूट दी। उनके खिलाफ कोई एक्शन नहीं लिया। सिर्फ दिखावे के लिए उनको सस्पेंड कर दिया। ममता दूसरी तरफ राज्य में जगन्नाथ मंदिर बनवा रही है। उनको सत्ता में रहते हुए 15 साल होने जा रहे हैं,आज तक उनको मंदिर बनवाने की याद नहीं आई। पश्चिम बंगाल में हिंदुओं पर जितने अत्याचार हुए,बांग्लादेश में हिंदुओं की जिस तरह से हत्या हो रही है,उसके खिलाफ वह कुछ नहीं बोलती हैं। लेकिन पश्चिम बंगाल में वह बाबरी मस्जिद और जगन्नाथ मंदिर दोनों बनवा रही हैं। इसीलिए मैंने शुरू में दो नावों की सवारी और इतिहास से सबक न लेने की बात कही।
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आप देश में 1986 के बाद का दौर याद कीजिए। 1984 में राजीव गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस पार्टी को प्रचंड बहुमत मिला लेकिन 1986 आते-आते जैसे कपूर उड़ जाता है, उस तरह से उड़ने लगा। 86 में शाहबानो मामले में सुप्रीम कोर्ट का जजमेंट आया। उसके विरोध में धर्म का मामला बताते हुए मौलवी राजीव गांधी के पास पहुंच गए। इसके बाद मुस्लिम कट्टरपंथियों को खुश करने के लिए राजीव गांधी ने सुप्रीम कोर्ट का फैसला बदल दिया। जब इसका विरोध शुरू हुआ तो राजीव गांधी ने सोचा कि हिंदू पक्ष को भी खुश कर दें। तो उन्होंने अयोध्या में राम मंदिर का शिलान्यास करवा दिया। इसका मुस्लिम मौलवियों ने विरोध किया तो राजीव गांधी ने शिलान्यास के बाद आगे का काम रुकवा दिया। राजीव गांधी को लगा कि उनके इस कदम से हिंदू और मुसलमान दोनों खुश हो जाएंगे और दोनों उनके साथ हो जाएंगे। हुआ इसका ठीक उल्टा। दोनों नाराज हो गए। इसी फैसले ने राम जन्मभूमि आंदोलन की भी नींव रख दी। राजीव गांधी ने जो किया, उसकी सजा कांग्रेस पार्टी आज तक भुगत रही है। 1984 के बाद आज तक लोकसभा में कांग्रेस कभी साधारण बहुमत नहीं पा सकी। आज पार्टी किस हाल में है,किसी से छिपा नहीं है। उस इतिहास से ममता बनर्जी कोई सबक सीखने को तैयार नहीं हैं। वो इतिहास बताता है कि दो नावों की सवारी नहीं करनी चाहिए। दो नावों की सवारी में आप बीच में गिरेंगे और डूब जाएंगे। कांग्रेस पार्टी उसमें डूब गई।
ममता बनर्जी अपने राजनीतिक जीवन में पहली बार दो नामों की सवारी कर रही हैं। तुलसीदास जी ने कहा है कि एक साधे सब सधे, सब साधे सब जाए। यही ममता बनर्जी के साथ होता हुआ दिखाई दे रहा है। तो घुसपैठियों को बचाना है, लेकिन जगन्नाथ मंदिर बनवाना है के खेल में कौन हिंदू ममता बनर्जी पर विश्वास करेगा? उनको अगर लग रहा है कि जगन्नाथ मंदिर बनवाने से हिंदू भाजपा को छोड़कर उनके साथ आ जाएगा, तो इससे बड़ी उनकी गलतफहमी कोई और नहीं हो सकती। वैसे भी मंदिर बनाने से कोई हिंदू किसी पार्टी के साथ नहीं आता। 1992 में अयोध्या में विवादित ढांचा आंदोलनकारियों ने गिरा दिया था, लेकिन 1993 में उत्तर प्रदेश में चुनाव हुआ तो बीजेपी हार गई। तो इतिहास की यह घटनाएं भविष्य का सबक होती हैं। अब पश्चिम बंगाल के चुनाव में लगता है कि भाजपा को उतनी मेहनत करने की जरूरत शायद नहीं है,जितनी उससे अपेक्षा थी। उसमें ममता बनर्जी बहुत मदद कर रही हैं। ममता बनर्जी को समझ में नहीं आ रहा है कि वह कर क्या रही हैं और उसका नतीजा क्या होगा। अप्रैल के आखिर या मई के पहले हफ्ते में जब विधानसभा चुनाव का नतीजा आएगा तो ममता बनर्जी को भी स्पष्ट हो जाएगा कि उन्होंने कितनी भारी भूल की।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक और ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)



